Chapter 1 Shloka 14

तत: श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ।

माधव: पाण्डवश्चैव दिव्यौ शंखौ प्रदध्मतु:।।१४।।

Then, seated in a grand chariot

drawn by white horses,

Lord Krishna and Arjuna blew their divine conches.

Chapter 1 Shloka 14

तत: श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ।

माधव: पाण्डवश्चैव दिव्यौ शंखौ प्रदध्मतु:।।१४।।

Then, seated in a grand chariot drawn by white horses, Lord Krishna and Arjuna blew their divine conches.

If the attachment of the mind is with the Truth, then bhavana dons the form of the Medhavi – the pure intellect of wisdom.

Attachment with the Truth indicates:

a) an attachment with the Supreme Essence;

b) an attraction towards the divine qualities;

c) a bond with the Essence of Lord Krishna and allegiance to the qualities of the Lord;

d) sincerity solely towards the Lord and a will to live only for the discharge of one’s duty towards the divine qualities.

Attachment to the Truth translated into daily living:

a) He who loves divine qualities will love all because his attachment is with love – not with any individual.

b) He will be just with all because he cherishes justice without any personal considerations.

c) He who treasures the attribute of forgiveness will forgive all, even those who trespass against him.

d) He who loves those who care for the needy will inevitably become a benefactor of the destitute himself.

e) Love of divine qualities leads to the possession of divine qualities.

The Lord Himself is the charioteer and companion of such a one.

Purpose of the Lord’s birth

1. For the protection of the sadhu invested with divine qualities.

2. To protect the qualities of the Supreme in these worshippers of righteousness.

3. To give practical proof of how divine qualities are nurtured in ordinary day to day living.

4. To demonstrate in practice the fine distinction between the swaroop and the roop of divinity: the quintessence of divinity, and its form in practice.

Lord Krishna now begins to reveal to Arjuna – the epitome of divine qualities – the method of bringing the qualities of the Supreme into practice.

If a basic love for Truth exists, an individual takes the support of the Lord and of the Scriptures. He moulds his intellect and subsequently his practical life in accordance with scriptural tenets. His life becomes an example of the scriptural way of life and the manifest form of knowledge, and ultimately he merges in the Lord.

Lord Krishna’s proclamation

Lord Krishna was the first to blow the conch from the Pandavas’ side. Thus, the Embodiment of Dharma, the most Supreme Being amongst all men personifying the Guru Himself, proclaimed war on Arjuna’s behalf. Now Arjuna, too, blew his conch. Blowing the conch on behalf of the Pandavas, Lord Krishna:

a) proclaimed His sympathy with the Pandavas;

b) declared His support for the followers of righteousness;

c) revealed His intention to side with divinity;

d) proclaimed His decision to protect His friend Arjuna’s honour and be true to His friendship;

e) announced His protection for those who sought refuge in Him;

f)  made public his intention of giving proof of Dharma in practice;

g) announced His decision to seize the hand of a follower on the path of righteousness – Shreya path, and guide him.

The Lord blew this conch to ensure the victory of the devtas or those imbued with divine attributes. He also declared thus His commitment to protect the virtuous traits of sadhus.

Arjuna’s declaration of war

Then Arjuna, endowed with divine qualities, blew his conch.

1. He who had ever forgiven his enemy, now declared war.

2. The Pandavas who were free of deceit, wile and enmity, declared war.

3. The magnanimous at heart – the great yet humble ones, proclaimed war.

4. The devtas now urged their opponents, the asuras, to war.

5. Those powerful beings who had hitherto conducted themselves meekly and submissively, now challenged Duryodhana to war.

6. They who had so far endured all travails with a smile, now sought to end their sorrows and so proclaimed war.

A sadhak’s perspective

Such is the internal dilemma of a sadhak. Such is  his internal state. The Lord is Himself holding the hand of the seeker and urging him to fight. It is right for him to kill the wicked and their supporters; it is correct to oppose the perpetrators of atrocities even though no personal gain may be involved.

Lord Krishna became Arjuna’s charioteer

Lord Krishna had pronounced, “I will not fight. I will not lift up arms.”

1. It is the seeker who has to fight. The Lord only suggests the strategy.

2. The Lord can show the path, but it is the seeker who has to learn to fight and win the battle of life.

3. The Lord endows knowledge but the seeker must apply his courage and strength.

4. The credit of accomplishment will ultimately go to the seeker who must conduct his actions with courage, intelligence and forbearance.

Lord Krishna’s divinity

My little Abha! The union of the Lord and Arjuna is extraordinary:

a) It is extraordinary for the Lord to enter the battlefield without weapons.

b) His decision to abstain from fighting is also exceptional.

c) His decision to become Arjuna’s charioteer is incredible.

d) It was unbelievable that the brave, fearless and powerful Pandavas could propose a treaty in which they sought merely five villages from Duryodhana.

e) Such a war between the devtas and the asuras is also unique.

f)  That those endowed with divine qualities were prepared to embark on a fearful war is an unusual event.



तत: श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ।

माधव: पाण्डवश्चैव दिव्यौ शंखौ प्रदध्मतु:।।१४।।

शब्दार्थ :

१.  इसके पश्चात्,

२.  सफ़ेद घोड़ों से युक्त,

३.  उत्तम तथा महान् रथ में बैठे हुए,

४.  श्री कृष्ण तथा अर्जुन ने भी,

५.  अलौकिक शंख बजाये।

तत्व विस्तार :

गर मन का संग सत् से हो जाये तो भावना मेधावी का रूप धारण कर लेती है।

सत् सों संग का अर्थ है :

1. परम तत्व से संग।

2. परम के गुणों से संग।

3. कृष्ण तत्व से संग।

4. परम गुण परायणता।

5. भगवान के गुणों से वफ़ा।

6. केवल मात्र भगवान से वफ़ा।

7. केवल मात्र भगवान के प्रति कर्तव्य।

8. केवल मात्र दैवी सम्पदा के प्रति कर्तव्य।

9. केवल मात्र दैवी सम्पदा के प्रति प्रेम।

10. केवल मात्र दैवी सम्पदा के लिये जीना।

यह तो आन्तरिक संग की बात कही अब इसे जीवन में भी समझ लें।

1. भगवान के गुणों से प्रेम करने वाला जीव सबसे प्रेम करेगा क्योंकि उसकी लग्न प्रेम से है, जीव से नहीं।

2. भागवत् गुण न्यायसे प्रेम करने वाला जीव सबसे न्याय करेगा क्योंकि उसकी लग्न न्याय से है, जीव से नहीं।

3. भागवत् गुण क्षमासे प्रेम करने वाला जीव अपने पर प्रहार करने वाले को भी क्षमा कर देता है।

4. दीनबन्धु से प्रेम करने वाला दीनबन्धु हो ही जायेगा।

5. भागवत् गुणों से प्रीत करने वाला दैवी सम्पद् सम्पन्न होगा ही। ऐसे जीव के साथी तथा सारथी भगवान होते हैं।

भगवान के जन्म का प्रयोजन :

1. भगवान साधुता सम्पन्न साधुगण के संरक्षण के लिये ही जन्म लेते हैं।

2. दैवी सम्पदा तथा परम गुण सम्पन्न साधु गण की रक्षा भगवान करते हैं, इस कारण ही वह जन्म लेते हैं।

3. साधारण जीवन में ही परम गुण पलते हैं और परम गुणों को पालने की विधि का प्रमाण भगवान अपने जीवन की राही देते हैं।

4. दैवी सम्पदा का स्वरूप तथा रूप समझाने के लिये भगवान जन्म लेते हैं।

अर्जुन, जो दैवी गुण सम्पन्न थे, उन्हें भगवान कृष्ण मानो परम के गुणों को जीवन में लाने की विधि समझाने लगे हैं।

सत्य प्रियता हो तब जीव भगवान का आसरा लेता है, शास्त्रों का आसरा लेता है और अपनी बुद्धि शास्त्रानुकूल बनाता है। अपना जीवन शास्त्र कथित विधि का प्रमाण बनाता है, अपना जीवन शास्त्र कथित ज्ञान का रूप बनाता है तत्पश्चात् वह परम में लीन हो जाता है।

अर्जुन का शंख सर्वप्रथम कृष्ण ने बजाया और साथ ही अर्जुन ने भी अपना शंख बजाया।

भगवान कृष्ण की घोषणा :

सारथी श्याम ने अब युद्ध की घोषणा कर दी। धर्म स्वरूप, गुरु रूप परम पुरुष पुरुषोत्तम ने शंख बजा कर युद्ध की घोषणा कर दी। भगवान कृष्ण ने पाण्डवों के लिये शंख बजा कर उनके साथ –

1. अपनी सहानुभूति की घोषणा कर दी।

2. सत् पर चलने वालों का साथी बनने की घोषणा कर दी।

3. देवत्व समर्थन की घोषणा कर दी।

4. सखा अर्जुन की लाज निभाने की तथा बचाने की घोषणा कर दी।

5. प्रेम की लाज बचाने तथा निभाने की घोषणा कर दी।

6. सखा अर्जुन के वह तद्रूप हो गये।

7. शरणागत की लाज बचाने को भगवान आये हैं, इसकी घोषणा कर दी।

8. जीवन में धर्म क्या है, धर्माचार्य भगवान कृष्ण ने इसका प्रमाण देने की घोषणा कर दी।

9. श्रेय पथ पथिक का कर थामने की घोषणा कर दी।

10. देवत्व विजय करवाने को भगवान ने अब शंख बजा ही दिया।

11. साधुता के संरक्षण की घोषणा कर दी।

अर्जुन की युद्ध घोषणा :

दैवी गुण सम्पन्न अर्जुन ने अपना शंख बजाया।

1. नित्य क्षमा करने वाले ने युद्ध की घोषणा कर दी।

2. निष्कपट गण ने युद्ध की घोषणा कर दी।

3. निर्वैर, रण क्षेत्र में उतर आये और युद्ध की घोषणा कर दी।

4. श्रेष्ठ गण जो सदा झुकते रहे, उन्होंने युद्ध की घोषणा कर दी।

5. विशाल मनी ने युद्ध की घोषणा कर दी।

6. बलवान्, जो निर्बल वत् वर्तते रहे, वा बल ने दुर्योधन को पुकार लिया।

7. हंस कर दु:ख सहने वाले ने दु:ख की निवृत्ति के लिये युद्ध की घोषणा कर दी।

8. देवता गण ने मानो असुरों को युद्ध के लिये ललकारा।

साधक का दृष्टिकोण :

1. साधक गण की आन्तरिक समस्या भी यही है।

2. साधक गण की बाह्य समस्या भी यही है।

3. भगवान स्वयं कर थाम कर युद्ध करने को कह रहे हैं।

4. असुर और दुष्ट सहयोगी गणों को मार देना उचित ही है।

5. अत्याचारी के अत्याचार का सामना करना चाहिये, चाहे अपनी चाहना कोई न हो।

कृष्ण अर्जुन के सारथी बने :

श्याम ने कहा, ‘‘हम लड़ेंगे नहीं, हम अस्त्र शस्त्र नहीं उठायेंगे’’ यानि, लड़ना साधक को ही होगा, भगवान केवल नीति बतायेंगे। भगवान केवल पथ ही सुझायेंगे। जीवन के संग्राम में लड़ना तथा जीतना साधक को ही है। ज्ञान तो भगवान देंगे किन्तु हिम्मत तथा बाहुबल साधक को अपना लगाना होगा। कार्य सिद्धि का सेहरा साधक को ही मिलेगा। वीरता, धैर्य, दक्षता के साथ कार्य तो साधक ने स्वयं ही करने हैं।

भगवान कृष्ण की अलौकिकता :

मेरी नन्हीं आभा! कृष्ण अर्जुन संयोग अलौकिक ही है।

1. कृष्ण का रणभूमि में अस्त्र शस्त्र रहित जाना अलौकिक ही है।

2. कृष्ण का न लड़ने का प्रण भी तो अलौकिक ही है।

3. कृष्ण का अर्जुन का सारथी बनना भी तो अलौकिक ही है।

4. वीर, निर्भय तथा अति बलवान पांडु पुत्रों का दुर्योधन से पाँच गाँव पर ही सन्धि का प्रस्ताव भेजना भी तो अलौकिक ही है।

5. देवता गण और असुरों में इस प्रकार का युद्ध भी तो अलौकिक ही है।

6. दैवी गुण पूर्ण लोगों का युद्ध करना भी तो अलौकिक ही है।

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