Chapter 2 Shloka 52

यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति।

तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च।।५२।।

When the intellect is freed

from the quagmire of moha,

you will transcend all that you have heard

as well as all that should be heard.

Chapter 2 Shloka 52

यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति।

तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च।।५२।।

When the intellect is freed from the quagmire of moha, you will transcend all that you have heard as well as all that should be heard.

Moha (मोह)

First understand what is meant by the ‘quagmire of moha’.

1. A quagmire is one which enmeshes even more when one struggles to get out of it.

2. Moha is the veil of delusion which prevents one from viewing reality.

3. When moha arises it deludes one into seeing truth in falsehood and falsehood in truth.

4. To identify oneself with the inert body is one of the greatest delusions caused by moha.

5. It is moha which prevents one from discerning between the Atma and what is opposed to the Atma.

6. Ego, false pride and arrogance – all these comprise the mire of moha.

The Lord now says, when you are liberated from the mire of moha, what you have heard and all that is deserving of being heard, both become redundant. He who has transcended moha:

1. Is able to discern between the real and the unreal, between Atma and Anatma – that which is different from the Atma.

2. Such an Atmavaan renounces his sense of doership and his identification with the body.

3. He relinquishes attachment with the deeds performed by the body.

4. He does not attach himself to worldly enjoyments.

5. Worldly objects no longer possess any value for such a one.

6. Even the intellect that relates to the body no longer remains precious to such a one.

Such a one seeks nothing for himself from the world. A person gives importance to the objects of the world only as long as he remains attached to the body and is fettered by moha. Once he has cut asunder the bonds of attachment with his body, he no longer focuses on the objects that can be known only through the body. He who has attained such a state and who has transcended attachment, the Lord says of such a one, ‘He attains detachment both from the heard and that which is worthy of being heard.’

Little one, that which is ‘worthy of being heard’ is scriptural knowledge. The Scriptures are imperative for the aspirant of spirituality. They help us to see the reality and to transcend moha. Through them:

1. The ignorant can comprehend knowledge;

2. Ignorance can be banished;

3. The sadhak can perceive his true identity;

4. The intellect can gain purity;

5. One can comprehend the non-real or illusory and learn how to be free from it.

Until the sadhak becomes an Atmavaan, he must take support of these Scriptures and practice all that he hears. However, once he becomes an Atmavaan:

1. What can the Scriptures teach him? He has himself become the goal of the Scriptures.

2. The Scriptures are theory – his life is a practical elucidation of the Scriptures.

3. What can the Scriptures say to him, towards whom they look for their own verification?

4. The Scriptures are not a proof of spiritual living. They can only reveal the path of abidance in the Atma.

5. The Scriptures can only reveal to a small extent, the external signs of the Atmavaan. They cannot ever encompass the Atma in words.

Scriptural injunction becomes inessential for the Atmavaan because he has already imbibed all that the Scriptures say. His life illumines the word of the Scriptures. He has attained the divinity and purity described therein. He manifests the Unmanifest.

Little one! The body of such a one is visible, but the Master of that body no longer identifies with it. That which he hears or that which is worthy of being heard, no longer leave any impression on such a one.

Such people are called vairaagi or sanyasi or Atmavaan. They are always silent about themselves. They no longer identify with their body therefore they rarely speak of themselves. Whenever they do, they talk of their body as objectively as they would of another’s body. They are not attached to either. Since they are the practical manifestation of scriptural tenets, those who surround them become learned and conversant with the Scriptures merely by watching the life of such a one. Unfortunately, many such associates also become arrogant and take undue advantage of such a one’s qualities of love, forgiveness etc. of which he continually gives proof.

When the intellect transcends the mire of moha, it no longer relates to the body but to the Atma and remains completely untouched and uninfluenced by the world.

अध्याय २

यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति।

तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च।।५२।।

शब्दार्थ :

१. जब तेरी बुद्धि मोह रूपी दल दल से तर जायेगी,

२. तब तू सुनने योग्य और सुने हुए से,

३. वैराग्य को प्राप्त होगा।

तत्व विस्तार :

मोह :

मोह कलिल को प्रथम समझ ले :

1. मोह के कीचड़ को मोह कलिल कहते हैं।

2. मोह की दल दल को मोह कलिल कहते हैं।

3. जिसमें फंसो और फंसते ही जाओ, उसे कलिल कहते हैं।

4. मोह का आवरण ही मोह कलिल उत्पन्न करता है।

5. जब मोह उठ आता है तो मिथ्यात्व में सत् दर्शन होने लगते हैं।

6. वास्तविकता के दर्शन में विघ्न, मोह का आवरण ही होता है।

7. असत् में सत् का आभास और सत् में असत् का आभास मोह के कारण ही होता है।

8. फिर दूसरी ओर से जड़ तन को ही अपना मान लेना भी मोह के कारण होता है।

9. आत्म अनात्म का विवेक न होना भी मोह के कारण होता है।

10. अहंकार, दम्भ, दर्प, यह सब मोह का कीचड़ ही हैं।

अब भगवान कह रहे हैं कि जब तुम्हारी बुद्धि मोह के कीचड़ से तर जायेगी, तब तू जो सुन चुका है और जो सुनने योग्य है, उन दोनों के प्रति वैराग्य पा लेगा। जो जीव मोह से उठ जाता है, या कहें जो मिथ्यात्व को छोड़ देता है वह तो :

1. आत्म अनात्म विवेक को पा लेता है।

2. जीवन में आत्मवान् बन जाता है।

3. तनत्व भाव को छोड़ देता है।

4. कर्तृत्व भाव को छोड़ देता है।

5. तन के कर्मों से संग को छोड़ देता है।

6. तन के भोगों से भी संग नहीं करता।

7. भोक्तृत्व भाव को छोड़ देता है।

उसके लिये तो :

8. सांसारिक विषय कोई मूल्य नहीं रखते।

9. देहात्म बुद्धि का भी कोई मूल्य नहीं।

10. संसार में कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं रह जाता।

उसे तो अपने लिये संसार से कुछ भी पाना नहीं होता। संसार के विषयों तथा ज्ञान को जीव तब तक ही महत्व देता है, जब तक उसका अपने तन से संग और संग जनित मोह नहीं जाता। जब वह अपने तन से ही नाता तोड़ देता है तो जो विषय तन राही ही जाने जा सकते हैं, उन पर वह ध्यान नहीं देता। जिसने ऐसी स्थिति पा ली है और जो आत्मवान् हो गये हैं, उनके लिये भगवान कह रहे हैं कि ऐसे लोग, “सुनने योग्य और सुने हुए के प्रति” वैराग्य को प्राप्त करते हैं।</p>

नन्हीं! आज शास्त्र सुनने योग्य हैं क्योंकि इनकी सहायता से जीव मोह से तर सकता है।

1. अज्ञानी को ज्ञान समझ आ सकता है।

2. अज्ञान नष्ट हो सकता है।

3. स्वरूप की समझ आ सकती है।

4. बुद्धि निर्मल हो सकती है।

5. मिथ्यात्व की समझ आ सकती है।

6. मिथ्यात्व को छोड़ा जा सकता है।

जब तक साधक आत्मवान् नहीं हो जाता, सुनने योग्य को सुनना चाहिये; जो सुना है, उस पर विचार करना चाहिये और उस सुने हुए का जीवन में अभ्यास करना ही चाहिये।

किन्तु जब वह आत्मवान् हो जाये तब :

क) शास्त्र उसे क्या बता सकेंगे? वह तो स्वयं शास्त्रों का लक्ष्य बन जायेगा।

ख) शास्त्र तो शब्द ज्ञान है, वह तो स्वयं ज्ञान की प्रतिमा बन जायेगा।

ग) शास्त्र उसे क्या सिखा सकेंगे? शास्त्र तो अपनी व्याख्या का समाधान आत्मवान् के जीवन में पायेंगे।

घ) शास्त्र सप्राण प्रमाण नहीं है, वह उस आत्मवान् की ओर ले जाने वाले पथ की बातें कर सकते हैं।

ङ) शास्त्र आत्मवान् के बाह्य चिह्न थोड़े थोड़े बता सकते हैं, किन्तु आत्मा को शब्दों में नहीं बांध सकते।

जो आत्मवान् हो जाते हैं, वह शास्त्र कथन जो सुनने योग्य हैं, उन्हें सुन कर क्या करेंगे? जो शास्त्र कहते हैं, वह तो वह स्वयं बन चुके हैं। शास्त्र की जीती जागती प्रतिमा तो वह आप हैं। शास्त्र ज्ञान का विज्ञान रूप तो वह आप हैं। शास्त्र कथित अध्यात्म के प्रकाश स्वरूप वह आप हैं। शास्त्र कथित दिव्य विशुद्ध रूप तो वह आप हैं। शास्त्र कथित निराकार का आकार तो वह आप हैं।

नन्हीं! तुम उसका तन तो देखते हो, पर तन का मालिक तन में नहीं है, क्योंकि वह तन की तद्रूपता छोड़ चुके हैं। उन्हें सुनने योग्य या सुने हुए वाक्य प्रभावित नहीं करते। सुनने योग्य या सुने हुए वाक्य तो तनत्व भाव से बधित को अपने तन के नाते ही प्रभावित करते हैं।

उन्हें लोग वैरागी कहते हैं। उन्हें लोग संन्यासी कहते हैं। उन्हें लोग आत्मवान् कहते हैं। वह तो स्वयं अपने प्रति नित्य मौन ही रहते हैं। उनका अपना तन ही नहीं, इस कारण वह अपनी बात कम ही करते हैं। यदि लोग उनके तन की ही बातें करें, तब वह जैसे दूसरे की बात कर सकते हैं, वैसे ही अपने तन की भी बात कर देते हैं। उनके लिये उनका अपना तन भी दूसरे के तन के समान एक विषय ही है। शास्त्रों का प्रमाण वह स्वयं होते हैं, इस कारण वह अनेकों बार अपना निजी प्रमाण तथा उपमा देते हैं। उनका जीवन ही शास्त्र की व्याख्या होता है, इस कारण उनके सहवासी गण सब ज्ञानीवत् हो जाते हैं। अधिकांश देखा गया है कि ऐसे लोगों के समीपवर्ती काफ़ी उद्दण्डी होते हैं और आत्मवान् का फ़ायदा उठाने वाले होते हैं। यह इस कारण होता है क्योंकि आत्मवान् अपनी वफ़ा इत्यादि का प्रमाण देते हैं, उनसे फ़ायदा उठाने वाले जानते हैं कि वह उन्हें छोड़ेंगे नहीं, उनसे फ़ायदा उठाने वाले जानते हैं कि वे जो मर्जी कर लें, यह अप्रभावित ही रहेंगे।

किन्तु मोह कलिल से जब बुद्धि तर जाती है तो देहात्म बुद्धि न रह कर यह आत्मबुद्धि हो जाती है। यह बुद्धि बाह्य तथा तनो संसार से नित्य अप्रभावित रहती है और आत्मा में स्थित हो जाती है।

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