Chapter 18 Shloka 48

सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्।

सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः।।४८।।

One should not relinquish one’s natural duty 

even if it seems full of faults;

for all deeds are veiled with blemish

like fire is covered by smoke.

Chapter 18 Shloka 48

सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्।

सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः।।४८।।

My little one, now the Lord Himself says:

One should not relinquish one’s natural duty even if it seems full of faults; for all deeds are veiled with blemish like fire is covered by smoke.

Little one, even if one consider the natural deeds of one’s life to be flawed, one must not renounce them.

1. Every action can be faulted from some point of view or the other.

2. Actions could cause sorrow.

3. The consequences of some deeds could be quite painful.

4. One’s actions could be a source of pain to another.

5. One could perceive the blemish of attachment in actions.

6. One could also see the negativity of the ego in various actions.

7. Actions may be the source of the proliferation of negative attributes. Thus, all actions are veiled by smoke – however, a fiery brilliance may lie latent behind that smoke.

The birth of an individual is Brahm’s deed

1. The birth of actions takes place prior to the birth of an individual.

2. The individual’s birth is Brahm’s own deed.

3. Indeed, the creation of this entire universe is Brahm’s deed.

4. Each action is comprised of three attributes.

5. Every operation, every task is composed of these three attributes – this is the latent law of Brahm’s Supreme deed.

The essence of Brahm lies hidden in all His creation as fire lies latent in the fog of smoke.

1. The temperament of That Supreme One is also latent in His deed.

2. The dharma of the Supreme also lies latent in His actions.

3. The yagya of the Supreme lies concealed in His every deed.

The Lord specifies here:

1. All actions are veiled by the threefold attributes of maya – the illusory facet of Prakriti.

2. All beings are in fact cloaked by this threefold maya.

3. No being can survive without engaging in actions.

The body-self is bound to perform deeds – that is the natural temperament of the body. How can you prevent yourself from engaging in action? The Lord has clarified that He too, performs His duty. Whenever He takes birth, He engages in action spontaneously. Therefore one must not even consider the renunciation of actions even if one believes them to be faulty. Even if one renounces one’s duty, one must necessarily perform some deeds.

Karma and Akarma – Action and inaction

(For an elaboration on Karma and Akarma refer to Chp.4, shloka 18)

The Lord has clarified earlier:

1. He who perceives inaction in action, perceives the truth.

2. He who perceives action in inaction, perceives the truth.

3. All that one perceives is the interaction of qualities.

4. Those actions are performed by Prakriti.

5. Those actions are a consequence of one’s basic temperament.

6. Which action out of all these has been performed by one? Which action is one responsible for?

–  Attachment to deeds or aversion to deeds is one’s actual action.

–  Even though one cannot perceive attachment and aversion to be the ‘doers’ of actions, yet they are capable of the most complex tasks.

It is these:

a) which set in motion the cycle of birth and death;

b) which are the subtle breath of the gross body;

c) which form the seeds that sprout into new lives;

d) which are the cause of high or low births;

e) which make actions sinful or meritorious.

Understand this carefully my little one, it is attachment and ignorance that are the smoke that veils actions. What is required is not the renunciation of deeds but the annihilation of attachment and ignorance.

Little one,

1. As long as the idea of doership remains, all actions are tainted and defective.

2. As long as the idea of enjoyership remains, all actions are blemished.

3. As long as the ego remains, all actions are faulty.

An individual considers certain actions to be inferior and certain others to be superior. Those actions that are necessary for life can never be inferior. They have to be performed by somebody or the other. Therefore it is foolish to look down on the people who perform those tasks for you, that you cannot do without, but do not perform yourself.

Little one, sadhana or spiritual practice, too, is an action and until the aspirant reaches perfection in the goal he aspires for, his sadhana continues under the influence of the three attributes of Prakriti. Since the aspirant’s act of sadhana is full of the pride of doership, it is cloaked in the smoke of ignorance.

Perceive your attitude towards sadhana carefully and notice the three attributes which inhere therein:

1. If your spiritual practice teaches you to escape from your duty, it is verily tamsic in nature.

2. If your spiritual practice binds you to the fruit thereof, it is rajsic in nature.

3. If your spiritual practice binds you to joy and to knowledge, it is sattvic in nature.

4. If your spiritual practice frees you of attachment, it can grant you the Supreme state.

Then you will neither renounce your duties nor seek the fruits of your actions, nor wish for happiness. You will merely renounce the body idea completely.

अध्याय १८

सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्।

सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः।।४८।।

मेरी जान्! अब भगवान स्वयं कहते हैं :

शब्दार्थ :

१. अपना सहज कर्म सदोष भी हो,

२. तो भी उसको नहीं त्यजना चाहिये।

३. क्योंकि सारे कर्म धुएँ में अग्नि समान,

४. दोष से आवृत हैं।

तत्त्व विस्तार :

दोषपूर्ण कर्म :

नन्हीं देख! जीवन के सहज कर्म गर दोषपूर्ण भी समझो, तब भी उन्हें न छोड़ना।

1. किसी न किसी दृष्टिकोण से सब कर्मों में दोष आरोपित हो सकते हैं।

2. कर्म का दुःख भी हो सकता है।

3. कर्म का परिणाम भी दुःखमय हो सकता है।

4. कर्मों से दूसरा भी दुःखी हो सकता है।

5. कर्मों में संग भी दिखाई दे सकता है।

6. कर्मों में अहंकार भी दिखाई दे सकता है।

7. वास्तव में विपरीत गुणों की वृद्धि भी कर्म राही हो सकती है। सब कर्म धुएँ से आवृत होते हैं, किन्तु उनके पीछे अग्न रूप ज्योति हो सकती है।

जीव का जन्म भी ब्रह्म का कर्म है:

क) जीव के जन्म से पहले ही कर्म का जन्म हो जाता है।

ख) जीव का जन्म ब्रह्म का कर्म है।

ग) सृष्टि की रचना ब्रह्म का कर्म है।

घ) हर कर्म त्रैगुणात्मक है।

ङ) हर क्रिया त्रैगुणात्मक है, हर कार्य त्रैगुणात्मक है और यही ब्रह्म कर्म का नियत नियम है।

परम तत्त्व सार, रहस्य रूप में मानो ज्ञान अग्न के समान इन सबमें निहित है।

– परम स्वभाव भी इसी कर्म में निहित है।

– परम का धर्म भी इसी कर्म में निहित है।

– परम का कर्म भी इसी कर्म में निहित है।

भगवान यहाँ कह रहे हैं :

1. सम्पूर्ण कर्म त्रिगुणी माया से आवृत हैं।

2. सम्पूर्ण जीव ही त्रिगुणी माया से आवृत हैं।

3. फिर कर्म के बिना जीव जीवन में रह भी नहीं सकता।

तन तो कर्म करेगा ही, यह तन का सहज स्वभाव है। अपने आपको कर्म से कैसे रोक सकोगे? भगवान ने कहा है कि वह भी कर्तव्य कर्म करते है। भगवान जब जन्म लेते हैं, वह स्वयं भी सब कर्म सहज में करते हैं। इस कारण कर्म त्याग की मत सोचो, कर्म को दोष युक्त जान कर मत छोड़ दो। कर्तव्य छोड़ कर जाओगे, तो भी कुछ तो करना ही होगा।

कर्म अकर्म :

(कर्म अकर्म के विस्तार के लिये 4/18 देखिये।)

पर देख मेरी सखी! भगवान पहले कह कर आये हैं :

– जो कर्म में अकर्म देखता है, वही सत् को देखता है।

– जो अकर्म में कर्म को देखता है, वही सत् देखता है।

– जो दृष्ट रूप से देख रहे हो, वह तो सहज गुण करते हैं।

– वह तो प्रकृति करवाती है।

– वह तो स्वभाव का परिणाम है।

इसमें आपने क्या किया है, इसमें आपका कौन सा कर्म है?

क) कर्म से राग या कर्म से द्वेष ही आपका कर्म है।

ख) राग द्वेष चाहे दृष्ट रूप में कुछ नहीं करते, यानि कर्म नहीं करते, पर फिर भी ये महा जटिल कर्म कर देते हैं।

देख न! यही तो :

1. जन्म मरण का चक्र चलाते हैं।

2. स्थूल का सूक्ष्म प्राण बनते हैं।

3. नवजीवन के बीज का रूप धरते हैं।

4. उच्च नीच योनि का कारण बनते हैं।

5. कर्मों को पापयुक्त पुण्यमय बना देते हैं।

इसे ध्यान से समझ मेरी जान्! यह संग और अज्ञान ही कर्मों पर धुआं है। कर्म त्यागना नहीं चाहिये, अज्ञान आवरण को मिटाना चाहिये।

नन्हीं लाडली!

क) जब तक कर्तृत्व भाव है, तब तक सब कर्म सदोष ही हैं।

ख) जब तक भोक्तृत्व भाव है, तब तक सब कर्म सदोष ही हैं।

ग) जब तक अहं भाव है, तब तक सब कर्म सदोष ही हैं।

फिर जीव कई कर्मों को न्यून समझता है और कई कर्मो को श्रेष्ठ समझता है। जो कर्म जीवन में जीने के लिए ज़रूरी हैं, वे न्यून नहीं हो सकते। वे तो किसी न किसी को करने ही होते हैं। इसलिए जो कर्म आपके लिए ज़रूरी हैं, पर कोई और कर देता है, उस करने वाले को न्यून कहना मूर्खता ही है।

नन्हीं! साधना भी कर्म ही है और जब तक साधक सिद्धि नहीं पा जाता, उसका साधना रूपा कर्म भी त्रैगुणपूर्ण ही होता है। साधक का साधना रूपा कर्म भी कर्तापन के गुमानपूर्ण होने के नाते धुएँ से आवृत होता है।

साधना के प्रति अपना दृष्टिकोण देख लो, उसी में त्रैगुण निहित होते हैं।

यदि साधना आपको,

1. कर्तव्य पलायन कर दे तो तामसिक है।

2. फल से बांध दे तो राजसिक है।

3. सुख और ज्ञान से बांध दे तो वह सात्त्विक है।

4. संग रहित कर दे तो वह परम पद दायिनी है।

तब आप न कर्तव्य छोड़ेंगे, न ही कर्मफल चाहेंगे, न ही सुख को चाहेंगे। तब आप अपना तनत्व भाव ही छोड़ देंगे।

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