Chapter 6 Shloka 31

सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थित:।

सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते।।३१।।

He who is established

in one-pointed union with Me and

worships Me as residing in all beings,

that Yogi abides in Me

no matter how he interacts.

Chapter 6 Shloka 31

सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थित:।

सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते।।३१।।

Little one, now listen carefully to what the Lord says:

He who is established in one-pointed union with Me and worships Me as residing in all beings, that Yogi abides in Me no matter how he interacts.

“That Yogi who is established in union with Me and worships Me in all beings” – First understand the meaning of this statement.

The Yogi established in union – the Atmavaan

1. Knows of the unity of the Atma in all beings.

2. Views all beings as equal from the point of view of the Atma.

3. Knows of the similarity of the Atma in all despite variance of name and form.

4. Perceives all as equal despite variance in attributes.

5. Witnesses the Atma’s wholeness in all beings.

6. Understands the indivisibility of the Atma despite its apparent division into all beings.

Such a one who has transcended the body idea, realising the indestructible nature of the Atma, he regards all beings only from the purview of the Atma and worships the Atma within them.

Little one, you will understand this better when you know how such an Atmavaan interacts with other individuals on the practical plane.

Interaction of the Atmavaan with other individuals

1. He loves all, knowing that all are the Atma in essence.

2. Knowing of the variance of gunas in different individuals, he goes to the level of each one and strives for their expansion and betterment at every level.

3. He rejects none even if their qualities are most inferior.

4. He views the saint and the outcast, the high and the low as equal in terms of the Atma.

5. Attributes are a gift of nature and he knows that inferior or superior deeds are performed perforce by those attributes. The Atma is a non-doer; knowing this, the Atmavaan blames no one.

6. Witnessing the Atma essence in all beings, he is a friend to all.

Little one, the Atmavaan is not inimical even towards his enemies or towards their inimical feelings. He has no conflict with people’s attributes or qualities. People acknowledge him as the epitome of forgiveness, but the Atmavaan never blames anyone, so whom should he forgive? Perceiving all as embodying the Atma, he serves all beings. He is a benefactor of all.

The Lord says, “Those who thus abide in union, worship Me.”

Bhaj (भज्) – to embrace, to welcome, to honour, to accept etc.

Actions offered to the Lord

He who knows that the same Atma inheres all beings, he embraces that all pervading Atma. He offers all his actions to that same Supreme Atma. From this one can understand that whatever he does for others, his actions are never a favour to anyone. He performs every single deed for the Lord who abides as the Atma in all. Therefore, his every deed is selfless and worshipful.

In fact, the life of such a one is an incessant glorification of the Supreme Atma. Hence whatever he does in life, is done in the realm of Truth and within the orbit of the Supreme Spirit.

Little one, the Atmavaan’s speech is extremely explicit, therefore, his words often seem to be extremely harsh. However, because the Atmavaan acknowledges the other as the Atma, he is also extremely humble and pliant. He appeals to the other in the other’s favour and for the other’s benefit. Therefore that Atmavaan seems extremely ordinary at times and even a bit of a simpleton – a humble servitor.

It is very difficult to understand such beings. He dons the form required by those who come before him. Although the body is visible before us, that body is completely devoid of the ‘I’. He is in fact immersed in the Supreme Atma and is himself the Lord in human form.

All that such a one does is in accordance with the state of the other. Each word that leaves his lips is also in accordance with the other’s state. He can be harsh with the sadhak and extremely pleasant with the ordinary man. He may be extremely strict with one who aspires for abidance in the Self and could also seem to be performing degraded deeds along with those possessing wicked tendencies. However, no matter what he does, he is a non-doer. Through all his actions, he aims merely to take the other forward and grant him those attributes which are beneficial for him. He may often seem to be wrong, but he is never distanced from the Self. Knowing the other to be the Atma, he makes every endeavour to lead the other towards his true Self also. From this point of view, the Atmavaan interacts with others knowing always that they are the Atma Self.

अध्याय ६

सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थित:।

सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते।।३१।।

नन्हीं! ध्यान से सुन भगवान क्या कहते हैं।

शब्दार्थ :

१. जो पुरुष एकाकी भाव में स्थित हुआ,

२. सम्पूर्ण में स्थित मुझको भजता है,

३. सर्व प्रकार से वर्तता हुआ भी,

४. वह योगी मुझ में ही वर्तता है।

तत्व विस्तार :

‘जो योगी एकत्व में स्थित होकर सब में मुझे भजता है’, पहले इसका अर्थ समझ ले।

एकत्व स्थित योगी, आत्मवान् :

क) सबमें आत्मा की एकता जानते हुए,

ख) सबमें आत्मा के नाते अभेद दृष्टि रखते हुए,

ग) नाम रूप के भेद देखते हुए भी आत्मा का एकत्व देखते हुए,

घ) गुण भेद देखते हुए भी आत्म रूप में सबको बराबर देखते हुए,

ङ) आत्मा को हर जीव में परिपूर्ण देखते हुए,

च) सम्पूर्ण जीवों में एक ही आत्मा है, इस प्रकार आत्मा की अखण्डता को जानते हुए,

तनत्व भाव रहित आत्म अखण्डता को जानकर, हर जीव को इस आत्म एकत्व की दृष्टि से देखता है, सबमें मानो इस आत्म तत्व को ही भजता है।

नन्हीं! व्यावहारिक स्तर पर वह आत्मवान् अन्य जीवों से कैसे व्यवहार करता है, इसे समझ ले, तब शायद कुछ समझ में आ जाये।

आत्मवान् का जीव के प्रति व्यवहार :

1. आत्म स्वरूप होने के नाते वह सबसे प्रेम करता है।

2. गुण भेद होने के नाते वह सबके स्तर पर जाकर उन्हीं के गुणों का विकास करवाता है।

3. किसी के न्यून से न्यून गुणों के कारण भी उसे ठुकराता नहीं है।

4. उच्च और नीच, संत या चाण्डाल, दोनों को वह आत्मा के नाते बराबर ही जानता है।

5. गुण प्राकृतिक देन है और श्रेष्ठ या निकृष्ट व्यवहार जीव के गुण ही करवाते हैं, आत्मा तो नित्य अकर्ता है, यह जानते हुए वह किसी को दोष नहीं लगाता।

6. आत्मवान् सबमें आत्म तत्व देखते हुए, सबके प्रति मैत्री का भाव रखता है।

नन्हीं! आत्मवान् तो दुश्मन की दुश्मनी से भी दुश्मनी नहीं करता। आत्मवान् दूसरों के जड़ गुणों से नहीं भिड़ता। लोग आत्मवान् को क्षमा स्वरूप कहते हैं, किन्तु आत्मवान् तो सबको आत्म रूप ही जानता है। उसके दृष्टिकोण से क्षमा कोई अर्थ नहीं रखती। आत्मवान् तो सबमें आत्म तत्व को देखता हुआ सबकी सेवा करता है। वह सर्वभूत हितकर होता है।

भगवान कहते हैं, ‘ऐसे एकत्व भाव में स्थित लोग मेरा भजन करते हैं।’

‘भज्’ (भज् के विस्तार के लिये ८/११, १७/१४ देखिये) का अर्थ समझ ले! भज् का अर्थ है अंगीकार करना, अनुगमन करना, सम्मान देना, स्वीकार करना, इत्यादि।

भगवद् अर्पण कर्म :

जो सम्पूर्ण भूतों में आत्मा को स्थित जानता है, वह उस आत्म तत्व को ही अंगीकार करता है और हर कर्म उस परमात्मा रूपा आत्म तत्व पर ही अर्पित करता है। इसे गर ध्यान से समझें तो समझ आ जायेगी कि आत्मवान् जब लोगों के काम करता है, वह किसी पर एहसान नहीं करता। वह तो हर कर्म आत्म तत्व रूपा भगवान के लिये करता है इस कारण उसका हर कर्म निष्काम कर्म ही होता है, निष्काम पूजा ही होती है, निष्काम उपासना ही होती है।

वास्तव में उसका जीवन आत्म तत्व का अखण्ड भजन ही होता है। इस कारण वह जीवन में जो भी करता है, वह सत् में ही करता है, परमात्मा में ही करता है।

नन्हीं! आत्मवान् अतीव स्पष्टवादी होते हैं, इस कारण उनके वाक् अनेक बार अति कटु लगते हैं। किन्तु, क्योंकि आत्मवान् दूसरे को आत्मा जानते हुए झुक जाते हैं, इस कारण वे विनम्रता तथा आर्जवता की मूर्त होते हैं। दूसरे को आत्म स्वरूप ही जानते हुए, अनेकों बार आर्त भाव से भी दूसरों को, दूसरों के लिये मनाते हैं। इस कारण आत्मवान् अतीव साधारण तथा अनेक बार न्यून भी दर्शाते हैं। वे अनेक बार चाकरवत् व्यवहार करते हैं।

नन्हीं! ऐसे लोगों को समझना बहुत कठिन है। जैसा कोई उनके सामने आये, वैसा ही वे रूप धर लेते हैं। नन्हीं! वास्तव में उनका तन सामने दिखता तो है, किन्तु उस तन में ‘मैं’ भाव का नितान्त अभाव होता है। वे तो परमात्मा में विलीन हुए, आत्म स्वरूप भगवान हैं।

उनका तन जो कार्य कर्म करता है, वह दूसरे की स्थिति के अनुसार होता है। उनका वाक् भी दूसरे की स्थिति अनुसार होता है। साधक के साथ वे कटु हो सकते हैं। साधारण आदमियों के साथ बहुत साधारण तथा मीठे लगते हैं। स्वरूप याचक के साथ वे बहुत कठोर हो सकते हैं, बुरे आदमी के साथ ये बुरे कर्म भी करते से दिख सकते हैं, किन्तु सब कुछ करते हुए भी वे अकर्ता हैं। वे सब कुछ करते हुए, जिसके साथ सब करते हैं, उसे अन्त में आगे ले जाते हैं, क्योंकि दूसरे को आत्मवान् वह गुण देते हैं, जो उसके लिये ठीक हों। चाहे वे देखने में ग़लत ही दिखें, किन्तु वे अपने स्वरूप से कभी विचलित नहीं होते। दूसरों को भी आत्मा जानते हुए वे अन्त में उसे परमात्मा की ओर ही ले जायेंगे। इस नाते वे आत्मवान् सबको आत्मा मानते हुए वर्तते हैं।

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