Chapter 18 Shloka 15

शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः।

न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः।।१५।।

Any act initiated by man

through mind, speech or body,

whether it be just or unjust,

is dependent on these five causal factors.

Chapter 18 Shloka 15

शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः।

न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः।।१५।।

Look, the Lord is saying to Arjuna:

Any act initiated by man through mind, speech or body, whether it be just or unjust, is dependent on these five causal factors.

The Lord is reiterating that all acts of man:

a) are caused by the conjunction of these five factors;

b) are effected by the interplay of qualities, the union of certain qualities, the separation of certain other qualities.

That is, the body, the doer, the qualities along with the sense faculties giving rise to attraction and repulsion, the endeavours, and daiv or destiny – all these comprise the causal factors of all mental, physical and spoken actions.

Mental deeds

1. To be happy or sorrowful are deeds of the mind.

2. To be inflamed by anger.

3. To be troubled by remorse.

4. Greed, avarice, jealousy, hatred etc.

5. Joyousness.

6. The emergence of compassion and a merciful attitude.

7. Revelling in just or unjust thought processes.

8. Mental ruminations.

9. Dwelling in dualities.

10. Conflicts that disturb and distress.

11. Sentiments and opinions.

12. Excitement or calmness.

13. Mental reservations, etc.

All these comprise actions of the mind. These thought processes happen within the mind. Their base is the same conglomerate of five factors.

Actions of speech

Actions of speech are constantly revealed through one’s words.

1. One’s speech could be just.

2. It could be filled with falsehood or truth.

3. Speech can unsettle or establish.

4. Speech can be destructive.

5. Speech can be filled with discussions about the Lord.

6. Speech can also inspire one towards the Lord.

7. Speech can also be deceitful.

8. Speech can also rob the other of his honour.

Speech influences one in many ways. The action of speech lies in the flow of words.

Little one! All actions relating to the inner self of man, constitute mental deeds. And all actions of the voice (pertaining to words) are actions of speech.

Bodily actions

All actions performed by the body are physical actions. Every gross deed thus comes within its ambit.

The Lord says that the actions of man, whether of the body, speech or mind, are conducted by the aforementioned five factors. No matter if the action is just or unjust, it stems from these five factors. Little one, now understand the nature of just deeds.

Just deeds

Those deeds are considered to be just, which:

a) adhere to the Truth;

b) are noble and exalted;

c) which are righteous;

d) which regard the fulfilment of duty as their base. For example, you are someone’s daughter, you are somebody’s sister – it is only just that you fulfil all your obligations due to these relationships. If a son ignores his duties towards his parents, he is unjust. Little one, parents may be at fault at times, but they cannot procure new children! Always support justice – even though it may be against your parents; however, never ignore your duties towards your parents. You are their children. Do not snatch away their children from them.

e) Service and charity comprise just deeds.

f)Tapas or forbearance and yagya comprise just deeds.

g) Divine qualities are innately just.

All that is opposite to such deeds is untrue and unjust.

Unjust deeds

a) Untruthful, unjust and depraved deeds.

b) Merciless and deceitful actions.

c) Destructive deeds.

d) Harsh actions full of hatred, jealousy and cruelty.

e) Deeds that express pride, arrogance, criticism and insult.

f) Deeds that cause distress to another.

g) Deeds full of anger and venom.

All these constitute unjust deeds.

All actions, whether just or unjust, are comprised of the five factors mentioned in the previous shloka. So also, these five factors apply to actions of the body. Whether the individual’s actions are just or unjust, beneficial or harmful, they are all comprised of these vital five factors.

Hetu (हेतु)

1. The instrumental factors.

2. The fundamental base.

3. These factors combine to produce the goal of action.

4. Together, they give form to action.

5. They are the means to action.

6. They combine to devise actions.

Therefore it is clear that an individual’s greatest mistake is to fill the idea of doership into his deeds.

अध्याय १८

शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः।

न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः।।१५।।

देख! भगवान कह रहे हैं अर्जुन से :

शब्दार्थ :

१. मनुष्य, मन, वाणी और शरीर से,

२. न्यायपूर्वक या अन्यायपूर्वक,

३. जो भी कार्य आरम्भ करता है,

४. उसके ये पांच कारण हैं।

तत्त्व विस्तार :

भगवान यहाँ पुन: बता रहे हैं कि जीव के सम्पूर्ण कार्य :

क) इन्हीं पांच हेतुओं के मिलन के कारण होते हैं।

ख) गुण खिलवाड़, गुण मिलन, गुण वियोग, सबका कारण यही है।


– तन और कर्ता रूप,

– गुण और इन्द्रियाँ, आकर्षण या प्रतिकर्षण रूप,

– चेष्टा और दैव, यही सम्पूर्ण मानसिक, कायिक, वाचिक कर्मों के हेतु हैं।

मानसिक कर्म :

1. दुःखी सुखी होना, मनो कर्म अर्थात् मानसिक कर्म हैं।

2. क्रोध से भड़कना,

3. क्षोभ से पीड़ित होना,

4. लोभ, तृष्णा, ईर्ष्या, द्वेष इत्यादि,

5. आनन्द रूप अनुरूप,

6. दया तथा करुणा का उठना,

7. न्यायपूर्ण तथा अन्यायपूर्ण विचार में रमण,

8. संकल्प विकल्प रूपा कर्म,

9. प्रतिद्वन्द्व, जो विचलित कर देते हैं,

10. भाव भावनायें,

11. आवेग या सौम्यता,

12. मानसिक प्रतिबन्ध,

इत्यादि मानसिक कर्म हैं। यह विचार धारायें मन में होती है। इन मानसिक कर्मों के यही पांच हेतु हैं।

वाचिक कर्म :

वाणी के कर्म वाक् राही नित्य प्रदर्शित होते ही रहते हैं :

क) वाक् न्यायपूर्ण भी हो सकता है।

ख) वाक् मिथ्यात्व पूर्ण या सत् पूर्ण भी हो सकता है।

ग) वाक् चलायमान करने वाला या स्थापित करने वाला भी हो सकता है।

घ) वाक् मिटाने वाले भी हो सकते हैं।

ङ) वाक् भागवत् चर्चा पूर्ण भी हो सकते हैं।

च) वाक् भगवान की ओर प्रेरित करने वाले भी हो सकते हैं।

छ) वाक् कपट पूर्ण भी हो सकते हैं।

ज) वाक् दूसरे की आबरू लूटने वाले भी हो सकते हैं।

वाक् अनेकों प्रकार से प्रभावित करते हैं आपको या दूसरे को। वाक् का कर्म शब्द प्रवाह है।

नन्हूं! अन्तःकरण के सारे कर्म मानसिक कर्म माने जाते हैं और वाणी के सम्पूर्ण कर्म (शब्द रूप) वाङ्मय कर्म माने जाते हैं।

शारीरिक कर्म :

शारीरिक कर्म वे होते हैं जो आपका तन करता है। जीव का हर स्थूल कर्म शारीरिक कर्म है।

भगवान कहते हैं कि जीव का कर्म कायिक, वाचिक, या मानसिक, जो भी हो, वह इन पांच हेतुओं से होता है। कर्म न्यायपूर्ण या न्याय विपरीत, जैसा भी हो, उसके ये पांच ही कारण हैं। नन्हूं जान्! अब न्यायपूर्ण कर्म समझ ले।

न्यायपूर्ण कर्म :

न्यायपूर्ण कर्म वे होते हैं, जो :

1. सत् पूर्ण कर्म हों।

2. श्रेष्ठ कर्म हों।

3. उचित कर्म हों।

4. कर्तव्य करना ही होता है, यह न्यायपूर्ण कर्म का आधार है।

उदाहरणतः, तुम किसी की बेटी हो, किसी की बहिन हो, तुम्हारा उनसे नाता निभाना ही न्याय है। यदि बेटा पुत्र के कर्तव्य को त्याग देता है तो वह अन्याय करता है। नन्हूं! माँ बाप ग़लत भी हो सकते हैं, किन्तु वे नये बच्चे तो नहीं ला सकते। नन्हूं! हमेशा न्याय का साथ दो, चाहे वह अपने माँ बाप के खिलाफ़ ही हो, किन्तु अपने माँ बाप के प्रति भी जो कर्तव्य हैं, उन्हें भी निभाओ। उनके बच्चे तो तुम हो, उन्हें तो उनसे न छीन लो।

5. सेवा तथा दान न्यायपूर्ण कर्म हैं।

6. तप तथा यज्ञ न्यायपूर्ण कर्म हैं।

7. दैवी गुण न्यायपूर्ण ही हैं।

इनसे जो विपरीत हैं, उसे असत् व अन्यायपूर्ण कर्म कहते हैं।

अन्यायपूर्ण कर्म :

क) असत् तथा अन्यायपूर्ण कर्म दुराचारी कर्म हैं।

ख) निर्दयता, छल कपट पूर्ण कर्म,

ग) विनाश करने वाले कर्म,

घ) कुटिलता, द्वेष, ईर्ष्या, धृष्टता,

ङ) घमण्ड, दर्पपूर्ण कर्म, निन्दा तथा अपमानजनक कर्म,

च) किसी को तड़पाना,

छ) क्रोध तथा वैमनस्य पूर्ण कर्म,

ये सब अन्यायपूर्ण कर्म हैं।

कर्म न्यायपूर्ण हों या अन्यायपूर्ण हों, इनके हेतु ये पांच ही हैं। इसी विधि तनो कर्म के भी ये पांच हेतु हैं। जीव भला करे या बुरा, न्याय करे या अन्याय, भाई! जो भी करे, हेतु ये पांच ही होते हैं।

हेतु :

हेतु भी समझ ले। हेतु :

1. निमित्त कारण को कहते हैं।

2. मूलभूत आधार को कहते हैं।

3. ये मिल कर कर्म उद्देश्य बनते हैं।

4. कर्म को रूप ये मिलकर देते हैं।

5. कर्म के साधन रूप ये ही हैं।

6. कर्म के रूप धरने की युक्ति बताने वाले ये ही हैं।

 सो समझ ले! कर्म में अपना कर्तापन भर देना ही जीव की भूल है।

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