Chapter 18 Shloka 16

तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः।

पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः।।१६।।

Despite this, he who sees

the Atma as the sole doer,

that foolish one of aberrated intellect

does not see truly.

Chapter 18 Shloka 16

तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः।

पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः।।१६।।

Look little one, the Lord reiterates:

Despite this, he who sees the Atma as the sole doer, that foolish one of aberrated intellect does not see truly.

Little one! Listen to what the Lord is saying!

a) Only the foolish.

b) Only the one devoid of an intellect.

c) Only the one with a sinful intellect.

d) Only the one with an impure intellect.

– can consider the Atma to be the doer.

Akrit (अकृत)

a) That which is incomplete.

b) That which is wrong, impure, ignorant and foolish.

The essence of the Atma

Little one, the Lord has said earlier that:

1. The Atma is ever the uninfluenced non-doer.

2. The Atma never dies nor does it kill.

3. The Atma is the essence itself.

4. The Atma is formless.

5. Despite being manifest, it is unmanifest.

6. Even though it seemingly performs deeds, in reality it is a non-doer.

7. It permeates every sphere.

8. It is the mainstay of all – none else supports it.

9. That Atma is in all, yet no one is in it.

10. All actions occur by its power, yet there is no action it performs.

Understand this in the following manner. Just as:

a) the conscious energy permeates every pore of the individual, yet that conscious energy is not the doer of deeds;

b) there is a constant change in each pore of the individual, yet this change is not an act of that conscious energy;

c) the constant flux in the universe takes place within That Brahm, yet Brahm is not the doer;

d) it is the attributes which are the doer – they interact within themselves and cause change;

– so also, the body, mind and intellect of man are comprised of the three attributes. As one attribute interacts with another, the influences that accrue from such interaction comprise action.


1. The individual Atma cannot claim any action as its own.

2. The individual Atma is merely a discerning entity.

3. The individual Atma is merely a witness.

4. The individual Atma is the epitome of Truth, Consciousness and Bliss.

5. The individual Atma is silence itself.

6. The individual Atma is blameless and devoid of aberration.

It is sheer ignorance to fetter That One through actions, who is ever devoid of any aberration, ever satiated, immortal and ever uninfluenced. It is only foolishness to think that the Atma can be influenced. The Lord says, “He who perceives the Atma as a doer, cannot witness the Truth.”

Now hear about the one who takes pride in doership – one who possesses a polluted intellect.

The consequences of attachment with qualities

Dear one, when the individual becomes attached to his own qualities:

1. He is ever immersed in the veiling of his inferior qualities.

2. He is ever absorbed in arrogant pride on account of his superior qualities.

3. He is ever engrossed in the suppression of the Truth and in the projection of the false.

4. He is so absorbed in this mixed task that his internal energies are benumbed.

5. He becomes more or less internally blinded to the external reality.

6. It is only when the internal thought processes are silenced that one can hear the sounds of external reality or Truth.

7. There is a constant war that rages within.

8. We continue to conceal ourselves in our own homes as well as outside. All this happens due to false pride.

a) ‘Nobody should see my lacunae.’

b) ‘Nobody should become aware of my reality.’

c) ‘Nobody should consider me to be inferior.’

d) ‘Let me veil my inadequacies so that others do not become aware of them.’

e) ‘Let me keep others under my thumb.’

Thus man lies and it becomes imperative for him to hide his true self. Since his inherent desire is so full of untruth, how can his eyes witness the Truth? The mind cannot perceive the Truth in any case. Then the attributes, the attachments and the ego of such a one are bound to be full of arrogant pride.

What is ego?

The essence of ego:

a) is only delusion;

b) is deceit and betrayal;

c) is pride and futile conceit;

d) is self praise.

The result of all this can only be:

a) lies,

b) duplicity,

c) dishonour,

d) the increase of demonic qualities,

e) the unbreakable fetters of one’s mental knots and complexities,

f) the tendency to stray from the right path and avoid one’s duty,

g) corrupt, degraded conduct.

Thereafter, anger erupts, greed is augmented, mental aberrations occur. Ego is the root of countless sorrows.

अध्याय १८

तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः।

पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः।।१६।।

देख नन्हूं! भगवान पुनः कहते हैं :

शब्दार्थ :

१. परन्तु ऐसा होने पर भी,

२. जो केवल आत्मा को ही कर्ता देखता है,

३. वह दुर्मति, अकृत बुद्धि होने के कारण,

४. (यथार्थ) नहीं देखता है।

तत्त्व विस्तार :

तौबा नन्हूं! देख भगवान क्या कह रहे हैं।

क) केवल मूर्ख ही,

ख) केवल बुद्धि हीन ही,

ग) केवल मलिन बुद्धि ही,

घ) केवल अशुद्ध बुद्धि ही,

आत्मा को कर्ता मानते हैं।


अकृत का अर्थ है :

– जो अधूरा रह गया हो।

– जो ग़लत हो, अशुद्धि पूर्ण हो, नासमझ हो तथा मूर्खता पूर्ण हो।

आत्मा का स्वरूप :

नन्हूं! भगवान पहले कह कर आये हैं कि :

1. आत्मा नित्य निर्लिप्त है, नित्य अकर्ता है।

2. आत्मा न स्वयं मरता है और न किसी को मारता है।

3. आत्मा तो स्वयं स्वरूप है।

4. आत्मा का कोई रूप नहीं होता।

5. साकार होते हुए भी वह निराकार है।

6. देखने में कर्म करते हुए भी वह कोई कर्म नहीं करता।

7. वह सब जगह परिपूर्ण है।

8. सबको वह धारण करता है, उसे कोई धारण नहीं करता।

9. वह सबमें है, उसमें कोई नहीं है।

10. सबके कर्म उसी से शक्ति पाकर होते हैं, पर आत्मा का कर्म कुछ भी नहीं है।

इसे यूँ समझ!

क) ज्यों जीव के रोम रोम में चेतन शक्ति समाई है, पर वह चेतन शक्ति कर्ता नहीं है।

ख) ज्यों जीव के रोम रोम में नित्य परिवर्तन आता है, पर वह उस चेतन शक्ति का कर्म नहीं है।

ग) पूर्ण ब्रह्माण्ड में जो क्रिया हो रही है, ब्रह्म में ही हो रही है, पर ब्रह्म कर्ता नहीं है।

घ) कर्ता गुण हैं, वे स्वयं एक दूसरे में वर्तते हुए परिवर्तन करते जाते हैं।

ऐसे ही जीव के तन, मन, बुद्धि त्रैगुण पूर्ण हैं। वहाँ गुण गुणों में वर्त रहे हैं और गुण प्रभाव रूप कर्म हो रहे हैं।

आत्मा :

जीव रूप आत्मा (जीवात्मा)

– का कोई कर्म नहीं है,

– केवल दृष्टामात्र है,

– केवल साक्षी मात्र है,

– केवल सत् चित्त आनन्द रूप है,

– केवल मौन स्वरूप है,

– केवल निर्दोष है।

वह आत्मा, जो नित्य निर्विकार है, नित्य तृप्त है, अजर अमर है, नित्य निर्लिप्त है, उसे कर्मों से बान्धना सर्वथा अज्ञानता है, मूर्ख का काम है, बुद्धिहीनता है, अशुद्ध बुद्धि का काम है। भगवान कहते हैं, ‘जो आत्मा को कर्ता देखता है, वह यथार्थ नहीं देखता।’

अब कर्ता मलिन बुद्धि पूर्ण कैसे होता है, इसे समझ! कर्तृत्व भाव अभिमानी की बात समझ!

गुणों से संग का परिणाम :

मेरी जान्! जब जीव अपने गुणों से संग कर बैठता है तो वह निरन्तर चेत, अर्धचेत तथा अचेत में:

1. अपने न्यून गुणों के छिपाव में लगा रहता है।

2. अपने श्रेष्ठ गुणों के गुमान में लगा रहता है।

3. वह झूठ सच के दबाव में तथा दिखावे में निरन्तर तत्पर रहता है।

4. वह आन्तर में इस मिश्रित काज में इतना खो जाता है कि उसकी मानसिक शक्तियाँ गौण हो जाती हैं।

5. उसकी मानसिक शक्तियों की दृष्टि बाह्य हक़ीक़त से तक़रीबन बेगानी हो जाती है।

6. भाई! अन्दर झमेले बन्द हों तो बाहर की आवाज़ आये या यथार्थ सुनाई दे।

7. आन्तर में तो भीषण युद्ध छिड़ा रहता है।

8. अपने घर में भी हम अपने को छुपाते रहते हैं और जग में जाकर भी हम अपने को छुपाते हैं। यह सब मिथ्या अभिमान के कारण होता है।

क) कोई मेरी ग़लती न देख ले,

ख) कोई मेरी न्यूनता या वास्तविकता पहचान न ले,

ग) कोई मुझे बुरा न कहे,

घ) कोई मेरी वास्तविकता न जान ले, सब पर मैं पर्दा डालकर रखूँ,

ङ) सबको मैं दबाकर रखूँ,

इस कारण जीव झूठ बोलता है और उसका छिपाव ज़रूरी हो जाता है। गर निहित चाह ही इतनी असत्पूर्ण हो तो दृष्टि सत् को क्या देखेगी? वह सत् देख ही नहीं सकती; मन सत् को देख ही नहीं सकता। तब गुण संग, रूप, अहंकार, दम्भ और दर्प पूर्ण होंगे ही।

अहंकार क्या है :

अहंकार का स्वरूप,

1. केवल मिथ्यात्व है।

2. छल कपट और विश्वासघात है।

3. ग़रूर और मिथ्या अभिमान है।

4. केवल आत्म प्रशंसा है।

भाई! उसका परिणाम भी,

क) झूठ ही हो सकता है।

ख) धोखा ही हो सकता है।

ग) बेईमानी ही हो सकता है।

घ) आसुरी गुण वर्धन ही हो सकता है।

ङ) जड़ चित्त ग्रन्थियों का जटिल बन्धन ही हो सकता है।

च) गुमराह होना या कर्तव्य हीनता ही हो सकता है।

छ) भ्रष्ट आचार ही हो सकता है।

तत्पश्चात् क्रोध उत्पन्न होगा ही, लोभ का वर्धन होगा ही, मानसिक कुरूपता होगी ही।

जीवन में अनन्त दुःखों की जड़ अहंकार ही है।

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