Chapter 6 Shloka 28

युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मष:।

सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते।।२८।।

The sinless Yogithus

uniting himself ceaselessly with the Atma,

attains the immeasurable bliss

obtained through joyous union with Brahm.

Chapter 6 Shloka 28

युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मष:।

सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते।।२८।।

Now Bhagwan says:

The sinless Yogi, thus uniting himself ceaselessly with the Atma, attains the immeasurable bliss obtained through joyous union with Brahm.

Little one, an individual becomes sinless when:

a) he is devoid of attachment with worldly objects;

b) there is a complete absence of desires, anger and lust;

c) the individual begins to perform selfless deeds;

d) the body idea begins to fade away;

e) union with the Atma is imminent.

That sinless Yogi constantly endeavours to unite himself with the Supreme Atma.

1. He fixes his mind unwaveringly on the Supreme.

2. He keeps the Atma as his constant witness.

3. He steadfastly fixes his mind-stuff in his Self.

4. Instead of the ‘I’, he fills the Lord’s name in every pore of the body.

5. He believes each act performed by him belongs to the Lord. He thus offers all his daily deeds of waking, sleeping, eating, drinking, hearing etc. to his Lord.

6. He sees only the Atma wherever his mind wanders.

7. Deleting the ‘I’ from the body self, he places it at the Lord’s feet.

Little one, now understand the connotation of the word Sansparsha (संस्पर्श):

1. Of a similar nature;

2. alike;

3. union;

4. knowledge that occurs through contact;

5. an effect resulting from touching.

This means that the Yogi who is constantly endeavouring to unite with the Atma:

a) experiences the contact of Brahm all around him;

b) feels the impact of the Atma on all sides;

c) welcomes the close presence of That which is beyond sense perception.

In reality little one, such a one experiences his own Atma. He senses the presence of Brahm all around him and through this experience, he attains great joy.

How can sorrow ever touch such a one? When the Yogi is surrounded by his Beloved each moment and from all sides, when he believes that his every limb belongs to his Beloved Lord, he experiences complete union with the Divine Beloved.

Consider little one, how can such a Yogi not abide in eternal joy? When you love an embodied soul, you desire union of the body and fulfilment through physical contact; you want fulfilment of physical desires. If however, your relationship is based on love of the Atma:

a) you will experience that one within yourself;

b) even if the other is far away you will experience proximity;

c) you will find that one as though inherent in your every pore.

Then little one, a day will dawn when your body will no longer be your own – it will belong to your Beloved. Then you will be devoid of body identification and you will become sinless.

Little sadhak! Once you know that your body is not your own but belongs to another, you must decisively proclaim yourself to belong to your Beloved. A constant and sincere commitment is necessary – whether this acknowledgement is repeated daily in words or in writing. This is the reason why a devotee or a sadhak constantly affirms his commitment to his Lord through his daily prayer and devotion, with the Lord as his constant witness.


Prayer has only two facets – glorifying the beauteous attributes of the Lord and the expression of one’s longing to surrender at the Lord’s feet.

The aspirant often promises himself to the Lord, but:

a) he does not vow to offer his actions to the Lord;

b) he does not promise his power of speech to the Lord;

c) he does not place his ability to earn, his expertise or his proficiency at the Lord’s feet;

d) he withholds his mind, home, relations etc. from that promise.

In fact, it would not be wrong to say that he does not wish to receive the Lord within himself. He does not wish for the Lord’s suzerainty over himself and in fact, he does not seek to belong to the Lord.

Little one, it seems as though the ordinary devotee says, “I shall not perform any actions nor will I nurture any relationship with Thee; I shall not perform my duties – yet, I will do everything You say!”

This was precisely Arjuna’s attitude. “You are my Guru and I am Your disciple. I shall do as You say, but I shall not fight this war.”

Little one, the Yogi lays down no such conditions. He gives of himself completely and unconditionally to his Lord. It is as though he simply removes the dominion of the ‘I’ from over his body along with all its attributes and abilities, and from his entire world, and he places upon these the stamp of the Lord’s supremacy. His world, his relationships, his wealth and belongings, his home and everything that is his, now belongs to his Lord. Then that sadhak does nothing of his own accord. It is as though the Lord maintains the sadhak’s worldly relationships through the medium of his body.

The Lord seeks nothing from you. However, if you leave everything to Him without exception, He comes to abide in your body. That is perfection in yoga – the climax of union. Upon attainment of such a state, the individual obtains immeasurable happiness.

अध्याय ६

युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मष:।

सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते।।२८।।

अब भगवान कहते हैं कि :

शब्दार्थ :

१. पाप रहित योगी

२. इस प्रकार निरन्तर अपने आपको आत्मा से जोड़ता हुआ,

३. सुख पूर्वक ब्रह्म को स्पर्श करने वाले

४. अत्यन्त आनन्द को ग्रहण करता है।

तत्व विस्तार :

जीव पाप रहित तब होता है नन्हीं, जब :

क) विषयासक्ति छूट जाती है;

ख) काम क्रोध और सम्पूर्ण कामनाओं का अभाव हो जाता है।

ग) जीव निष्काम कर्म करने लगता है;

घ) तनत्व भाव छूटने लगता है;

ङ) आत्मा से योग होने लगता है।

वह पाप रहित योगी सदा अपने आप को परम आत्मा से युक्त करता है, यानि:

1. ध्यान निरन्तर परम में रखता है।

2. साक्षी बनाकर आत्मा को सदा साथ रखता है।

3. अखण्ड भाव से अपने स्वरूप में चित्त धरता है।

4. अंग अंग में वह ‘मैं’ की जगह भगवान का नाम भरता है।

5. वह जो कुछ भी करता है, उसे भगवान का कर्म मानता है। सोना, जागना, खाना पीना, श्रवण करना, वह सब भगवान के अर्पित करता जाता है।

6. जहाँ भी उसका मन जाता है, वहाँ वह आत्मा के ही दर्शन करता है।

7. अपने तन से ‘मैं’ का भाव मिटाकर उसे भगवान के चरणों में अर्पित करता है।

नन्हीं! ‘संस्पर्श‘ का अर्थ समझ ले।

1. समान प्रकृति वाला;

2. सदृश्,

3. संयोग,

4. छूने से होने वाला ज्ञान,

5. छूने से होने वाला प्रभाव।

इसका अर्थ यह हुआ कि निरन्तर आत्मा में योग का अभ्यास करने वाला योगी :

1. अपने चहुँ ओर ब्रह्म का स्पर्श महसूस करता है।

2. अपने चहुँ ओर आत्मा के सम्पर्क को महसूस करता है।

3. अतीन्द्रिय तत्व के स्पर्श का मानो भान करता है।

वास्तव में नन्हीं! वह अपनी ही आत्मा का मानो स्वयं अनुभव करता है। इसे कहना है, तो ‘तदात्मस्य रूप संस्पर्श’ कह लो; किन्तु सरल भाषा में इतना ही कहना बनता है कि वह अपने चहुँ ओर ब्रह्म की उपस्थिति का अनुभव करता है और अत्यन्त आनन्द को प्राप्त करता है।

नन्हीं! फिर दु:ख हो भी कैसे सकता है? जब योगी हर पल चहुँ ओर से अपने प्रेमास्पद से घिरा रहे, उसके साथ रहे, अंग अंग अपने प्रेमास्पद को जब वह मानने लगता है तो उसे मन में ऐसा प्रतीत होता है, मानो उसके अंग अंग उसके प्रेमास्पद से मिले हों।

सोचो तो नन्हीं! ऐसा योगी नित्य आनन्द में कैसे न रहे? जब आप किसी तन धारी जीव से प्रेम करते हो, तब आप उस तन से अपने किसी स्थूल अंग का मिलन चाहते हो; अपनी किसी स्थूल चाहना की पूर्ति चाहते हो। यदि आपका प्रेम आत्मा से हो तो :

1. आप अपने में उसे महसूस करते हो।

2. वह दूर भी चला जाये तो भी उसे अपने पास ही पाते हो।

3. उसे आप अपने हर अंग में निहित रूप में समाया हुआ पाते हो।

फिर नन्हीं! एक दिन ऐसा आता है कि आपका तन अपना नहीं, आपके प्रेमास्पद का हो जाता है। तब आप तनत्व भाव रहित हो जाते हो; तब आप पाप रहित हो जाते हो।

नन्हीं साधिका! जब आपने जान लिया कि आपका तन आपका नहीं, किसी और के लिये है, तब आपको दृढ़ तथा निश्चित् वाक् से अपने आपको दूसरे के सपुर्द करना होता है। चाहे यह अहर्निश वाक् अनुबद्ध हो, चाहे यह लेखनी अनुबद्ध हो; किन्तु, इसका निरन्तर सत्यपूर्ण अभ्यास ज़रूरी है। इस कारण जीव या साधक अपनी भक्ति के राही या प्रार्थना के राही भगवान के साक्षित्व में निरन्तर अपने वायदे तथा निश्चय प्रकट करता रहता है।

प्रार्थना :

प्रार्थना के केवल दो अंग होते हैं। भगवान के सौन्दर्य पूर्ण गुणों की महिमा तथा अपनी अर्पित होने की भावना का प्राकट्य।

साधक अनेकों बार अपना आप भगवान को देने का वायदा करता है, किन्तु :

1. अपने कर्म देने का वायदा नहीं करता।

2. अपनी वाक् प्रणाली देने का वायदा नहीं करता।

3. अपनी कमाने की शक्ति देने का वायदा नहीं करता।

4. अपनी कार्य प्रवीण योग्यता देने का वायदा नहीं करता।

5. अपना मन, घर बार; नाते, रिश्ते इत्यादि देने का वायदा नहीं करता।

क्यों न कहें, वह भगवान का अपने में आवाहन नहीं करना चाहता, वह भगवान का अपने तन पर राज्य नहीं चाहता, वह वास्तव में भगवान का बनना नहीं चाहता।

नन्हीं! ऐसा लगता है कि साधारण भक्त कहता है, ‘न मैं कार्य करूँगा, न ही मैं कोई नाता निभाऊँगा, न मैं कोई कर्तव्य निभाऊँगा; और जो कुछ तू कहे, सब करूँगा।’

अर्जुन ने भी तो भगवान से यही कहा, ‘तुम मेरे गुरु हो, मैं तुम्हारा शिष्य हूँ। जो कहोगे सो करूँगा, पर युद्ध नहीं करूँगा।’

नन्हीं! योगी की कोई शर्त नहीं होती। वह तो बिना शर्त के अपना सर्वस्व भगवान को दे देता है, मानो वह अपने सजे सजाये संसार और सम्पूर्ण गुणों सहित तन पर से अपना राज्य हटाकर उन पर भगवान का राज्य बना देता है; उसका तन सम्पूर्ण कार्य सिद्धि की शक्तियों के सहित भगवान का हो जाता है। उसका जहान नाते रिश्तों, धन, वस्तुओं, घर बार सहित, भगवान का हो जाता है। फिर मानो वह साधक संसार से नाते रिश्ते इत्यादि ख़ुद नहीं निभाता; उसकी जगह पर उसके ही तन राही भगवान निभाते हैं।

भगवान तुमसे कुछ भी नहीं चाहते। किन्तु, यदि तुम पूर्ण रूप से सब कुछ उन पर छोड़ दो तब वह आपके तन में मानो वास करते हैं। योग सिद्धि तब ही होती है और आत्यन्तिक सुख जीव तत्पश्चात् ही पाता है।

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