Chapter 1 Shloka 2

संजय उवाच

दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा।

आचार्यमुपसंगम्य राजा वचनमब्रवीत्।।२।।

Sanjay replied:

At this time, Raja Duryodhana,

on seeing the Vyuha formation of the Pandava army,

approached Dronacharya and said…

Chapter 1 Shloka 2

संजय उवाच

दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा।

आचार्यमुपसंगम्य राजा वचनमब्रवीत्।।२।।

Sanjay replied:

At this time, Raja Duryodhana, on seeing the Vyuha formation of the Pandava army, approached Dronacharya and said…

Vyuha (व्यूह)

1  Arrangement of army assemblage.

2. The establishment of the army at pre-determined positions in accordance with military strategy before the outbreak of war.

3. To bind an army to a certain routine.

Why did Duryodhana go to Acharya Drona?

a) Duryodhana did not send for Dronacharya.

b) Why did ‘King’ Duryodhana thus renounce royal tradition and approach Acharya Drona himself?

c) It was not as though he did so out of regard for Acharya Drona, for he did not obey his guru when the latter had warned Duryodhana against the impending war. Besides how could he have respected Dronacharya?

–  Dronacharya had supported Duryodhana in his every sinful act.

­­–  He had remained silent even upon being witness to Duryodhana’s atrocities and deceitful methods.

–  Nor had he stopped Duryodhana’s harassment of the Pandavas.

How could such a teacher earn the respect of his pupils? Then why did Duryodhana go to Dronacharya?

Duryodhana’s anxiety

1. Duryodhana was afraid and anxious.

2. All the elders had predicted his defeat.

3. Arrogance engenders cowardice and Duryodhana was afraid lest Dronacharya accepted defeat.

4. Duryodhana approached Dronacharya to provoke his anger and incite him against the Pandavas.

This is proof of Duryodhana’s shrewdness in matters of strategy.

Duryodhana is called ‘King’ in this shloka, because:

a) he was the virtual king and possessed the ego of a ruler;

b) he was arrogant and conceited;

c) he exuded jealousy and hatred;

d) he knew his position was weak, yet he was greedy to expand the kingdom.

The side of falsehood is always weak. He who treads this path is always anxious, yet arrogant. In fact, Duryodhana was not the true king, but was boastful on usurping another’s kingdom!

1. The kingdom belonged to his father.

2. The Pandavas were the rightful heirs to the kingdom.

This is precisely what the ego does.

The sadhak, on the other hand, says:

‘O Lord! This body is Thine! My ego has usurped Thy kingdom and silences the intellect whenever it tries to reveal the Truth. It does not accept its own follies even upon knowing them. It takes pride in its prowess which in reality is a gift from the Lord. It proclaims itself the master of all the riches, wealth and other attributes which in fact do not belong to it.’

We, too, possess egoistic tendencies as symbolised by Duryodhana.

O Lord! On the one hand lies virtue and Thy name and on the other, this ego and bodily attachment. This ego has snatched away what is Thine and become its master. In other words, on one side there exists love for knowledge and Truth and the desire to practice the divine qualities, and on the other side is the ego, established in demoniacal attitudes born out of attachment to the body.


Through fighting the battle of sadhana the seeker desires to:

a) attain divinity;

b) become an Atmavaan;

c) be imbued with the supreme attributes of the Lord;

d) achieve nobility.

But little one, this is a sadhak’s internal phenomena. A war rages within between the mind and the intellect. The sadhak must defeat his mind and ensure the victory and supremacy of his intellect. Only when he respects the intellect instead of the mind, will he be able to effectively practice that knowledge which he knows to be the Truth. The sadhak fails because he is unable to apply the knowledge he has understood in his practical life.

Dear little one! This occurs because your mind disregards the inclination of your own intellect and thus brings dishonour to it. That knowledge which you cherish in the temple, is upheld by the intellect, and it is the mind which disregards it through contrary practice in life. This variance between the values one upholds in the place of worship and in practice, is in fact the difference between the mind and the intellect.


अध्याय १

संजय उवाच

दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा।

आचार्यमुपसंगम्य राजा वचनमब्रवीत्।।।।

इस पर संजय बोले :

शब्दार्थ :

१. उस समय राजा दुर्योधन ने

२. व्यूह रचनायुक्त पाण्डवों की सेना को देख कर

३. और द्रोणाचार्य के पास जाकर

४. (यह) वचन कहा।

तत्व विस्तार :

व्यूह का अर्थ है :

क) सेना संग्रह विधि।

ख) संग्राम पूर्व युद्ध नीति युक्त सेना की नियुक्ति तथा सैनिक स्थापना।

ग) सेना को क्रमबद्ध करना।

दुर्योधन आचार्य द्रोण के पास क्यों गये?

1. दुर्योधन ने द्रोणाचार्य को बुलाया नहीं।

2. ‘राजा’ दुर्योधन राज्य प्रथा त्याग कर स्वयं द्रोणाचार्य के पास क्यों गये?

3. गुरु लाज की बात नहीं थी; वह द्रोणाचार्य की बात नहीं मानते थे। जब द्रोणाचार्य ने युद्ध करने के विरुद्ध सलाह दी थी, तब दुर्योधन ने उनकी बात नहीं मानी थी।

वे द्रोणाचार्य की इज्ज़त करते भी कैसे?

1. हर पाप में द्रोणाचार्य ने दुर्योधन का साथ दिया था।

2. दुर्योधन का छल कपट देखकर भी वह मौन रहे थे।

3. दुर्योधन को पाण्डवों पर अत्याचार करते हुए देख कर भी उन्होंने उसको रोका नहीं।

ऐसे को गुरु कोई कैसे माने?

फिर वह आचार्य के पास क्यों गये?

दुर्योधन की घबराहट :

1. दुर्योधन भयभीत तथा घबराये हुए थे।

2. सब बड़े कह चुके थे कि वह हार जायेंगे।

3. घमण्ड इन्सान को भीरू बना ही देता है।

4. दुर्योधन डरते थे कि कहीं द्रोणाचार्य हार न मान लें।

5. द्रोणाचार्य को उत्तेजित करने और उकसाने के लिये दुर्योधन उनके पास गये।

यह दुर्योधन की नीति कुशलता का प्रमाण है।

यहाँ दुर्योधन को ‘राजा’ कहा गया है

क्योंकि :

1. वह राजा भी था तथा उसमें राजा का अहंकार भी था।

2. वह दम्भ दर्प से चूर्ण भी था।

3. वह ईर्ष्या, द्वेष परिपूर्ण भी था।

4. वह जाने था पक्ष निर्बल है फिर भी राज्य वर्धन का लोभी था।

असत् का पक्ष निर्बल ही होता है। असत् पर चलने वाला घबराता है, इतराता है। दुर्योधन राजा था ही नहीं; किसी का राज्य लेकर दम्भ कर रहा था।

1. राज्य तो पिता का था।

2. राज्य तो पाण्डवों का था।

अहंकार भी यही करता है।

साधक कहता है, हे राम!

1. यह तन तेरा है, तेरा राज्य छीन कर बैठा है मेरा अहंकार।

2. कभी कभी बुद्धि सत् दर्शाये भी, तो उसे मौन कर देता है।

3. अपनी न्यूनता जान कर भी अपने को न्यून नहीं मानता।

4. अपने बल पर इतराता है; जो बल वास्तव में भगवान का है।

5. धन, दौलत, सब गुण तेरे; मालिक अहं बन गया है।

हमारे अपने में ही तो दुर्योधन रूपा अहंकार वृत्ति निहित है।

हे भगवन्! आन्तर क्षेत्र में :

एक ओर साधु वृत्ति और तेरा नाम है; दूजी ओर अहंकार सहित यह तन है। तेरा तुझसे छीन लिया मेरी ʅमैंʆ ने, और ʅमैंʆही राजा बन गया है।

यानि एक ओर ज्ञान और सत् में रूचि तथा देवता बनने की चाह भी है और दूसरी ओर अहंकार है, जो अपने तन से संग करके असुरत्व में टिका हुआ है।

साधना :

साधक, साधना रूपा युद्ध करके :

– देवत्व पाना चाहता है।

– आत्मवान् बनना चाहता है।

– परम गुण सम्पन्न होना चाहता है।

– श्रेष्ठ बनना चाहता है।

किन्तु नन्हीं जान्! यह समझ ले कि यह सब साधक के लिये उसके आन्तर में होता है। साधक के आन्तर में झगड़ा उसकी बुद्धि और मन का है। आपने अपने मन को हरा कर अपनी ही बुद्धि को प्रधानता तथा उच्चता देनी है। जो ज्ञान आपकी बुद्धि ने सत् माना है, उस ज्ञान को तब ही जीवन में ला सकेंगे यदि आप अपने मन की जगह अपनी बुद्धि का मान करेंगे। साधक हारता इसलिये है क्योंकि अपनी ही बुद्धि से समझे हुए ज्ञान को अपने ही जीवन में नहीं ला सकता।

लाडली! यह इसलिये होता है क्योंकि आपका मन, आपकी अपनी ही बुद्धि की पसंद की परवाह नहीं करता, यानि आप स्वयं अपनी बुद्धि की परवाह नहीं करते बल्कि उसका नित्य अपमान करते हैं। जिस ज्ञान को आप मंदिर में ठीक मानते हैं, वह आपकी बुद्धि मानती है। जब दिनचर्या में उसके विपरीत व्यवहार करते हैं, वह आपका मन करवाता है। मन्दिर की विचारधारा और सहज जीवन की विचारधारा में जो भेद है, वह ही मन और बुद्धि का भेद है।

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