Chapter 18 Shloka 71

श्रद्धावाननसूयश्च श्रृणुयादपि यो नरः।

सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम्।।७१।।

He who is devoid of a carping spirit

and hears our dialogue with faith,

that one will also be liberated

and will attain the auspicious abode

of those who engage in virtuous deeds.

Chapter 18 Shloka 71

श्रद्धावाननसूयश्च श्रृणुयादपि यो नरः।

सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम्।।७१।।

The Lord now says to Arjuna:

He who is devoid of a carping spirit and hears our dialogue with faith, that one will also be liberated and will attain the auspicious abode of those who engage in virtuous deeds.

Little one, listen! The Lord says, that if this dialogue between Him and Arjuna is heard by one who has faith and who is free of a fault finding attitude, such a one is bound to attain the realm of meritorious deeds.

Understand once again – who is the man of faith?

Shradhavaa(श्रद्धावान्) – The man of faith

1. One who has a firm belief in the Supreme Truth.

2. One who believes the divine qualities to be the most superior.

3. One who believes in the efficacy of these qualities in life.

4. One through whose life divine qualities flow – no matter what the consequence.

5. One who has faith in the Supreme attribute of forgiveness and will forgive even the most despicable enemy.

–  Such a one will be fearless of the wickedness of the wicked, and will endure their unrelenting attacks on himself until they tire of their own evil traits.

–  The one who has faith in the power of love, wins over even his enemies with his love.

–  The fruit of faith is attained after an extremely long period of time.

–  Faith is the basis of a selfless life.

–  Faith lays the foundation of selfless deeds.

–  Faith is the foundation of selfless yagya.

–  Faith manifests the Supreme Truth.

–  Divine qualities are nurtured in the cradle of faith.

–  Faith retains the Lord as the Supreme Witness in every facet of life.

–  Faith is the invincible armour against every infliction in the aspirant’s life.

–  Faith yields immense mental strength.

–  Faith is the root of tapas or endurance.

–  Faith endows the ability by which one may attain the attribute of charity.

–  Faith gives the aspirant the strength to protect the qualities of the Supreme in daily life.

Else, when your positive qualities clash with the demonic qualities of others, you will become agitated and frightened.

Faith in the Lord

1. Faith in the Lord means an unbroken trust in His qualities.

2. Faith in the Lord means letting His qualities flow through one’s life.

3. This is dharma.

4. This is the Lord’s reign in one’s life.

5. This is serving the Lord.

6. This is union with the Lord.

7. The consequence of faith is duty.

8. The consequence of faith is sincerity.

9. The consequence of faith is selfless living.

10. Faith establishes one in yoga.

The Lord has specified another attribute of the sadhak who can benefit through the commands and the message of the Scriptures.

Ansooya (अनसूय)

The sadhak should be ansooya or:

a) devoid of a carping attitude;

b) devoid of a doubting mind;

c) devoid of tendencies of criticism;

d) devoid of jealousy;

e) devoid of aversion;

f) devoid of hatred;

g) one who is not opposed to what he dislikes;

h) devoid of enmity.

1. If one remains immersed in likes and dislikes, hatred and attachment, it will become indeed difficult to practice the supreme qualities of divinity.

2. If one endeavours to flee from what one dislikes, the Lord’s attributes cannot embellish one’s life.

3. If you are filled with hatred and repugnance, you will necessarily distance yourself from the object you dislike; then how can the attributes of the Supreme inhere in you?

4. Where doubt exists, faith cannot survive.

The Lord says, that individual who is devoid of doubt and replete with faith can become the embodiment of the divine qualities by merely listening to this mystical wisdom. Just by listening, he can become elated with love for the Lord and become a servitor of the Supreme. He who is full of faith and devoid of a carping spirit will necessarily engage in meritorious deeds.

1. Every action of such a one will be auspicious.

2. He himself is auspicious.

3. He will attain auspicious realms.

Little one, the one whose mind is free of any fault finding tendency and who is full of faith, will instantly translate all that he hears into his life’s practice. It is not necessary that you be highly educated to understand this knowledge imparted by the Lord. In fact, the scholarly are laden with intellectual pride. They find it difficult to attain faith and learning only increases their habit of fault finding.

Those who continually find fault with others are always seeking excuses for themselves; they are constantly measuring others and trying to prove them wrong. However, they do not want to be measured thus by others, nor do they wish to assess themselves! It is the faithful who look at themselves and their own lacunae instead of pointing fingers at others. That is why it is easy for them to attain the Lord.

अध्याय १८

श्रद्धावाननसूयश्च श्रृणुयादपि यो नरः।

सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम्।।७१।।

भगवान अर्जुन को आगे कहने लगे :

शब्दार्थ :

१. श्रद्धावान् तथा दोष दृष्टि से रहित होकर,

२. जो भी जीव (हमारे, तुम्हारे सम्वाद को) सुनेगा,

३. वह भी मुक्त होकर,

४. पुण्य कर्म करने वालों के,

५. शुभ लोकों को प्राप्त होगा।

तत्त्व विस्तार :

नन्हीं जान् ज़रा सुन! भगवान कहते हैं, जो श्रद्धावान् तथा अनसूय होकर इस संवाद को सुनेगा, वह भी शुभ कर्म करने वाले लोकों को पायेगा।

मेरी नन्हीं सजन! पुनः समझ श्रद्धावान् कौन होते हैं?

श्रद्धावान् :

1. परम सत् में निष्ठा रखने वाले श्रद्धावान् होते हैं।

2. दैवी गुणों को जीवन में श्रेष्ठ मानने वाले श्रद्धावान् होते हैं।

3. भागवत् गुणों को जीवन में श्रेष्ठ मानने वाले श्रद्धावान् होते हैं।

4. जो जीवन में दैवी गुण बहाते हैं, परिणाम चाहे कुछ भी मिले, वे श्रद्धावान् होते हैं।

5. जिन्हें परम गुण क्षमा में श्रद्धा है, वे यहाँ निकृष्ट तथा दुश्मन को भी क्षमा कर देते हैं।

6. वे दुष्ट की दुष्टता से निर्भय होते हैं, अपने पर ही अत्याचार करवाते हुए वे दुष्ट का मानो जी भर देते हैं।

7. प्रेम में श्रद्धा रखने वाले दुश्मन को भी अपने प्रेम से जीत लेते हैं।

8. श्रद्धा का फल अतीव दीर्घ काल में मिलता है।

9. श्रद्धा निष्काम जीवन की बुनियाद है।

10. श्रद्धा निष्काम कर्म की बुनियाद है।

11. श्रद्धा निष्काम यज्ञ की बुनियाद है।

12. श्रद्धा परम सत् को व्यक्त करती है।

13. श्रद्धा के पलने में दैवी गुण पलते हैं।

14. श्रद्धा ही जीवन के हर पहलू में भगवान का साक्षित्व बनाये रखती है।

15. जीवन में हर प्रहार के प्रति श्रद्धा ही साधक का अटूट कवच है।

16. श्रद्धा ही मानसिक बल दायिनी है।

17. श्रद्धा ही तप का मूल है।

18. श्रद्धा ही दान पाने की सामर्थ्य है।

19. परम गुणों का जीवन में संरक्षण श्रद्धा के बल पर ही हो सकता है।

वरना आपके सद्गुणों का टकराव जब अन्य जीवों के आसुरी गुणों से होगा, तब आप विचलित हो जायेंगे और घबरा जायेंगे।

देख नन्हीं साधिका!

भगवान में श्रद्धा :

क) भगवान में श्रद्धा का अर्थ ही भगवान के गुणों में अटूट विश्वास है।

ख) भगवान में श्रद्धा का अर्थ ही भगवान के गुणों को जीवन में बहाना है।

ग) यही धर्म है।

घ) यही जीवन में भगवान का राज्य है।

ङ) यही भगवान की चाकरी है।

च) इसी में भगवान का मिलन है।

छ) श्रद्धा का परिणाम कर्तव्य है।

ज) श्रद्धा का परिणाम वफ़ा है।

झ) श्रद्धा का परिणाम निष्काम जीवन है।

ञ) श्रद्धा योग स्थित करवा ही देगी।

भगवान ने यहाँ एक और गुण बताया है उन साधकों का, जो शास्त्र आदेश तथा उपदेश से लाभ उठा सकते हैं।

अनसूय :

साधक को अनसूय होना चाहिये,

यानि :

1. दोष दृष्टि रहित होना चाहिये।

2. संशयपूर्ण दृष्टि नहीं होनी चाहिये।

3. निन्दक वृत्ति वाला नहीं होना चाहिये।

4. ईर्ष्या का नितान्त अभाव होना चाहिये।

5. द्वेष रहित होना चाहिये।

6. घृणा रहित होना चाहिये।

7. अरुचिकर से भी विरोध न करने वाला होना चाहिये।

8. शत्रुता पूर्ण नहीं होना चाहिये।

क) गर राग द्वेष में पड़े रहे तो परम गुण अभ्यास करना अतीव कठिन हो जायेगा।

ख) गर अरुचिकर से भागने वाले हो, तो भगवान के गुण आप में नहीं आ सकते।

ग) गर आपमें घृणा का भाव है तो आप अरुचिकर जान कर घृणक से दूर हो जायेंगे, फिर परम गुण आपमें कैसे आयेंगे ?

घ) फिर जहाँ संशय बसता है, वहाँ श्रद्धा नहीं बस सकती।

भगवान कहते हैं, जो जीव संशय रहित तथा श्रद्धावान् है, वह श्रवण मात्र से ही भागवत् गुणों की प्रतिमा बन सकता है; वह श्रवण मात्र से ही भागवत् प्रेम उन्मत्त हुआ परम चाकर बन सकता है। जो श्रद्धावान् होगा और अनसूय होगा, वह शुभ कर्म करने वाला होगा ही।


– उसका हर कर्म शुभ होगा।

– वह स्वयं शुभ होगा ही।

– वह शुभ लोक में ही जायेगा।

नन्हूं! जिसमें दोष दृष्टि नहीं होगी और साथ में जो श्रद्धावान् भी होगा, वह जो भी सुनेगा, उसे पल में अपने जीवन में उतार लेगा। ज़रूरी नहीं कि आप बहुत पढ़े लिखे हों, तभी ज्ञान समझ सकोगे। वास्तव में पढ़े लिखे लोग तो बहुत बुद्धि गुमानी हो जाते हैं। उनमें तो श्रद्धा मुश्किल ही होती है, उनकी दोष दृष्टि बहुत बढ़ जाती है।

दोष दृष्टि वाले लोग केवल बहाने ढूँढते हैं, केवल दूसरे को ग़लत साबित करने के प्रयत्न करते रहते हैं, केवल लोगों को तोलते रहते हैं। वह न स्वयं तुलना चाहते हैं, न ही अपने आप को तोलना चाहते हैं। श्रद्धा वाले ही औरों पर आक्षेप करने की बजाय अपने आप को देखते हैं, इस कारण वह भगवान को सहज ही पाते हैं।

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