Chapter 2 Shloka 17

अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम्।

विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित् कर्तुमर्हति।।१७।।

Having described the difference between the Real and the unreal,

Lord Krishna delves further into the eternal nature of the Atma:

Understand That alone to be indestructible,

which pervades the entire universe; no one

can cause the destruction of that immutable Essence.

Chapter 2Shloka 17

अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम्।

विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित् कर्तुमर्हति।।१७।।

Having described the difference between the Real and the unreal, Lord Krishna delves further into the eternal nature of the Atma:

Understand That alone to be indestructible, which pervades the entire universe; no one can cause the destruction of that immutable Essence.

That Atma is indestructible, eternal, never increasing or decreasing, ever complete and unexpendable. The whole world is pervaded by It.

1. All the names and forms of the universe abide in It and are imbued by It.

2. Naught exists apart from It.

3. Even after distributing Itself all over the world, It still remains whole and complete.

4. It is the support of the Universe and encompasses the gross, subtle and causal spheres.

5. Life and death are also within Its scope.

6. It is complete in every way.

Little one, the Lord is making it explicit that:

a) The individualistic ego is futile;

b) Fear of death and rebirth is pointless;

c) One should not be attached – even with the Truth;

d) The unreal is based on illusion in any case. Arjuna and the Pandavas had long since renounced the unreal.

Realise your true essence to be the Atma. Therefore pride in one’s own goodness or attachment to any qualities also has no place. These attributes are of the body and lead one away from the Atma, one’s true Self. One should become totally detached towards oneself. The body comes and goes, why get attached to it, why be apprehensive about its death?

Bhagwan Krishna is urging Arjuna to transcend the frailty enfeebling his senses and fight. Arjuna had taken fright on seeing his relations on the battle field – he did not want to fight them. By calling it a Dharma Yudh’ (a war of righteousness) the Lord is implying that the Kauravas are treading the path of untruth and the Pandavas have chosen the path of Truth. A war between the two is desirable so that Truth may once again prevail.

a) Therefore followers of the Truth must wage war against the untrue;

b) Those on the path of untruth must be vanquished;

c) Those who must fight this war will have to renounce their lifelong concepts and vanquish the foe even if the latter happens to be a friend or a relative.

A Dharma Yudh is a fight between the truth loving and those who augment untruth in the world.

1. This war was first fought by the devtas or gods and the asuras or the demons.

2. A dharma yudh takes place between the sanyasi or renunciate and those desirous of worldly gain.

3. A dharma yudh is fought by those who stand to protect dharma against those who perpetrate adharma.

4. A dharma yudh involves those who love divine qualities and those who are of evil conduct.

5. A dharma yudh is fought by those who desire the welfare of all beings against those who work only for the fulfilment of selfish desires.

Even today, the war between the devtas and the asuras persists.

How can the demoniac element of society be annihilated unless the devtas or godly souls plunge into war with them? The Lord is insisting here that the devtas must not be attached to their virtuous reputation. They must take up the responsibility of the dharma yudh. The welfare of all beings lies in this, therefore this is their dharma and the proof of their devotion to the Lord. Their love and devotion towards the Truth will only be proved if they can protect the weak and oppressed from the tyranny of the evil doers. Just preaching inside a temple will not achieve anything when one does not become an alleviator of others’ sorrows.

This in fact is sanyas in practice. Lord Krishna is explaining the Essence of the Atma to Arjuna, a scion of a race which upheld nobility, greatness and dharma in thought, word and deed. Arjuna’s family, a family which always followed the right path, was full of divine qualities. They, however, had become attached to their quality of sattva(goodness). They who could not think of harming anyone, yet were used to enduring terrible atrocities themselves – they now had to learn to transcend both sat and asat and fight the war of righteousness.

The Lord is not repeating the knowledge that Arjuna already possessed – the knowledge of the Truth. With the help of that knowledge, he had conquered both tamas and rajas and now abided in sattva. The Lord now urges Arjuna towards the state of a gunatit. Arjuna had already learned to be unaffected by the qualities of others, now the Lord leads him towards transcendence of his own qualities. As long as his attachment with the attribute sattva remained, Arjuna could not have fought this war, nor proceeded towards spiritual upliftment.

For this reason the Lord explains the indestructible nature of the Atmaand says to Arjuna:

1. The Atma is immortal.

2. Both sat and asatcease to matter after a point.

3. No one can annihilate the Atma.

4. So do not be attached to either and do your duty.

5. Do not be attached to the external form (the body) and do your duty.

6. Fulfil your duty towards the attributes of the Supreme.

7. Be it your guru or your grandsire, if such a one supports the wicked, he too is an asura or demon.

8. To lie low before the demoniacal does not behove one who possesses divine qualities.

9. Protection of those who are suffering is the dharma of the sadhu.

Therefore, O greatest among men, Arjuna! Arise and fight! This is your duty and your sole dharma. In this lies your love for the Supreme.

अध्याय २

अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम्।

विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित् कर्तुमर्हति।।१७।।

असत् और सत् में भेद बता कर अब भगवान अविनाशी आत्म तत्व की बात कहते हैं :

शब्दार्थ :

१. और अविनाशी तो तू उसको जान,

२. जिससे यह सम्पूर्ण व्याप्त है।

३. उस न घटने वाले तत्व का

४. विनाश कोई भी नहीं कर सकता।

तत्व विस्तार :

अब भगवान आत्म तत्व की बात समझाते हैं कि वह अविनाशी है, वह अव्यय तत्व है, जिसका कभी नाश नहीं होता। जो नित्य शाश्वत् तथा अक्षर है, जो अक्षय सनातन तत्व है, वह आत्म तत्व अव्यय है।

अव्यय, यानि :

1. जो अपरिवर्तनशील हो,

2. जो नित्य अखण्ड रहे,

3. जो न कम हो सके, न कभी बढ़ सके,

4. जो ख़र्च न किया जा सके।

आत्म तत्व अविनाशी तथा अव्यय है और सम्पूर्ण जगत उसी से व्याप्त है यानि:

क) संसार के सम्पूर्ण नाम तथा रूप उसी में तथा उसी से व्याप्त हैं।

ख यह सब, वह अविनाशी तत्व आप ही है और उसके सिवा अन्य कुछ भी नहीं।

ग) यह सम्पूर्ण नाम रूप धर कर भी वह पूर्ण ही रहता है और उसमें कोई कमी या अधिकता नहीं आती।

घ) पूर्ण सृष्टि का आधार वह आत्म तत्व आप ही है।

ङ) पूर्ण सृष्टि में सर्वव्यापी वह आत्म तत्व आप ही है।

च) स्थूल, सूक्ष्म या कारण रूप वह आत्म तत्व आप ही है।

छ) भई! इस संसार में जो कुछ भी होता है, उसी में होता है, उसी से होता है।

ज) जन्म मृत्यु भी उसी में और उसी से होते हैं।

झ) वह तो अखण्ड है।

नन्हीं! यह सब कह कर भगवान समझा रहे हैं कि :

1. यह व्यक्तिगतता का अहंकार जो जीव में आ गया है, व्यर्थ है।

2. जन्म या मृत्यु का भय निरर्थक है।

3. सत् से भी संग नहीं होना चाहिये।

4. असत् तो मिथ्या है ही, उसका त्याग तो अर्जुन तथा पाण्डवगण पहले ही कर आये थे।

5. जीव को अपनी साधुता का भी गुमान हो जाये तो ठीक नहीं। उसे अपनी किसी गुण प्रणाली से संग नहीं होना चाहिये। उसे अपने प्रति नितान्त उदासीन हो जाना चाहिये, क्योंकि वह आत्मा है। जीव अपने आपको नश्वर तन से नाहक बांध लेता है। तन तो आनी जानी चीज़ है, इससे संग कैसा? तो फिर इसकी मृत्यु से भय कैसा?

देख नन्हीं! भगवान अर्जुन को युद्ध करने के लिये कह रहे हैं और उसकी व्याकुलता को हरने का यत्न कर रहे हैं। भगवान अर्जुन के ‘इन्द्रिय शुष्क कर’ शोक की निवृत्ति करने के यत्न कर रहे हैं।

अर्जुन अपने नाते तथा बन्धुओं को देख कर घबरा गये थे। उन्हें वह मारना नहीं चाहते थे। ‘धर्म युद्ध’ कह कर मानो भगवान ने कहा कि कौरव गण तो असत् पर चल रहे हैं, पाण्डव गण सत् का अनुसरण कर रहे हैं। सत् और असत् का युद्ध होना ही चाहिये, ताकि पुन: सत् स्थापित हो सके।

क) इसलिये सत् अनुयायियों को भी युद्ध करना ही पड़ेगा।

ख) असत् अनुयायियों को मारना ही पड़ेगा।

ग) जीवन भर की मान्यता को छोड़ना पड़ेगा। चाहे सामने अपने ही मित्र या बन्धु खड़े हों, उनको भी मारना ही पड़ेगा।

जब सत् स्थित लोगों में और असत्वर्ती दुराचारियों में युद्ध होता है, तब इसे धर्म युद्ध कहते हैं। यह युद्ध तो :

क) देवताओं और असुरों में आरम्भ हुआ था।

ख) संन्यासी और कामना पूर्ण लोगों में हुआ था।

ग) धर्मपरायण तथा अधर्म फैलाने वाले लोगों में हुआ था।

घ) भागवद् गुणों से प्रेम करने वालों और दुराचारियों में हुआ था।

ङ) सर्व हितकर लोगों में और केवल निज चाहना पूर्ति करने वालों में हुआ था।

च) आज भी यह युद्ध देवताओं और असुरों में हो रहा है।

देवता गण जब तक रण में नहीं उतरेंगे, तब तक असुरत्व कैसे ख़त्म होगा? भगवान यही समझा रहे हैं कि यह युद्ध अनिवार्य है। देवता गण तथा साधु संन्यासी लोगों को अपने सद्गुणों से संग नहीं करना चाहिये। उन्हें ऐसे युद्ध का बीड़ा उठाना ही होगा। यही साधुओं का धर्म है। इसी में वास्तविक लोक कल्याण है! इसी में वास्तविक परम सत् की भक्ति निहित है! असहाय तथा निर्बल लोगों की सहायता करना साधुओं का धर्म है। पीड़ित लोगों की पीड़ा हरना साधु का धर्म है। मन्दिर में बैठ कर लाख भगवान के गुण गाईये, उससे अन्यायी के अत्याचार ख़त्म नहीं होंगे। वह ज्ञान का प्रवचन किस काम का, जो अखिल भूतों का दु:ख विमोचक न बन जाये?

यहाँ पर भगवान संन्यास का व्यावहारिक स्तर पर आचरण पथ समझा रहे हैं और आत्मा की बातें कर रहे हैं।

1. भगवान, एक महा ज्ञानवान् तथा महात्मा, धर्मात्मा कुल सदस्य अर्जुन को यह परम ज्ञान समझा रहे हैं।

2. अर्जुन का कुल दैवी सम्पदा पूर्ण कुल था जो नित्य सत् धर्म का अनुष्ठान करता रहा था। परन्तु उस कुल का सत् गुण से संग हो गया था।

3. जिस कुल वाले दूसरों को कष्ट देना पसन्द नहीं करते थे और वह महान् तथा भीषण अत्याचार सहने के आदी थे, भगवान उन पाण्डवों को सत् असत् से परे अविनाशी तत्व के विषय में समझा कर, उन्हें युद्ध में नियोजित करना चाह रहे हैं।

जो ज्ञान अर्जुन को पहले ही आता था, भगवान वह नहीं कह रहे। वह तो सत् ज्ञान था, उसकी सहायता से मानो, वह तमोगुण तथा रजोगुण को जीत कर सतोगुण में स्थित हुए थे। अब भगवान अर्जुन को गुणातीतता की ओर ले जाने के यत्न कर रहे हैं।

लोगों के गुणों के प्रति तो वह पहले ही उदासीन थे, अब भगवान उन्हें उनके अपने गुणों के प्रति भी उदासीन बना रहे हैं; क्योंकि, यदि सतोगुण से संग रहा तो वह युद्ध नहीं कर सकेंगे और आत्म उन्नति भी नहीं कर पायेंगे।

इस कारण भगवान अर्जुन को आत्म तत्व की अनश्वरता का राज़ सुझा रहे हैं और कहते हैं कि :

1. आत्मा अमर है।

2. सत् और असत् दोनों का अन्त हो जाता है।

3. आत्मा का कोई नाश नहीं कर सकता।

4. तू इन देहों से संग मत कर और अपना कर्तव्य कर।

5. तू अपने और दूसरे के देह से संग मत कर और परम के गुणों के प्रति अपना कर्तव्य निभा।

6. गुरु हो या पितामह, जब वह अत्याचारियों का साथ देते हैं तो वह भी असुर ही हैं।

7. असुरत्व के पास झुक जाना दैवी गुण को शोभा नहीं देता।

8. असुरत्व मिटाव ही देवत्व का धर्म है।

9. पीड़ित लोगों का संरक्षण ही साधु का कर्तव्य है।

सो, हे पुरुष श्रेष्ठ! उठ! और युद्ध कर। यही तुम्हारा कर्तव्य है और यही तुम्हारा केवलमात्र धर्म है। इसी में भागवद् प्रेम निहित है।

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