Chapter 2 Shloka 49

दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय।

बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणा: फलहेतव:।।४९।।

Praising the Yoga of the Intellect, the Lord says:

O Arjuna! Actions are indisputably inferior

to the Yoga of the Intellect. Take refuge

in that Intellect, for those who are motivated

by the fruit of action are pitiable.

Chapter 2 Shloka 49

दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय।

बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणा: फलहेतव:।।४९।।

Praising the Yoga of the Intellect, the Lord says:

O Arjuna! Actions are indisputably inferior to the Yoga of the Intellect. Take refuge in that Intellect, for those who are motivated by the fruit of action are pitiable.

The Lord praises the attainment of Yoga with the Supreme through the intellect.

1. If the intellect realises the essence of Truth, then Yoga with the Atma will become easy to achieve.

2. If the intellect becomes discriminating – vivek, it will not be difficult for you to understand that you are the Atma.

3. Having realised the essence of Truth, your attachment with action will be severed.

4. If the intellect understands that you are not the body, it will become relatively easy to renounce body attachment.

5. If the intellect does not become subservient to the mind, the mind can never become an obstacle in the path of union with the Supreme.

6. If the intellect has not comprehended the difference between dharma and adharma, how can you then employ the principles of dharma in life?

The Lord now enjoins:

1. Elevate the intellect so that the Truth is revealed to you.

2. If the intellect does not accept the Truth, who can demonstrate its efficacy to the mind?

3. Detachment from the body is not possible except through the cooperation of the intellect.

4. Nor can attachment be subdued without the active collaboration of the intellect.

5. Only the intellect can illuminate the path to the Truth.

6. If the intellect is subdued, the mind will establish its supremacy.

7. If you do not attain the yoga of the intellect, then,

­­–  you will not be able to lead a life of yagya;

­­–  you will not be able to perform selfless actions;

­­–  you will not even be able to discharge your duties.

8. Only the intellect has the power to pacify the otherwise volatile mind.

9. The intellect has to cajole the mind, often using diplomacy and tact to lure it in the right direction.

10. The intellect can, through its efforts, help the mind to transcend all insults and indignities, which it would otherwise find intolerable.

11. If the intellect is armed with knowledge and wisdom, it can pacify the mind – or else it will also develop aberrations such as those which permeate the mind.

12. It is only the intellect of the sadhak or the aspirant of Truth which can become one-pointed and focused and thus induce the mind to merge in it. When Yoga is achieved, the intellect also merges in the Supreme.

The status of actions

1. The Lord is not censuring actions in this shloka.

2. He is merely referring to them as inferior to the intellect.

3. Actions must be performed, but they should be under the guidance of the intellect.

4. The intellect should predominate in all actions.

5. If the mind is the master, actions will become selfish and individualistic.

6. If actions become the servitors of one’s likes, they will become tyrannical and unjust.

7. If actions are subservient to objects, they will do much mischief and harm.

8. If actions, devoid of intellect, predominate, duty will be forgotten, the mind will be confused.

Little one, actions should be subordinated to the intellect or else they will go wrong. When the intellect becomes attached to the Atma and rules the mind, the one-pointed intellect emerges.

The Lord urges Arjuna to gain the refuge of such an intellect:

a) Do as the intellect dictates.

b) Do not let mental concepts and preferences hinder your path.

c) The intellect can discern between right and wrong.

d) If the intellect unites itself with the Atma and the mind is supportive, the individual will inevitably shed all attachments to his body and merge in his Supreme Goal.

e) If the mind is attached to the Truth and if the intellect obeys scriptural injunction to perfection, the individual can become an Atmavaan in a moment.

Of what consequence then are desires for the fruit of action? All actions will be hued with Dharma and the life of such a one will be a veritable Yagya or an offering to his Lord.

The Lord has never advocated the renunciation of actions. If the ‘I’ or the mind predominate action, then those actions will be dependent on likes and dislikes, desire, greed, moha, ego and the desire for recognition. Such actions are based on ignorance.

The Lord says that people who perform actions for their fruits are pitiable, petty and poverty stricken. They are misers, bereft of intellect, extremely forlorn and sad creatures. They become strangers to themselves and die without knowing themselves. On the other hand, the sadhak who diligently practises the Yoga of the intellect ultimately becomes an Atmavaan, the knower of the Supreme Self.

Actions are guided either by the mind or the intellect, and are therefore considered subservient to them. These very actions can also lead to internal purity depending on their inspiring source which makes them selfish or selfless.

अध्याय २

दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय।

बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणा: फलहेतव:।।४९।।

अब भगवान पुन: बुद्धि के योग को सराहते हुए कहते हैं!

शब्दार्थ :

१. हे अर्जुन! बुद्धि योग से कर्म निस्सन्देह न्यून हैं।

२. तू बुद्धि की शरण ग्रहण कर।

३. क्योंकि फल के हेतु कर्म करने वाले अति कृपण होते हैं।

तत्व विस्तार :

भगवान बुद्धि के स्तर पर परमात्मा से योग की श्रेष्ठता बताते हैं।

भगवान मानो कह रहे हों कि :

क) यदि तुम्हारी बुद्धि सत्त्व तत्व को जान गई, तब तुम्हारा आत्मा से योग आसान हो जायेगा।

ख) यदि तुम्हारी बुद्धि विवेकपूर्ण हो जाये, तब तुम्हें यह समझने में कठिनाई नहीं होगी कि तुम आत्मा ही हो।

ग) यदि बुद्धि सत्त्व तत्व सार को समझ गई, तो तुम्हारा कर्मों से संग मिट जायेगा।

घ) जब बुद्धि ने यह जान लिया कि तुम तन नहीं हो, तब तनत्व भाव त्याग भी सहज में हो जायेगा।

ङ) गर बुद्धि मन की नौकर न बने, तो मन भी परम मिलन की राहों में बाधा नहीं बन सकेगा।

च) धर्म तथा अधर्म की गर समझ ही न आये, तो धर्म का जीवन में अनुष्ठान भी कैसे कर सकोगे?

इसलिये भगवान कह रहे हैं कि :

1. अपनी बुद्धि को बुलन्द करो ताकि सत् समझ तो आ जाये।

2. गर आपकी बुद्धि ही सत् को न माने तो आपके मन को कौन समझायेगा?

3. तनत्व भाव त्याग बुद्धि के संयोग के बिना नहीं हो सकता।

4. संग भी बुद्धि संयोग बिना नहीं छोड़ पाओगे।

5. बुद्धि ही आपको सत् दर्शा सकती है।

6. गर बुद्धि गौण हो गई तो मनो राज्य हो जायेगा।

7. गर बुद्धि योग नहीं हुआ, तो:

क) जीवन यज्ञमय न बना सकोगे।

ख) निष्काम कर्म न कर सकोगे।

ग) कर्तव्य भी नहीं निभा सकोगे।

8. मन तो भड़क भी जाता है, बुद्धि ही इसे शान्त कर सकती है।

9. बुद्धि को अपने ही मन को मनाना होता है।

10. अनेक बार नीति की राह से भी मन को रिझाना होता है।

11. मन जब भी अपमान न सह सके, यदि बुद्धि इसे बहुत यत्न से समझाये तब मन उस अपमान की परवाह नहीं करता।

12. बुद्धि यदि ज्ञान पूर्ण और मेधावी हो तब ही वह मन को शान्त कर पायेगी, वरना बुद्धि भी मन के साथ विभ्रान्त हो जायेगी।

13. साधक की बुद्धि ही एकाग्र चित्त हो सकती है।

14. बुद्धि ही मन को अपने में लय कर सकती है।

यह योग गर सफल हो जाये तो बुद्धि की बात भी कौन करेगा? क्योंकि तब तो बुद्धि भी परम में लय हो जायेगी।

कर्म :

1. कर्म तुच्छ हैं, यह नहीं कह रहे।

2. कर्म बुद्धि से गौण हैं, यह कह रहे हैं।

3. कर्म बुद्धि के अनुवर्ती होने चाहियें।

4. कर्मों में बुद्धि प्रधान होनी चाहिये, यह कह रहे हैं।

5. गर कर्म मन के चाकर हुए तो व्यक्तिगत तथा स्वार्थपूर्ण हो जायेंगे।

6. गर कर्म रुचि के चाकर हो गये तो अत्याचार पूर्ण हो जायेंगे।

7. गर विषयों से संग हो गया तो न्याय भी भूल जायेगा।

8. कर्म गर विषयों के चाकर हो गये तो अनेकों अनर्थ करेंगे।

9. गर बुद्धि रहित कर्म प्रधान हुआ तो कर्तव्य भूल ही जायेगा और विभ्रान्त मनी हो जायेगा।

नन्हीं! कर्म बुद्धि के अधीन होने चाहियें। यदि कर्म बुद्धि की उपेक्षा करके किये जायें तो ग़लत हो जाते हैं। जब बुद्धि का आत्मा से संग हो जाये और मन पर राज्य हो जाये, तब ‘व्यवसायात्मिका बुद्धि’ का जन्म होता है। इस कारण भगवान कहते हैं अर्जुन को कि तू :

क) बुद्धि की शरण में जा।

ख) जो बुद्धि कहे उसका अनुसरण कर।

ग) मनोरुचि और मनो मान्यताओं को अपनी राहों में न आने दे।

घ) बुद्धि उचित और अनुचित का भेद समझ सकती है।

ङ) गर बुद्धि का संग आत्मा से है और मन बुद्धि की मानने वाला बन जाये तब जीव भगवान को पा ही लेगा।

च) बुद्धि गर सत् मय हो और मन उसकी माने तो साधक तनत्व भाव को सहज में ही छोड़ सकता है।

छ) मनो संग गर सत् से हो जाये और बुद्धि शास्त्र कथित मन्त्रों को अक्षरश: मान ले, तो जीव पल में आत्मवान् बन सकता है।

तब कर्मों से फल की चाहना की बात नहीं होगी, तब सम्पूर्ण कर्म यज्ञमय होंगे। तब सम्पूर्ण कर्म धर्मयुक्त ही होंगे। तब जीव का जीवन यज्ञमय ही होगा।

कर्मों का त्याग करने को भगवान ने कहीं नहीं कहा। यदि कर्मों में ‘मैं’ और मन प्रधान हुआ तो कर्म :

1. रुचि और अरुचि पर आधारित होंगे,

2. कामना पर आधारित होंगे,

3. लोभ पर आधारित होंगे,

4. मोह पर आधारित होंगे,

5. अहंकार पर आधारित होंगे,

6. मान की चाहना पर आधारित होंगे,

7. अज्ञानता पर आधारित होंगे।

भगवान कहते हैं फल के इच्छुक लोग कृपण होते हैं, लघु होते हैं, विवेकहीन होते हैं, निर्धन तथा कृपा के पात्र होते हैं, अत्यन्त दीन और दु:खी होते हैं।

नन्हीं! वे लोग तो जीवन भर अपने से बेगाने हो जाते हैं और अपने को बिन जाने ही मर जाते हैं।

दूसरी ओर बुद्धि योग का अभ्यास करते करते एक दिन साधक आत्मवान् बन जाता है।

कर्म को मन या बुद्धि ही प्रेरित करती है इसलिये कर्म बुद्धि से न्यून ही होते हैं, किन्तु कर्म ही जीव को पावन भी करते हैं। यह सब तो कर्म की प्रेरक शक्ति के गुणों पर आधारित है कि कर्म निष्काम हैं या कामना पूर्ण फल की चाहना से परिपूर्ण हैं।

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