Chapter 2 Shloka 14

मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदु:खदा:।

आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत।।१४।।

Now the Lord explains that we recognise the external world through our senses:

O Arjuna, son of Kunti! Heat and cold,

pleasure and pain are all experienced through touch;

therefore they are only temporary.

Hence O son of the Bharat dynasty, you must tolerate them.

Chapter 2 Shloka 14

मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदु:खदा:।

आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत।।१४।।

Now the Lord explains that we recognise the external world through our senses:

O Arjuna, son of Kunti! Heat and cold, pleasure and pain are all experienced through touch; therefore they are only temporary. Hence O son of the Bharat dynasty, you must tolerate them.

Little one! The Lord says to Arjuna “You now know the impermanence of the body. You also know of the immortal nature of the Atma. Know also that all the joys and sorrows of the world are experienced through the contact of the body. Information regarding the objects of the world reaches us through the senses.

First understand the sensory contact:

1. The eyes touch the objects of the world through vision and thus the person gains knowledge through sight.

2. The ears hear sounds and are thus able to discern words.

3. The skin touches the objects and gives us information about them.

4. The nostrils inhale a fragrance and communicate knowledge of the smell of that particular object.

5. The tongue also discerns taste through contact with that object.

Thus it is the sense organs which make the initial contact and our mind and intellect partake of the essential quality of every such contact, giving rise to joy and sorrow.

Knowing that this entire process is merely a play on the sensory plane – a play of this body which is in any case subject to death, be not perturbed or joyous with it. Whatever is, is; to fight it is futile. And of what avail is it to continue to crave for what you have not? Why hinge likes and dislikes on the transient play of the sense organs?

More so, little one, just as the seasons come and go, so also joy and sorrow are fleeting:

1. Circumstances are ever changing.

2. Sometimes we are flooded with what we like, and at other times we are left with what we dislike.

3. At times we find one object pleasant, and at other times we find it unpleasant.

4. The moment of contact will also pass and parting is inevitable.

5. The moment that has passed shall never return, it has gone forever; the moment that shall come will also pass into the tunnel of time and will again be left in the past.

Little sadhak, if this body is steadily moving towards death, can joy and sorrow which are experienced by this body last long? Therefore endure every trial with a smile.

Now understand the concepts of heat and cold – ushan and sheeth

Sheeth (शीत)

1. Sheeth resembles ice;

2. Ice is constituted of water, yet the water is not evident;

3. Sheeth can eliminate life;

4. When the mind is sheeth or frigid, it is devoid of love;

5. Sheeth also refers to the inanimate and the one who is devoid of intelligence;

6. Sheeth indicates one who is unenthused – it also indicates a friendless state; sheeth also connotes death.

Ushan (ऊष्ण)

1. Ushan connotes heat.

2. Anger, a high temperature, sharpness – all these are indicated by the word ushan.

3. Hell is also ushan.

The Lord is implying here:

a) If you encounter people without any love or feelings, know that they too, are only gross contacts of the world.

b) If you meet those who sear you with their emotions, even then you must remain unaffected. If you learn to remain unaffected by both, you will be rid of sorrow. If you encounter a situation that is not to your liking, even then:

–  you will remain unaffected by duality;

–  your mind will not be fettered by moha;

–  perturbing thoughts and tendencies will not arise in your mind;

–  excessive attachment and hatred – likes and dislikes – will not touch you;

–  your heart will remain at peace – no matter whether you encounter good or bad.

Sorrow arises when you encounter an unpleasant situation or someone says something which you don’t like. When what you like is taken away from you and you are faced by the unpleasant or the troublesome, or if someone points out your negative traits or lacunae, sorrow overcomes you. When you receive the opposite of this, you are happy. Therefore, it seems that your joy and sorrow are both dependent on others.

The Lord reminds us that these passions pertain to the body and are carried to the person through the contact of his sense organs.

Thus, the Lord says that when you know that the body is a temporary phenomenon, why should you let happiness or sorrow affect you?

1. Do not dwell on positive or negative circumstances. Take both with a smile.

2. Concentrate only on doing your duty most effectively. Then,

–  Your bodily attachment will dwindle.

–  If bodily attachment is loosened, the ego too, will be annihilated and deep-rooted convictions will die a natural death.

–  Fear of death will cease.

–  Your love will be for the Truth – for divine attributes and not for individuals.

Consequently you will fight on the side of justice, no matter who stands before you – even death cannot deter you.

अध्याय २

मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदु:खदा:।

आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत।।१४।।

अब भगवान समझाते हैं कि स्थूल जग के सम्पूर्ण गुणों का परिचय तन के राही होता है और कहते हैं :

शब्दार्थ :

१. हे कुन्तिपुत्र अर्जुन!

२. सर्दी, गर्मी और सुख दु:ख का सम्बन्ध स्पर्श मात्र ही है;

३. इस कारण वह आने जाने वाला और अनित्य है;

४. इस कारण हे भरतवंशी अर्जुन! उनको तू सहन कर।

तत्व विस्तार :

नन्हीं जान्! अब भगवान आगे समझाते हैं, ‘हे अर्जुन! जब तन की अनित्यता को जान गये और आत्मा के अमरत्व का राज़ जान लिया तो यह भी जान ले कि संसार के सम्पूर्ण दु:ख सुख इस तन के राही ही अनुभव में आते हैं। इन विषयों की प्रतीति इन्द्रियों के कारण ही होती है।’

स्पर्श मात्र को प्रथम समझ ले :

क) नेत्र दृष्टि राही विषयों को स्पर्श करते हैं तब विषयों के दर्शन की अनुभूति होती है। यानि दर्शन राही विषयों की जानकारी होती है।

ख) श्रोत्र श्रवण राही शब्द का स्पर्श करते हैं तब शब्द की जानकारी होती है।

ग) त्वक् स्पर्श राही विषयों का अनुबोध करवाता है।

घ) नासिका गन्ध के स्पर्शन् से गन्ध की मात्रा की प्रतीति करवाती है।

ङ) जिह्वा भी विषय सम्पर्क से ही विषय का स्वाद बताती है।

अत: संसार की प्रतीति तन की इन्द्रियों राही ही होती है। तत्पश्चात् मन और बुद्धि हर स्पर्श के रस का उपभोग करते हैं और दु:खी सुखी होते हैं। यह सब :

1. स्पर्श का ही खिलवाड़ है।

2. तनो-इन्द्रियगण का खिलवाड़ है।

3. उसी तन का खिलवाड़ है, जो मृत्यु धर्मा है, जो आना जाना है।

सो तू दु:खी सुखी न हो। इन सब बातों को तू उदासीनवत् सहन कर।

बाह्य जो है, सो तो है ही, उससे भिड़ने से क्या होगा और जो है ही नहीं, उसको चाहने से क्या होगा? फिर जो भी रुचिकर या अरुचिकर बन जाता है, वह भी तो इन्द्रियों के कारण ही बनता है।

फिर नन्हीं, समझ! ऋतु ज्यों आनी जानी है, बदलती रहती है, त्यों सुख दु:ख भी आते जाते रहते हैं।

1. परिस्थिति बदलती रहती है।

2. कभी रुचिकर मिल जाता है और कभी अरुचिकर मिल जाता है।

3. कभी वही विषय भला लगता है और कभी वही विषय बुरा लगता है।

4. जो पल बीत गया वह तो बीत गया, वह पुन: लौट कर नहीं आयेगा।

5. इस पल जो सम्पर्क है, वह भी कभी तो बिछुड़ जायेगा।

6. जो आगे आ रहा है, वह भी तो व्यतीत हो जायेगा और पीछे रह जायेगा, वह अतीत हो जायेगा।

नन्ही साधिका! जब यह तन, जिसे अपना कहते हो, यह भी हर पल मृत्यु की ओर जा रहा है, तो जो सुख दु:ख तन राही तुझे मिल रहे हैं, यह कैसे स्थिर रह सकते हैं? इस कारण कहते हैं हर विपरीतता को मुसकरा कर सह ले, दु:खी न हो और शोक ग्रसित न हो।

ले, अब शीत तथा ऊष्ण को समझ ले!

शीत :

1. शीत का अर्थ ‘हिमवत्’ है।

2. हिम जलपूर्ण है, पर वह जल छोड़ता नहीं।

3. शीत प्राणों को भी हर लेता है।

4. मन, जब शीत हो जाता है तो प्रेम रहित हो जाता है।

5. शीत ‘जड़’ को भी कहते हैं जो औरों के प्रति जड़वत् होता है।

6. शीत मन्द मति को भी कहते हैं।

7. शीत निरुत्साहित हो जाने के कारण को भी कहते हैं।

8. शीत मित्रहीनता को भी कहते हैं।

9. शीत मृत्यु को भी कहते हैं।

ऊष्ण का अर्थ अब समझ ले :

1. ऊष्ण गर्म को कहते हैं।

2. क्रोध को भी ऊष्ण कहते हैं।

3. ताप को भी ऊष्ण कहते हैं।

4. तीक्ष्ण को भी ऊष्ण कहते हैं।

5. नरक को भी ऊष्ण कहते हैं।

6. जिसकी तासीर गर्म हो, उसे भी ऊष्ण कहते हैं।

अब समझ! शीत ऊष्ण से भगवान का अभिप्राय क्या है?

1. यदि शीत के समान स्नेहहीन लोग मिलें तो भी याद रख, यह स्पर्श मात्र ही है।

2. यदि ऊष्णता पूर्ण, क्रोध में जलते हुए और जला देने वाले लोग मिलें, तब भी नित्य अप्रभावित रहो।

यदि इन दोनों के मध्य में तुम अप्रभावित रहे तो शोक से रहित हो जाओगे। यदि कोई ऐसी परिस्थिति आ जाये जो आपको पसन्द न हो; रुचिकर का वियोग हो जाये, तब :

1. तुम्हें द्वन्द्व नहीं सतायेगा।

2. तुम्हारा मन मोह ग्रसित नहीं हो जायेगा।

3. तुम्हारे मन में विक्षिप्तकर विकार नहीं उठेंगे।

4. तुम्हारे मन में उद्विग्नता नहीं उठेगी।

5. तुम्हें राग द्वेष नहीं सतायेंगे।

6. फिर शुभ मिले या अशुभ मिले, तुम्हारा चित्त शान्त ही रहेगा।

दु:ख तब ही होता है जब :

1. आपकी रुचि के विरुद्ध आपको कोई बात कह दे।

2. कोई ऐसी परिस्थिति आ जाये जो आपको पसन्द न हो।

3. रुचिकर का वियोग हो जाये।

4. अरुचिकर से मिलन हो जाये।

5. किसी कारण कोई कष्ट हो आपको।

6. कोई आपकी किसी न्यूनता को प्रकट कर दे।

गर इस सबके विपरीत मिल जाये तो उसे सुख कहते हैं। सुखी, सुख देने वाले पर आश्रित है। दु:खी, दु:ख देने वाले पर आश्रित है। भगवान कहते हैं :

क) यह सब स्पर्श मात्र ही हैं।

ख) यह सब तनो इन्द्रिय राही तन को ही मिलते हैं।

ग) तन तो स्वयं ही आना जाना है सो सुखी दु:खी होने से क्या लाभ? जो मिट ही जाना है उससे प्रभावित होने से क्या लाभ?

1. अनुकूल अथवा विपरीत, जो भी मिले, उसे मुसकरा कर सह ले।

2. तब तू दु:खी नहीं होगा।

3. तब तू शोक ग्रसित नहीं होगा।

4. तब तू कर्तव्य परायण हो ही जायेगा।

क्योंकि तब :

क) तनत्व भाव भी मिट जायेगा।

ख) तनत्व भाव मिट जाने से कर्तापन का अहंकार भी मिट जायेगा।

ग) मान्यता बंधन भी टूट जायेंगे।

घ) मृत्यु का भय भी ख़त्म हो जायेगा।

ङ) तू धर्म परायण हो ही जायेगा।

च) जीव से संग नहीं रहेगा, सत् से संग हो जायेगा।

छ) जीव से संग नहीं होगा, भागवद् गुणों से संग हो जायेगा।

तत्पश्चात्, न्याय के लिये ही युद्ध करेगा, चाहे सामने जो भी हो! चाहे अपनी मृत्यु भी हो जाये, इसकी परवाह वह प्राणी नहीं करेगा।

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