Chapter 6 Shloka 36

असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मति:।

वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायत:।।३६।।

Yoga is attained with difficulty 

by men of uncontrolled mind;

but its attainment is possible

 for the diligent and resourceful.

This is My opinion.

Chapter 6 Shloka 36

असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मति:।

वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायत:।।३६।।

Yoga is attained with difficulty by men of uncontrolled mind; but its attainment is possible for the diligent and resourceful. This is My opinion.

Little one, the Lord says that it is extremely difficult for one whose mind is not under control to be accomplished in Yoga.

1. When the mind is not curbed, one cannot attain Yoga.

2. He whose mind is not attached to the chosen goal, will not be able to achieve it.

3. He whose mind does not desire the Atma and remains attached to the anatma, will find the attainment of Yoga impossible.

4. How can such a one tread the path of Yoga, whose mind is pulling in the opposite direction?

5. If his mind is not attached to the Truth, how can he possibly seek to unite with it?

6. If his mind does not find the Atma an attractive goal to attain and has no knowledge whatsoever of the Atma, how can it ever attain yoga with the Atma?

7. If the mind is ever immersed in gross objects of the world, how can it ever become a devotee? Little one, how can he approach the Lord when he does not seek to become like That Divine One? He who does not appreciate the practical life of an Atmavaan can never aspire for or attain Yoga.

8. How can a mind full of attachments ever aspire for detachment?

9. How can the egoistic and proud mind ever yearn to become devoid of ego?

10. How can the turbulent mind ever gauge the tranquil serenity of the Supreme Essence?

11. How can the mind that is attached to worldly objects ever become a Yogi?

Why talk of Yoga, such a one cannot take even a single step towards the Atma in practical life.

It is possible for the intellect to renounce all sense objects through sheer stubbornness and force, but this is not vairaagya. Even if such a one snaps all ties with the world due to mental turmoil, this is a very temporary remedy. The mind that wishes to enjoy the sense objects will still be with you, the body will still be with you, the tendencies which arise within you and your disposition towards attraction and repulsion will still be with you.

Little one, no matter where this mind goes, it will still prove to be an obstacle in your practice of Yoga. Therefore they say “Control the mind and train it towards the Lord.” If your mind supports you, the doors of the realm of yoga will be opened to you in a moment. Therefore it is necessary to manipulate the mind.

1. Restrain it with patience.

2. Use every means and diplomacy available to you to charm the mind.

3. Instruct it about the transient nature of that which is not the Atma.

4. Inform the mind of the eternal nature of the Atma.

5. Although the intellect has gained this knowledge, its mistake is:

­­–  it does not pay attention to the obstacles that hinder its path;

­­–  it does not understand the practical life of one abiding in the Atma;

­­–  it does not comprehend the translation of divine qualities into daily practice;

­­–  although it also knows of the final state that is attained through the assimilation of the Supreme Essence, it has not seen the present consequences of that practice.

Your intellect understands knowledge but not its practical essence. Little one, the mind in fact appreciates the superiority of knowledge. It likes the quality of love and the other divine attributes. If the intellect reveals the mystery of love to the mind, the mind is bound to respond favourably. If the intellect does not reject the mind, the latter is likely to accept the dictates of the intellect. The wise sadhak asks of his mind “Tell me what you desire!”

One must first share the knowledge one has received with one’s own mind before imparting that knowledge to other people. Presently your mind rules your body – end this dominion of the mind with shrewdness.

It is important at first to ensure the union of the intellect and the mind. The mind is habitually a servant. It can either become subservient to the sense objects or you can make it subservient to the Lord. The trouble arises when the mind becomes subservient to the sense objects and the intellect subjugates itself to the mind. The mind will follow the intellect if it appreciates the ways of the intellect. The Lord therefore says, yoga is possible through diplomacy and other such methods. The sadhak must tread carefully. He has to rationalise and discuss with his own mind to persuade it. The knowledge that one must quell the tendencies of the mind is all very well, but in order to do so, one must be able to change the interest of the mind. This can be done through the patient instruction of an intellect that loves the Truth.

अध्याय ६

असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मति:।

वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायत:।।३६।।

शब्दार्थ :

१. असंयतात्मा पुरुष द्वारा योग कठिनता से प्राप्त होता है।

२. परन्तु प्रयत्नशील और उपाय करने वाले के लिये, योग पाना सम्भव है;

३. यह मेरा निश्चय है।

तत्व विस्तार :

नन्हीं! भगवान कहते हैं कि असंयतात्मा के लिये योग पाना कठिन है।

1. यानि, जिसका मन वश में नहीं, उसके लिये योग पाना बहुत कठिन है।

2. जिसका मन लक्ष्य से संग न करे, वह योग कैसे पा सकता है?

3. जिसका मन आत्मा को न चाहकर अनात्मा से संग करे, उसके लिये योग पाना असम्भव है।

4. जिसका मन योग के विरुद्ध ही कदम धरे, वह योग में स्थित कैसे हो सकता है?

5. यदि आपके मन की सत् में रुचि ही नहीं, तब सत् से योग कैसे हो सकता है?

6. यदि आपके मन को आत्मा भाती ही नहीं, तब आपका आत्मा से योग कैसे हो सकता है?

7. यदि आपके मन को आत्मा का ज्ञान ही नहीं, तब आत्मा से योग कैसे हो सकता है?

8. यदि आपका मन नित्य विषयासक्त ही रहे, तो वह भक्त कैसे बन सकता है? नन्हीं! वह भगवान को क्या पायेगा जो भगवान जैसा बनना ही नहीं चाहता! वह क्या योग को पायेगा जो आत्मवान् के जीवन को पसन्द ही न करे!

9. संग पूर्ण मन असंगता को कैसे अपनायेगा?

10. अहंकारी, दम्भपूर्ण मन अहं रहित कैसे हो पायेगा?

11. चंचल मन प्रशान्त तत्व को कैसे जान सकेगा?

12. विषयभोगी तथा विषयासक्त मन योगी कैसे बन सकता है?

नन्हीं! योग तो दूर रहा, वह तो जीवन में आत्मा की ओर एक कदम भी नहीं धर सकेगा।

हठ से बुद्धि चाहे सम्पूर्ण विषयों का त्याग कर दे, वैराग्य तो हो नहीं पायेगा। मनो क्लेश के कारण वह जग से नाता तोड़ भी दे, परन्तु जग तो ऐसे नहीं छूट सकता है। भोगी मन तो आपके साथ ही रहेगा; यह तन भी आपके साथ ही रहेगा; वृत्ति समूह भी आपके साथ ही रहेगा; राग द्वेष करने वाली वृत्तियाँ भी आपके साथ ही रहेंगी।

नन्हीं! यह मन जहाँ भी जायेगा, आपके योगाभ्यास की राहों में आयेगा। यह नित्य विघ्न बनता रहेगा। इस कारण कहते हैं, ‘मन को वश में कर लो, मन को परम के परायण बना लो।’ मन यदि तुम्हारा साथ दे तो योग के द्वार पल में खुल जायेंगे। इस मन को तो मनाना ही होगा।

1. धैर्य पूर्ण होकर मना लो इसे।

2. बहु उपाय और नीति वर्त कर रिझा लो इस मन को।

3. अनात्म की क्षणभगुरता का इसे ज्ञान दो।

4. आत्मा की नित्यता का राज़ बता दो इसे।

5. ज्ञान तो बुद्धि ने पाया, किन्तु ग़लती यह की,

क) अपनी राहों में जो विघ्न आते हैं, उन पर ध्यान नहीं दिया।

ख) आत्मा के स्वरूप तत्व को तो समझ लिया किन्तु आत्मवान् के जीवन को नहीं समझे।

ग) दैवी गुणों का स्वरूप तो समझ लिया परन्तु दैवी गुणों का जीवन में रूप नहीं समझे।

घ) दैवी गुण तथा तत्व अनुसरण का अन्तिम पड़ाव तो जान लिया किन्तु जो अन्जाम तत्काल होगा, उसे नहीं देखा।

वास्तव में आपकी बुद्धि ज्ञान को समझती है, विज्ञान को नहीं समझती। नन्हीं! ज्ञान की श्रेष्ठता मन को वास्तव में पसन्द है। मन को प्रेम तथा दैवी सम्पदा वास्तव में पसन्द है। यदि बुद्धि मन को प्रेम का राज़ बताये तो मन मान ही जायेगा। यदि बुद्धि मन को न ठुकराये तो मन मान ही जायेगा। बुद्धिमान् साधक अपने मन से पूछता है कि ‘तुम्हारी क्या रज़ा है?’

जो ज्ञान आपको मिला है, जग को देने से पहले वह अपने मन को दो। आपके तन पर आपके मन का राज्य है, दक्षता से इस मन से यह राज्य छीन लीजिये।

सर्वप्रथम बुद्धि और मन का मिलन ज़रूरी है। मन तो किसी न किसी का चाकर बन ही जाता है। या वह विषयों की नौकरी करता है, या वह भगवान की नौकरी कर सकता है। मुश्किल तब पड़ती है जब मन विषयों का नौकर बन जाता है और बुद्धि मन की नौकरानी बन जाती है। मन बुद्धि का चाकर बन ही जायेगा यदि उसे बुद्धि की बात पसन्द आ जाये। इस कारण भगवान कहते हैं, नीति तथा उपाय से योग सम्भव है। साधक को अति दक्षता से काम लेना चाहिये। मन को मनाने के लिये साधक को अपने ही मन से बातें करनी होती हैं। चित्त की वृत्ति निरोध का ज्ञान तो ठीक है, किन्तु चित्त की वृत्ति निरोध के लिये मन की रुचि को बदल देना आवश्यक है। यह केवल सत्य प्रिय, धैर्ययुक्त बुद्धि ही कर सकती है।

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