Chapter 6 Shloka 21

सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम्।

वेत्ति यत्र न चेवायं स्थितश्चलति तत्त्वत:।।२१।।

The one who perceives the eternal joy which is

beyond the senses and which can be experienced

only through the subtle and purified intellect,

becomes established in that state

and is never shaken from it.

Chapter 6 Shloka 21

सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम्।

वेत्ति यत्र न चेवायं स्थितश्चलति तत्त्वत:।।२१।।

Eulogising the sublime qualities of the Yogi, the Lord says:

The one who perceives the eternal joy which is beyond the senses and which can be experienced only through the subtle and purified intellect, becomes established in that state and is never shaken from it.

Atendriya (अतीन्द्रिय)

1. That which cannot be perceived through the sense organs.

2. Which the sense organs cannot know.

3. Which cannot be partaken of by the organs of sensory perception.

4. Which cannot be experienced by the organs of sensory perception.

5. Which is beyond the reach of the organs of sensory perception.

6. Which is not the subject of the sense organs.

The Lord says, this incredible joy transcends the organs of sense, yet, it can be experienced by the intellect. The intellect experiences this quality, this joy. That is, when the intellect becomes completely peaceful, it perceives within itself the indescribable bliss of the Atma. In fact, the mind and the sense organs do not have the capacity to experience this joy.

This tremendous joy can be comprehended only through inference.

1. That intellect which is ever uninfluenced by objects is in a state of bliss.

2. The intellect which is ever unaffected by respect or disrespect is ever joyous.

3. The intellect which is uninfluenced by sorrow and happiness dwells in that indescribable joy.

4. The intellect which is unaffected by duality is ever joyous.

5. The intellect which is eternally satiated and untouched by the objective world resides in complete happiness.

6. The intellect of equanimity abides in eternal joy.

7. That intellect which is ever absorbed in samadhi, is ever joyous.

Yet, this state of joyous satiation is not that which people mistakenly take to be the state of samadhi. This is a Yogi’s natural and perpetual state. This is the natural attribute of a Sthit Pragya. It becomes the normal condition of the intellect. Ordinary individuals are alternately happy or sad, but happiness or sorrow do not touch the one steady in yoga. This total absence of sorrow indicates complete joy.

Little one, it is said here that this tremendous joy is ‘buddhi graahya’ (बुद्धि ग्राह्य) – the intellect has the capacity to grasp it.

Graahya (‘ग्राह्य’)

1. One that stipulates;

2. One that acquires, obtains;

3. One that grasps, receives;

4. That which can be claimed;

5. To wear;

6. To accept;

7. To wed;

8. To bring under one’s control.

Understand therefore, that the intellect obtains this immeasurable joy and becomes one with its essential quality. No difference remains between the intellect and the joy it has received. The joy no longer remains an object of the intellect – it becomes an integral part of the intellect. That bliss is the essential core of such an intellect. There is complete fusion between the two.

You can realise your Self – you cannot perceive it. It is not an object which you can experience. Just as the Self is not an object of the mind or the intellect, similarly the joy spoken of here is not an object experienced by the mind. Such an intellect is bliss itself, there is no mental experience of it.

Thus does the Yogi know this intense joy. He is irrevocably established in this state. Nothing can shake him away from it, because the very essence of the Yogi is the Atma. He abides in the Atma and is not influenced by the attributes or associations of the body. He is unaffected by all circumstances of the world.

अध्याय ६

सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम्।

वेत्ति यत्र न चेवायं स्थितश्चलति तत्त्वत:।।२१।।

भगवान, योगी की महिमा गान करते हुए कहते हैं :

शब्दार्थ :

१. इन्द्रियों से परे

२. परन्तु बुद्धि से ग्रहण करने योग्य जो अनन्त सुख है,

३. उसको इस अवस्था में यह योगी जानता है

४. और उसमें स्थित होकर

५. तत्व से विचलित नहीं होता।

तत्व विस्तार :

अतीन्द्रिय :

क) जिसे इन्द्रियाँ ग्रहण न कर सकें;

ख) जिसे इन्द्रियाँ जान न सकें;

ग) इन्द्रियाँ जिसका उपभोग न कर सकें;

घ) इन्द्रियाँ जिसका अनुभव न कर सकें;

ङ) जो ज्ञान इन्द्रियों की पहुँच से बाहर हो;

च) जो ज्ञान इन्द्रियों का विषय न हो।

भगवान कहते हैं, यह आत्यन्तिक सुख अतीन्द्रिय है किन्तु बुद्धि ग्राह्य है। बुद्धि इस गुण का और इस आनन्द का अनुभव करती है और इस सुख को ग्रहण करती है। यानि, बुद्धि अपने आप में शान्त हो जाती है और अपने आप में आत्मा का अनिर्वचनीय सुख अनुभव करती है। वास्तव में नन्हीं! बुद्धि इस आनन्द को ग्रहण करती है, इस सुख की कोई मानसिक अनुभूति नहीं होती! इस सुख को महसूस करने की मन या इन्द्रियों में भी क्षमता नहीं होती।

इस आत्यन्तिक सुख को संकेत मात्र से ही समझा जा सकता है।

1. जो बुद्धि विषयों से नित्य अप्रभावित रहे, वह सुखी ही होती है।

2. जो बुद्धि मान अपमान से नित्य अप्रभावित रहे, वह सुखी होती है।

3. जो बुद्धि सुख दु:ख से नित्य अप्रभावित रहे, वह आत्यन्तिक सुख में स्थित है।

4. जो बुद्धि द्वन्द्वों से नित्य अप्रभावित रहे, वह आत्यन्तिक सुखी है।

5. जो बुद्धि नित्य तृप्त हो, वह विषयों से अप्रभावित रहती है और वह आत्यन्तिक सुख में स्थित होती है।

6. जो बुद्धि नित्य सम रहे, वह नित्य आनन्द में स्थित कहलाती है।

7. जो बुद्धि नित्य समाधिस्थ रहे, वह नित्य आनन्द में स्थित कहलाती है।

नित्य आनन्द की अवस्था वह नहीं जिसे लोग अधिकांश समाधि अवस्था मानते हैं। यह तो योगी के सहज जीवन में नित्य रहने वाली सहज स्थिति की बात है। यह तो स्थित प्रज्ञ की सहज अवस्था का गुण है। वह तो बुद्धि का सहज गुण बन जाता है। साधारण जीव दु:खी सुखी होते रहते हैं किन्तु स्थित प्रज्ञ योगी दु:खी सुखी कभी नहीं होता। दु:ख का नितान्त अभाव ही आत्यन्तिक सुख है।

देख नन्हीं! यहाँ कहा गया है कि यह आत्यन्तिक सुख बुद्धि ग्राह्य है।

‘ग्राह्य’ का अर्थ समझ ले :

क) निर्धारण करने वाला;

ख) प्राप्त करने वाला;

ग) ग्रहण करने वाला;

घ) जो अधिकार में लिया जा सके;

ङ) पहन लेना;

च) अंगीकार कर लेना;

छ) विवाह कर लेना;

ज) वशवर्ती करना।

बुद्धि आनन्द ग्रहण करती है :

इसे यूँ समझ कि जो आत्यन्तिक सुख बुद्धि अंगीकार कर लेती है, वह आत्यन्तिक सुख बुद्धि प्राप्त कर लेती है। यानि, इस आनन्द और बुद्धि में भेद नहीं रहता। यह आनन्द बुद्धि का विषय नहीं रहता, यह बुद्धि का गुण हो जाता है। यह आनन्द बुद्धि का स्वरूप हो जाता है। आनन्द और बुद्धि की एकरूपता हो जाती है।

आप अपने आपको जान सकते हो, अपने आपका अनुभव नहीं होता, अपने स्वरूप का अनुभव नहीं होता। वह तो विषय नहीं है जिसका आप अनुभव कर सकें। जैसे स्वरूप मन या बुद्धि का विषय नहीं होता, इसी प्रकार बुद्धि आनन्द स्वरूप हो जाती है, इसका मनो अनुभव नहीं होता।

योगी इस प्रकार आत्यन्तिक आनन्द को जानता है। फिर वह इस अवस्था से कभी चलायमान नहीं होता क्योंकि योगी का स्वरूप आत्म तत्व है। फिर वह नित्य आत्मा में टिका रहता है। तब वह तन के किसी भी गुण से, तन के किसी भी सम्पर्क से प्रभावित नहीं होता। वह संसार की किसी भी परिस्थिति से भी प्रभावित नहीं होता।

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