Chapter 2 Shloka 13

देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारम् यौवनम् जरा।

तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति।।१३।।

Bhagwan elaborates on the eternal Atma and the transient body:

Just as an embodied soul passes

from childhood to youth and old age,

similarly it attains a new body (after death).

The wise are not deluded by this.

Chapter 2 Shloka 13

देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारम् यौवनम् जरा।

तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति।।१३।।

Bhagwan elaborates on the eternal Atma and the transient body:

Just as an embodied soul passes from childhood to youth and old age, similarly it attains a new body (after death). The wise are not deluded by this.

Little one! Just as you abide in your present body, having left childhood behind and entering into adulthood, soon your youth will pass into old age and then into death. You had similar bodies in previous lives and this sequence will continue. Your following lives will meet the same fate:

1. Each time you will be born in a different family.

2. You will have a different form and name.

3. You will have different relatives.

4. Your situation will be different.

5. Your race may be changed.

6. Your intellect and education will be different.

7. Your status in life will be different.

8. Then you will call that new body ‘mine’ and its kin will become your relations.

Therefore, the Lord stipulates:

a) Make every endeavour to make the world a nicer place to live in, because you will again come to live here.

b) Establish dharma in the world so that your birth takes place in a family that upholds dharma.

c) Perform your duty so that your rebirth occurs in an atmosphere where duty is predominant.

Little one,

1. They who understand this secret of living do not grieve over the death of the body. They transcend the fear of death and are detached from the body.

2. They who know of the transience of the body and the uncertainty of life, are neither sorrowful about death nor excessively joyous about birth.

3. They are not unduly attached to personal relationships. They are not gripped by moha.

Little one!

a) The Atma is immortal and indestructible.

b) It is eternal.

c) The body consciousness is due to the blemishless Atma that abides in it.

d) This relationship between the life giving Atma and the inert body is timeless.

e) The body is merely a gross image which appears to possess the life giving qualities of the Atma that abides in it. All the activities of the body are due to the Atma.

f) Attachment to this inert body is foolishness for it is bound to leave you.

Little Sadhika, see for yourself,

1. You take such immense pride in this flesh whose very definition is death.

2. You seek to establish it in the world and in doing so, you commit so many sins!

3. This body is not loyal to you – you should understand that you are not the body.

4. It is merely a temporary vehicle of the Atma – therefore any effort to establish it, is sheer waste of time.

O Sadhak! Know yourself for what you really are, or else you will live as a stranger to yourself and die as a stranger. When one dies, one dies alone. Your own Self is your sole companion, life after life. Therefore, for your own good, to ensure your happiness life after life, live a dutiful life replete with divine qualities. That will ensure not only your own wellbeing, but will also be of universal benefit. The establishment of the qualities of the Supreme is your foremost duty. Perform it diligently.

The Lord reiterates, the dhir purusha, or one who possesses a healthy, unblemished and stable mind, knows of the essence of the Atma and its relationship with the body and is not anguished nor sorrowful at death. Such a one abides in complete peace.

The dhir purusha is one:

a) who possesses a healthy attitude;

b) who is devoid of all negative attributes;

c) who is of a stable mind;

d) who is of firm resolve;

e) who retains his equanimity even in the face of opposition;

f) who is in possession of a stable intellect;

g) who is strong, wise, shrewd and extremely courageous.

Such a one, whose mental tendencies are ever quiescent, is never gripped by sorrow.

अध्याय २

देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारम् यौवनम् जरा।

तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति।।१३।।

भगवान पुन: आत्मा की नित्यता तथा तन की नश्वरता की बात कहते हैं :

शब्दार्थ :

१. जैसे देही को इस देह में,

२. लड़कपन, जवानी और वृद्धावस्था प्राप्त होती है,

३. वैसे ही उसको दूसरे शरीर की प्राप्ति भी होती है।

४. इस विषय में धीर पुरुष,

५. धोखा नहीं खाता है।

तत्व विस्तार :

नन्हीं! जैसे तू जीवात्म रूप इस अपने आधुनिक तन में रहती है; तुम्हारा तन अभी अभी बचपन पीछे छोड़ कर आया है, इस पल जवानी में कदम धर रहा है, कुछ ही काल के पश्चात् यह जवानी मानो बुढ़ापे से खेलने लगेगी, फिर बुढ़ापा आ जायेगा, तत्पश्चात् यह तन मृत्यु को पा जायेगा। ऐसे ही तुम्हारे पास पहले भी अनेकों तन थे, जिनकी यह गति हुई और ऐसे ही अनेकों तन तुझे आगे भी मिलेंगे, जो यही गति बार बार पायेंगे।

1. तुम्हारा जन्म फ़र्क कुल में होगा।

2. तुम्हारा नाम और रूप फ़र्क होगा।

3. तुम्हारे नाते रिश्ते फ़र्क होंगे।

4. तुम्हारी परिस्थिति फ़र्क होगी।

5. तुम्हारी जाति फ़र्क हो सकती है।

6. तुम्हारी समझ फ़र्क हो सकती है।

7. तुम्हारी मानसिक अवस्था फ़र्क हो सकती है।

8. तुम्हारी पढ़ाई तथा ज्ञान की अवस्था फ़र्क हो सकती है।

यानि, जो भी आज तुम्हारे हैं, वह तुम्हारे नही होंगे, कोई और होंगे।

भई! हर एक कुल में तुम्हारा नाम, कुल, समाज, धर्म, जाति, रूप, अमीरी या गरीबी की अवस्थायें सब बदल जायेंगी। फिर नये तन को अपनाकर उसे ही ‘मैं’ कहने लगेगी और उसके नातों को ‘मेरा’ कहने लगेगी। फिर नई तनो अवस्था को अपना लेगी और उसकी परिस्थितियों को अपना लेगी। भगवान् यहाँ यही कह रहे हैं। इसलिये ही तो कहते हैं :

क) जग को सुन्दर बनाने के यत्न करो, तुमने फिर यहीं पे आना है।

ख) जग में धर्म स्थापित करो ताकि तुम्हारा जन्म धर्मात्मा कुल में हो।

ग) अपना कर्तव्य करो ताकि पुनर्जन्म कर्तव्य परायण लोक में हो।

नन्हीं जान्!

1) जो यह तत्व सार जान लेते हैं, वे अपनी या औरों की मृत्यु पर शोक नहीं करते, दु:खी नहीं होते।

2) जो इस जन्म मरण के राज़ को जान लेते हैं, वे मृत्यु भय से अतीत हो जाते हैं और तन से उठ जाते हैं।

3) जो तनोगति या आयु की क्षण भंगुरता जान लेते हैं, वे मृत्यु भय से अतीत हो जाते हैं और जन्म मरण से नहीं घबराते, तथा हर्ष अथवा शोक नहीं करते।

4) वे जीवन या मरण की बातों से धोखा नहीं खाते, मोहित नहीं होते।

5) जो जीवन और मरण के राज़ को जानते हैं, वे अपने तन से या नाते बन्धुओं से मोह नहीं करते, संग नहीं करते।


क) आत्मा अक्षर और अविनाशी है।

ख) आत्मा शाश्वत् तथा अव्यय है।

ग) तन में चेतना आत्मा की है।

घ) आत्मा नित्य निर्विकार है।

ङ) जड़ तन और चेतन आत्मा का सम्बन्ध नित्य बना रहता है।

च) चेतन आत्मा के गुण जड़ तन में नहीं होते, केवल तन में भासित से होते हैं।

छ) तन तो एक मूर्ति है, जब तक इसमें आत्मा है, तब तक यह चेतन होती है और चलती, फिरती और बोलती है।

ज) इस मूर्ति से संग अच्छा नहीं; यह तो तुझे निश्चित ही छोड़ जायेगी।

झ) इस मूर्ति से संग मूर्खता है, इससे मोह मूर्खता का अन्दाज़ है।

नन्हीं साधिका! तू स्वयं देख ले कि :

1. एक मृत्यु धर्मा तन पर तू नाज़ और गर्व करती है।

2. एक मृत्यु धर्मा तन को तू जग में स्थापित करना चाहती है।

3. एक मृत्यु धर्मा तन के लिये तू संसार में कितने पाप करती है।

4. यह तन तो है ही बेवफ़ा, यह तो तुम्हें छोड़ ही जायेगा, तू यह क्यों नहीं समझ जाती और इससे संग छोड़ देती?

5. तन तुम्हारी कुछ देर की सवारी तो है पर तू तो तन नहीं, यह समझ ले।

6. जितने भी यत्न इस तन की स्थापना के लिये करेगी, वह केवल समय को नष्ट करना है। यदि किस्मत से यह स्थापित हो भी गया फिर भी तो साथ छोड़ जायेगा और यह नाता टूट जायेगा।

साधक! तू अपने आपको पहले जान तो ले, पहचान तो ले, वरना तू अपने आपको बिन जाने ही जीयेगा और फिर मर जायेगा। तुम्हारे साथ किसी ने नहीं जाना और तुम्हारा साथ किसी ने नहीं देना। जन्म जन्म का साथी तेरा अपना आप है।

अपने लिये, अपने ही कल्याण के लिये, अपने ही जन्म जन्म के सुख के लिये, जहान में कर्तव्य कर, भागवद् गुण जीवन में व्यय कर। इसी में लोक कल्याण है, इसी में तुम्हारा भी कल्याण है। सो घबरा नहीं, शोक न कर, परम गुण स्थापित करना ही तेरा एकमात्र कर्तव्य है। तू अपना कर्तव्य करता जा।

भगवान कहते हैं धीर पुरुष यह तत्व जानते हैं। वे घबराते नहीं, वे धोखा नहीं खाते, वे शरीरों को जाता देख कर व्याकुल और शोकग्रस्त नहीं होते।

लाडली! धीर का अर्थ समझ ले!

क) ‘धीर’ स्वस्थ चित्त वाले को कहते हैं।

ख) विकार रहित चित्त वाले पुरुष को धीर कहते हैं।

ग) स्थिर मन वाले को धीर कहते हैं।

घ) दृढ़ निश्चय वाले को भी धीर कहते हैं।

ङ) विपरीतता में भी प्रशान्त तथा सौम्य व्यक्ति को धीर कहते हैं।

च) स्थिर बुद्धि वाले को भी धीर कहते हैं।

छ) बलवान्, बुद्धिमान तथा चतुर को भी धीर कहते हैं।

ज) अतीव धैर्यवान् को भी धीर कहते हैं।

नन्हीं! जिसके पास अथाह धैर्य होता है, वह सब कुछ बर्दाश्त कर सकता है। उसका मन नहीं डोलता, उसकी चित्त वृत्तियाँ शान्त रहती हैं। ऐसा धीर पुरुष शोक ग्रसित नहीं होता।

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