Chapter 2 Shloka 11

श्री भगवानुवाच

अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे।

गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिता:।।११।।

Smilingly the Lord said to Arjuna:

You grieve for those who should not be grieved for,

yet you talk like a pandit.

The learned grieve neither for the dead

nor for the living.

Chapter 2 Shloka 11

श्री भगवानुवाच

अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे।

गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिता:।।११।।

Smilingly the Lord said to Arjuna:

You grieve for those who should not be grieved for, yet you talk like a pandit. The learned grieve neither for the dead nor for the living.

The Lord admonishes Arjuna, “You speak like a pandit but you are foolish. Do you not know that wise men do not bother about death? They neither grieve for those who have died nor for those who are still alive.”

1. Whosoever is born will eventually die – such is the fate of our body.

2. The body is made of five elements and will eventually merge back into these.

3. Why mourn about the inevitable?

4. Life and death are not in our hands – this has been proved eternally; why fear that which is not in our control?

5. The wise pandit does not grieve over creation and dissolution.

6. Nobody’s life span can be predetermined. Who knows whether what is today, will exist tomorrow or not!

The Lord now seems to be saying to Arjuna,

a) You call yourself wise, yet you have become so anxious at this time of adversity that your intellect is not functioning.

b) Having seen your elders standing to oppose you, you have become agitated because of your moha. You have become confused as to your duty and you have forgotten your dharma, your essential nature, your knowledge and your duty.

c) Your mind is full of conflicting thoughts.

d) Your intellect has forsaken you at the very moment you have had to take a step against your established concepts.

e) You have begun to give erroneous meanings to scriptural tenets in order to conceal your lacunae; therefore, even that knowledge is of no use to you.

f) A pandit is never influenced by circumstance, yet you have become influenced by the presence of your kindred and you are ready to flee the field of battle. What sort of knowledge can you claim to have?

g) You have become attached to the personages of your grandsire and your Guru – why can you not view their qualities objectively?

h) Moha has blinded you and you cannot see the reality.

i)  So veiled are you by illusion, that you cannot perceive the difference between right and wrong, truth and falsehood.

j)  Ignorance has depleted the strength in your limbs. It has robbed you of your fortitude and courage so that today you are afraid of death.

Are these the attributes of a pandit? It is foolishness to call you by that epithet.

The Lord is implying, “Do not try to project yourself as a pandit or
man of wisdom. Know yourself. When you recognise your state, maybe you will be able to understand knowledge in its true perspective.”

A sadhak’s mistake

Little one! A sadhak too, makes this same mistake.

1. Having obtained some knowledge, he develops an inordinate pride in his achievement.

2. His true state becomes evident only when he is confronted by adversity. In order to escape from unpleasant situations, he misuses the knowledge he has, to shield his own inadequacies.

3. He uses the same warped knowledge to make excuses to forsake his duty. In fact, one is always proving oneself right and it is very difficult not to justify one’s actions.

Thus does the individual quote knowledge before the Lord Himself! Thus does he try to deceive even the Lord!

For the true pandit, life and death are alike. He worships the Lord and His qualities. Such a one is the servitor of the Lord, not of men. He does not grieve over life or death.

अध्याय २

श्री भगवानुवाच

अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे।

गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिता:।।११।।

भगवान ने मुसकरा कर अर्जुन से कहा :

शब्दार्थ :

१. जो न शोक करने योग्य हैं,

२. तू उनका शोक करता है

३. और पण्डितों के से वचन कहता है।

४. पण्डितगण, जो मर गये हैं, उन प्राणियों के लिये

५. और जिनके प्राण नहीं गये,

६. उनके लिये भी शोक नहीं करते।

तत्व विस्तार :

भगवान अर्जुन को कहते हैं :

‘पण्डितों जैसी बातें करता है, परन्तु तू है मूर्ख ही! क्या तुझे इतना भी नहीं मालूम कि पण्डित गण मृत्यु की परवाह नहीं करते? जो मर गये हैं और जो जीवित भी हैं, उनका भी शोक नहीं करते।’

क्योंकि :

1. जिसका जन्म हुआ है वह निश्चित ही मृत्यु को पायेगा।

2. तन मृत्युधर्मा है, नश्वर का नाश होगा ही।

3. पंचन्कृत् तन पुन: पंचभूतन् में मिल जायेगा ही।

4. निश्चित पर क्या रोना और क्या शोक करना?

5. अनादि सिद्ध मृत्यु से क्या डरना? वह तो आयेगी ही।

6. जो तुम्हारे वश में नहीं उस मृत्यु से क्या डरना?

7. जन्म भी जीव के हाथ में नहीं होता।

8. मृत्यु भी तो जीव के हाथ में नहीं है।

9. विवेकी पण्डित उत्पत्ति तथा लय पर वृथा शोक नहीं करते।

10. आयु भी तो किसी की निश्चित नहीं होती। जो आज है, कौन जाने कल रहेगा भी या मर जायेगा?

फिर मानो भगवान ने अर्जुन से कहा कि तू अपने आपको पण्डित कहता है, अपनी स्थिति तो देख ले :

क) ज्यों ही जटिल समस्या आई, तुम घबरा गये।

ख) ज्यों ही संकट का समय आया, तेरी बुद्धि विभ्रान्त हो गई।

ग) ज्यों ही तुम्हारे सम्मुख तुम्हारे नाते बन्धु आये, तुम्हारा मोह जाग उठा और तुम किम्कर्तव्य विमूढ़ हो गये। अपने नाते बन्धुओं को देख कर तुम अपना धर्म, स्वभाव, ज्ञान और कर्तव्य, सब भूल गये।

घ) विपरीत परिस्थितियाँ सामने आईं तो मन विपरीत और द्वन्द्वपूर्ण हो गया। मन में उद्विग्नता उठ आई।

ङ) मान्यता के विरुद्ध कदम धरना पड़ा तो तुम्हारी बुद्धि ने साथ छोड़ दिया।

च) अपनी न्यूनता छुपाने के लिये तुम ज्ञान को भी ग़लत अर्थ देने लगे।

छ) आज तुम्हारा ज्ञान जीवन में तुम्हारे काम नहीं आ रहा।

ज) पण्डितगण तो नित्य अप्रभावित रहते हैं और तू अपने बन्धुओं से प्रभावित होकर रणभूमि से ही भागने लगा है। यह तेरा कैसा ज्ञान है।

झ) तुझे पितामह और गुरु के तन से संग हो गया है, तू क्यों नहीं उनके गुणों को देखता?

ण) तू मोह के कारण अंधा हो गया है और वास्तविकता नहीं देख रहा।

त) तुम्हारा मन इतना भ्रमित हो गया है कि तू उचित तथा अनुचित का भेद भी नहीं देख रहा!

थ) तुम्हारी बुद्धि इतनी प्रभावित हो गई है कि आज तुझे सत् और असत् में भेद ही नहीं दिख रहा।

द) अज्ञानता के कारण तुम्हारे सम्पूर्ण अंग शिथिल पड़ गये हैं।

ध) अज्ञानता के कारण तुम्हारा धैर्य और वीरता सब लुप्त हो गये हैं। आज तू मृत्यु से भी डर रहा है।

क्या यह पण्डितों जैसी बातें हैं? तुझे पण्डित कहना मूर्खता है। मानो भगवान कह रहे हों :

‘नाहक पण्डिताई न दिखा, अपने आपको जान तो ले! जब तू अपनी स्थिति जान लेगा, तत्पश्चात् चाहे तुझे ज्ञान का जीवन में यथार्थ अर्थ समझ आ जाये, वरना तेरे लिये इस समय सच समझना कठिन है।’

साधक की भूल

नन्हीं! साधक लोग भी जीवन में यह भूल कर जाते हैं।

1. उन्हें ज्ञान का बहुत गुमान हो जाता है।

2. वे अपनी वाक् पटुता में भरमा जाते हैं।

3. वे अपने ही गुणों पर गुमान कर लेते हैं।

4. वे अपने आपको श्रेष्ठ मानने लग जाते हैं।

5. जब कोई विपरीत परिस्थिति आ जाये तो वे उससे भाग जाते हैं और ज्ञान का अर्थ बदल कर अपने आपको ठीक सिद्ध करने की कोशिश करते हैं।

6. वे जब कर्तव्य का भी त्याग करते हैं, तब भी बहाने लगाते हैं।

भाई! बात असल में यह है कि अपने आपको ठीक सिद्ध करना ही होता है वरना जीना कठिन हो जाता है।

वैसे नन्हीं लाडली!

1. जीव तो भगवान को भी ज्ञान सुनाता है।

2. जीव तो भगवान को भी धोखा देना चाहता है।

पण्डित तो वे हैं, जो जीवन मृत्यु की परवाह नहीं करते। जो जीवित या मृतकों से प्रभावित नहीं होते। यानि जो न्याय के पुजारी हैं, जो राम के पुजारी है, वे इन्सान के नहीं, भागवद् गुणों के चाकर होते हैं। वे पण्डितगण मृत्यु या जन्म का शोक कभी नहीं करते।

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