Chapter 18 Shloka 69

न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तम:।

भविता न च मे तस्मादन्य: प्रियतरो भुवि।।६९।।

There is no man on earth who does

Me a dearer service, nor is there anyone

who is dearer to Me than one who loves Me,

and who imparts this secret

knowledge of Mine to My devotees.

Chapter 18 Shloka 69

न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तम:।

भविता न च मे तस्मादन्य: प्रियतरो भुवि।।६९।।

The Lord continues:

There is no man on earth who does Me a dearer service, nor is there anyone who is dearer to Me than one who loves Me, and who imparts this secret knowledge of Mine to My devotees.

Look little one, the Lord is specifying His own preference.

The loving devotee

1. Such a one is akin to the Lord.

2. His qualities match those of the Lord.

3. He is the knower of the Lord’s qualities – their essence and their manifest form.

4. He is an anubhavi – he has experienced the Truth.

5. His own life is fragrant with the Lord’s divine qualities.

6. He has understood spiritual knowledge by illuminating it with the light of the Lord’s life.

7. He has consecrated his body, mind and intellect at the altar of the Lord’s divine qualities.

Such a one will protect the divine attributes even at the cost of his life.

He would relinquish his life:

a) but he will not risk the loss of the attribute of forgiveness;

b) but he will not lose his sincerity;

c) but he will not renounce his loving nature;

d) but he will not forgo his compassion;

e) but he will not let justice be sacrificed.

Such a one can never harbour a desire for the establishment of his body-self.

Little one, understand this if you can:

1. Such a one has donned the veil of love.

2. He has immured himself in the Lord’s Name.

3. He has forgotten his body and mind and their desires.

4. No longer does the ‘I’ rule him; he is ruled by the Lord.

5. He has given his body-self to the Lord.

Such people are extremely ordinary, yet who can be more extraordinary than they?

The Lord says, “Such people are dear to Me. There is none who is dearer to Me on the face of this earth. No matter what they do, they are infinitely precious for Me.”

The attributes of such a one’s saintliness are indeed exceptional:

1. Such a one will have no pride in his saintliness.

2. He cannot distance himself from the other by calling him despicable or evil.

3. He lives with ordinary people as an extremely ordinary person.

4. He does not destroy the beliefs and concepts of the other.

5. He is oblivious to his body-self, his body is ever engaged in the service of others.

Even though identified with others’ desires, such a one abides in his divine essence and thus conducts his life.

–  Who can be the enemy of one who is forgiveness itself?

–  Who can be insincere to one who is sincerity itself?

The Lord says, such elevated souls are dear to Him.

अध्याय १८

 न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तम:।

भविता न च मे तस्मादन्य: प्रियतरो भुवि।।६९।। 

अब आगे भगवान कहते हैं कि अर्जुन!

शब्दार्थ :

१. मुझसे प्रेम करने वाले और मेरे भक्तों को मेरा गुह्य रहस्य समझाने वाले से

२. बढ़ कर मेरा प्रिय कर्म करने वाला,

३. मनुष्यों में न कोई और है

४. और न उससे बढ़ कर अत्यन्त प्यारा,

५. मेरा पृथ्वी पर दूसरा कोई होगा।

तत्त्व विस्तार :

देख नन्हीं! भगवान अपनी ही पसन्द की बात कहते हैं।

प्रेमी भक्त :

ऐसा भगवान का भक्त :

1. भगवान का सजातीय ही होगा।

2. भगवान के समान गुणों वाला ही होगा।

3. भगवान के गुणों का रूप व स्वरूप जानने वाला होगा।

4. कोई अनुभवी ही होगा।

5. उसका अपना जीवन भी भागवत् गुण पूर्ण ही होगा।

6. वह भगवान की जीवन रूप ज्योति से भगवत् ज्ञान को ज्योतिर्मय करके समझा होगा।

7. वह अपने तन, मन, बुद्धि को भागवत् गुणों पर न्योछावर किये बैठा होगा।

यानि, वह अपने जीवन की बाज़ी लगा कर अपनी दैवी सम्पदा का संरक्षण करता होगा।

वे अपनी जान छोड़ सकते हैं,

– क्षमाशीलता नहीं छोड़ सकते।

– वफ़ा नहीं छोड़ सकते।

– प्रेम का स्वभाव नहीं छोड़ सकते।

– करुणा पूर्णता नहीं छोड़ सकते।

– न्याय नहीं छोड़ सकते।

– अपने तन की स्थापना की चाहना नहीं कर सकते।

नन्हीं! गर समझ सको तो समझ लो, वह तो :

क) प्रेम की चादरिया पहरे हैं।

ख) नाम का कफ़न पहरे हैं।

ग) अपने तन, मन को भूले बैठे हैं।

घ) उन पर ‘मैं’ का राज्य नहीं, भगवान का राज्य है।

ङ) वे अपना तन भगवान को दिये बैठे हैं। वे अतीव साधारण लोग होते हैं, किन्तु फिर भी उनसे विलक्षण कौन होगा?

भगवान कहते हैं, नन्हीं! ऐसे लोग मुझे प्यारे हैं। ऐसे लोगों से बढ़ कर मेरा अत्यन्त प्यारा धरती पर कोई और नहीं है। ऐसे लोग जो भी कर्म करते हैं, मुझे बहुत प्यारे हैं। नन्हीं बच्चू देख! उनकी साधुता के चिह्न ज़रा विलक्षण होंगे!

1. वे अपनी साधुता के गुमानी नहीं हो सकते।

2. वे दूसरे को निकृष्ट या दुष्ट कह कर उससे दूर नहीं हो सकते।

3. वे साधारण लोगों के साथ साधारण रूप में रहेंगे।

4. वे लोगों की मान्यता का भंजन नहीं करते।

5. वे तो अपने तन से बेसुध हैं, ऐसों का तन दूसरों के तन की निरन्तर सेवा करता है।

दूसरे के तद्‍रूप होकर, उसकी चाहनाओं के अनुरूप होकर भी वे अपने स्वरूप में स्थित ही जीवन बसर करते हैं। फिर यूँ समझो मेरी जान्!

– जो क्षमा स्वरूप हो, उसका दुश्मन कौन हो सकता है?

– जो वफ़ा स्वरूप हो, उससे बेवफ़ाई कोई क्या करेगा?

भगवान कहते हैं, उन्हें ऐसे लोग प्रिय होते हैं।

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