Chapter 2 Shloka 21

वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम्।

कथं स पुरुष: पार्थ कं घातयति हन्ति कम्।।२१।।

Bhagwan says to Arjuna:

O Arjuna, son of Pritha!

A person who considers this Atma to be indestructible,

eternal, undecaying and unborn,

how can such a person be said to kill somebody

or have him killed?

Chapter 2 Shloka 21

वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम्।

कथं स पुरुष: पार्थ कं घातयति हन्ति कम्।।२१।।

Bhagwan says to Arjuna:

O Arjuna, son of Pritha! A person who considers this Atma to be indestructible, eternal, undecaying and unborn, how can such a person be said to kill somebody or have him killed?

Understand carefully little one! The Lord again reveals the subtle, mysterious depths of the essence of the Atma. He says:

a) The Atma is imperishable;

b) It is beyond birth and death;

c) It is constant and unchanging;

d) It transcends name and form;

e) It is the same everywhere;

f) It is supreme consciousness and indestructible in essence;

g) It is without any defects;

h) It is devoid of qualities.

Understand therefore, the attitude of one who identifies with the Atma:

1. He ceases to identify with the body and its attributes.

2. He does not identify with any actions that may be performed by the body.

3. He never desires to establish the body.

4. He is not attached to any likes and dislikes or desires that are born of sense gratification.

5. He is no longer attached to any sensations that arise from contact with sense objects.

6. He is no longer attached to the mind whose only focus is gross objects.

7. When he has broken the bond with his own body then his intellect becomes totally detached from the body and all that pertains to it.

8. His intellect has, so to say, forgotten itself.

9. That Atmavaan, so to say, lives in complete self-forgetfulness.

Since such a one does not consider himself to be the body, how can he claim any actions of the body; how can he be said to kill or have anyone killed? This war that is about to begin, is an interaction between bodies – how can it involve the Atma? How can the unborn Atma ever die? For, though the Atma does everything, yet it performs no actions.

Little one! It is extremely difficult to reach this state. Many a sadhak who tries to achieve it, is waylaid by the theory that underlies it and loses its practical essence. This state is achieved only by one who forgets himself completely and gives proof of it in life. This is the state of the Atmavaan.

Some proofs of this state in ordinary day to day life:

a) The Atmavaan attaches no importance to fame or disrepute for both pertain to the body;

b) He will do nothing for the establishment of the body;

c) No act is too big or too small for him – he performs the most insignificant deed with the same dedication as the most important act;

d) Such a one will bear no grudge against anyone;

e) Naught will be done for personal establishment or protection;

f) Such a one will serve his fellow men with complete identification;

g) There will be utter forthrightness and honesty in response to others’ questions, but without any expectation that they will agree;

h) He will always do his duty by the other even if the other constantly rebuffs him.

Little one, a few stages of life have been mentioned here for your understanding. From this you must have gained some idea of what an Atmavaan is like in real life. Those whose lives do not bear testimony to these qualities cannot be considered to be an Atmavaan’. Mere rhetoric or theoretical knowledge does not make a person an Atmavaan. His life should give proof of this state.

Such beings have transcended body consciousness and are devoid of the attitude of doership, of being the enjoyer of all experiences. They are without attachment and the feeling of ‘me’ and ‘mine’. They have transcended the jivatma bhav or the concept of individual existence.

But remember! So long as you have not achieved this state of body forgetfulness, you are responsible for each deed performed by the body. Continue to perform your duty. As you go forward in the spiritual realm, your sphere of duty will change.

Little one, the Atmavaan does everything to establish the other and withdraws silently after the job is done. So long as others need him he is there with full attention.

a) He gives them all his time.

b) He accompanies them in their tasks.

c) His actions and behaviour are tailored to the needs of the other, giving love, advice and physical help to the extent it is needed.

d) He cajoles the other in the other’s own interest, and even becomes seemingly  displeased with the other, if the situation requires this of him.

e) At times he scolds and at other times pleads with the other on bended knees, in the other’s own interest.

However, once their purpose is served, the very same people revile and reject such a one. They consider him insincere, for, now he is too busy with someone else’s problem to while away time with them. If they were to acknowledge his sincere help and remain by his side, they too, would have to:

1. Use all their resources to help others as did their benefactor!

2. Spend their time in aiding others.

3. Learn how to bend in order to achieve the other’s purpose.

4. Bear humiliation for the other’s sake.

Unconsciously, they weigh out these factors and prefer to desert the Atmavaan, often blaming him in the bargain. However, the Atmavaan seeks nothing from them and their attitude does not deter him from helping them yet again, when they seek his help. For him the body is nothing more than a stone image which he uses to fulfil each one’s heart’s desires. His silence too, is like that divine image of ‘stone’ in the temple, from Whom all come to seek, but may not consider making even an offering of thanks. For, he neither rejects nor favours anyone. Even while doing everything for others, he feels that he does nothing; that he is not the doer.

अध्याय २

वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम्।

कथं स पुरुष: पार्थ कं घातयति हन्ति कम्।।२१।।

भगवान कहते हैं अर्जुन से :

शब्दार्थ :

१. हे पृथा के पुत्र अर्जुन!

२. जो पुरुष इस आत्मा को नाश रहित, नित्य, अजन्मा और अव्यय जानता है,

३. वह पुरुष कैसे किसी को मरवाता है,

४. और कैसे किसी को मारता है?

तत्व विस्तार :

ध्यान से समझ नन्हीं! भगवान फिर से आत्म तत्व का राज़ समझाते हुए कहते हैं कि जो यह जानता है कि :

क) आत्मा नाश रहित है।

ख) आत्मा का जन्म मरण नहीं होता।

ग) आत्मा नित्य एक रस रहता है।

घ) आत्मा नाम रूप से परे है।

ङ) आत्मा परम चेतन अखण्ड स्वरूप है।

च) आत्मा निर्विकार है।

छ) आत्मा निर्गुण है।

वह आत्मा के साथ तद्रूप हुआ जीव अपने आपको क्या मानेगा, यह समझ ले।

1. वह तन की तद्रूपता छोड़ कर अपने आप को आत्मा जानेगा और तन के गुण नहीं अपनायेगा।

2. वह आत्मवान् तनो सम्बन्धी कर्म कैसे अपना सकेगा?

3. वह आत्मवान् तन को कभी भी स्थापित करना नहीं चाहेगा।

4. वह आत्मवान् इन्द्रिय रसना के परिणाम स्वरूप अपनी रुचि अरुचि से भी संग नहीं करेगा।

5. वह आत्मवान् इन्द्रिय रसना से भी संग नहीं करेगा।

6. वह आत्मवान् स्पर्श मात्र से अनुभव में आने वाले विषयों से संग नहीं करेगा।

7. वह आत्मवान् मन से संग नहीं कर सकेगा क्योंकि मन तो नित्य स्थूल विषयों को ही ध्याता था और इन्द्रिय राही वहाँ सम्पर्क पाता था।

8. अब तन के मालिक ने तन से नाता ही तोड़ दिया, तो तना-इन्द्रियों की ओर से ध्यान ही उठ जाता है। जब तन ही अपना नहीं रहा तब उसकी बुद्धि उसके अपने प्रति नितान्त उदासीन हो गई।

9. क्यों न कहें, जब वह अपने तन को भूल गया, तब उसकी बुद्धि भी अपने आप को भूल गई।

10. तब वह आत्मवान् अपने आपको भूल कर जीने लगा।

अब समझो नन्हीं!

क) जो अपने को तन मानता ही नहीं, वह तन के कर्म कैसे अपनायेगा?

ख) जो तन ही नहीं, वह कैसे किसी को मरवायेगा?

ग) जो तन ही नहीं, वह कैसे किसी को मारेगा?

यह मारना या मरवाना तन के राही होता है। यह युद्ध जो होने वाला है, यह तन का तन के साथ होगा। इस में आत्मा की सहयोगिता कहाँ हुई? इसमें आत्मा की तद्रूपता कहाँ हुई?

नन्हीं! जिसका जन्म ही नहीं हुआ, वह मरेगा भी क्या? वह तो सब करता हुआ भी कुछ नहीं करता।

नन्हीं! यह स्थिति प्राप्त करना अतीव कठिन है और अनेकों साधक गण इस स्थिति को पाने का यत्न करते हैं; किन्तु वह ज्ञान पर दृष्टि रखते हैं और विज्ञान को खो देते हैं। जब तक तुम अपने आप को पूर्ण रूप से भूल नहीं जाते, तब तक यह मान लेना कि तुम्हारी यह स्थिति है, एक भूल है। जब तन आपका नहीं होगा तो इसका जीवन में प्रमाण क्या होगा, इसे कुछ कुछ समझ ले।

क) तब आपके लिये आपका मान या अपमान कोई महत्व नहीं रखेगा। याद रहे, मान या अपमान तन का होता है, आपका नहीं।

ख) आप अपने तन की स्थापना के लिये कुछ भी नहीं करेंगे।

ग) आप के लिये बड़ा या छोटा काम कोई भी महत्व नहीं रखेगा।

घ) आप छोटे से छोटा काम भी उसी संलग्नता से करोगे, जिस संलग्नता से बड़ा कार्य करते हो।

ङ) आप किसी भी कार्य को अपनी हस्ती के नीचे नहीं समझेंगे।

च) आप किसी के लिये अपने मन में द्वेष नहीं रखेंगे।

छ) आप अपने तनो या मनो संरक्षण के लिये कभी कुछ नहीं करेंगे।

ज) फिर दूसरी ओर आप अपने सहयोगी तथा सहवासी गण के स्तर पर जाकर उन्हीं की सेवा करेंगे।

झ) जब आप से कोई प्रश्न करे तब आप अतीव स्पष्टवादिता से उत्तर देंगे, किन्तु यदि वह आपकी बात न माने तो आप बुरा नहीं मानेंगे।

ञ) आप नित्य अपना कर्तव्य करते रहेंगे। जिसके लिये आप सब कुछ करते हैं, वह चाहे आपको नित्य ठुकराता रहे।

नन्हीं ! यह जीवन के थोड़े से पहलू कहे है तुम्हारे लिये। इन बातों से तुम्हें कुछ कुछ तो समझ आ गया होगा कि आत्मवान् जीवन में कैसे होते हैं। जिनके जीवन में ऐसे गुण नहीं होते, वे आत्मवान् नहीं होते। पूर्ण शब्द ज्ञान जान लेने से भी जीव आत्मवान् नहीं बनता, जीवन में उसका प्रमाण चाहिये।

जो जीवन में आत्मवान् होते हैं, वे तनत्व भाव से, भोक्तृत्व भाव से, कर्तृत्व भाव से, देहात्म बुद्धि से, संग और मम भाव से रहित होते हैं। वे जीवात्म भाव से भी परे होते हैं।

गर जीवन में यह स्थिति न हो तो अपने कर्मों के तुम ही ज़िम्मेवार हो। तब तुम यही यत्न करो कि नित्य कर्तव्य ही करते जाओ। शनै: शनै: तुम्हारा कर्तव्य का दायरा बदल जायेगा।

नन्हीं! आत्मवान् लोगों के तद्रूप होकर उनकी स्थापना के लिये नित्य ही काज करते हैं और जब दूसरों के कष्ट दूर हो जाते हैं, तब वे मौन हो जाते हैं। जब तक दूसरे को उनकी ज़रूरत होती है, तब तक वह उनका साथ देते हैं। जब दूसरे की ज़रूरत ख़त्म हो जाती है, तब वे उससे मानो दूर हो जाते हैं।

नन्हीं ! जब तक दूसरे का काज नहीं ख़त्म हो जाता, तब तक ये लोग :

क) उसे अपना समय भी देते हैं।

ख) उसके कामों के लिये अनेक जगह उनके साथ भी जाते हैं।

ग) जैसी दूसरे की ज़रूरत हो, वैसा उससे व्यवहार भी करते हैं।

घ) प्यार, बातें और कर्म इत्यादि दूसरे के स्तर से करते हैं।

ङ) दूसरे की कार्य सिद्धि के लिये अनेकों बार उसे मनाते हैं और कभी उससे रूठ भी जाते हैं।

च) दूसरे की कार्य सिद्धि के लिये अनेकों बार उसी को डांटते हैं, अथवा उसके पांव पड़ जाते हैं।

किन्तु जब कार्य समाप्त हो जाये, तो ये ख़ामोश हो जाते हैं और किसी और के कामों में लग जाते हैं। जिसके काज ये पूर्व में करते रहे और जिसके काज अर्थ इतना समय देते रहे, तब वही इन्हें बेवफ़ा भी कह सकता है, क्योंकि कार्य सिद्धि के पश्चात् यह अन्य किसी की ज़रूरत की पूर्ति में लगे हुए अपने पहले ‘मालिक’ को समय नहीं दे सकते। यदि, जिसका कार्य सिद्ध हो चुका है, वह इनका साथ दे और दूसरों के कार्य सिद्ध करने में इनका हाथ बंटाये, तो उसका साथ निरन्तर बना रहे। क्योंकि साधारणतय: लोग यह नहीं करते, इस कारण आत्मवान् भी बेवफ़ा से लगते हैं। फिर देखा गया है कि लोग बातें बनाते हैं और स्वयं दूर हो जाते हैं, परन्तु जब पुन: मुसीबत आ जाये तो फिर इनके पास आ जाते हैं।

नन्हीं! और लोग इनका साथ छोड़ देते हैं। परन्तु ये तो उनके लिये वैसे ही बने रहते हैं। यदि काज करवाने वाले इनका साथ दें तो :

1. उन्हें भी अपना तन, मन तथा समय औरों के कार्य अर्थ देना पड़ेगा।

2. उन्हें भी अपना धन औरों के काज अर्थ देना पड़ेगा।

3. उन्हें भी अपनी सामर्थ्य औरों के अर्थ लगानी पड़ेगी।

4. उन्हें भी अनेकों बार झुकना पड़ेगा।

5. उनका भी अपमान होगा।

यह सब अचेत में ही सोच कर वे ऐसे लोगों का साथ छोड़ देते हैं और अनेकों बार उन पर दोष भी लगा देते हैं। लेकिन आत्मवान् प्रतिरूप में दूसरों से अपने लिये कुछ नहीं चाहते। उनके अपने दृष्टिकोण से मानो उनका तन एक पत्थर की मूर्त है। जो उनकी शरण में आता है, वे उसकी मनो कामना पूर्ण करने का यत्न करते हैं तत्पश्चात् वे पत्थर की मूर्त के समान कुछ नहीं कहते। तब दूसरों की मर्ज़ी है, वे उनके लिये कुछ करें या न करें। वे तो न किसी से द्वेष करते हैं, न ही किसी से राग करते हैं। ऐसे लोग सब करते हुए भी अपने को कर्ता नहीं मानते, नित्य अकर्ता ही मानते हैं।

Copyright © 2024, Arpana Trust
Site   designed  , developed   &   maintained   by .