Chapter 1 Shloka 47

संजय उवाच

एवमुक्त्वार्जुन: संख्ये रथोपस्थ उपाविशत्।

विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानस:।।४७।।

Sanjay says to King Dhritrashtra:

Having said this, Arjuna, overwhelmed with grief,

cast away his bow and arrows in that field of battle

and retired to the back of his chariot.


Chapter 1 Shloka 47

संजय उवाच

एवमुक्त्वार्जुन: संख्ये रथोपस्थ उपाविशत्।

विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानस:।।४७।।

Sanjay says to King Dhritrashtra:

Having said this, Arjuna, overwhelmed with grief, cast away his bow and arrows in that field of battle and retired to the back of his chariot.

Look little one! Having expounded his justification, Arjuna has relinquished his bow and arrows.

1. He has refused to fight this war.

2. He is so stricken with grief that he has become confused.

3. Moha has turned him into a coward.

4. Devoid of knowledge, he has been overcome by ignorance.

Little one! If you analyse (or study closely or really think about it) you will realise that he has broken all his ties with justice and embraced injustice instead.

a) It is not only sinful to aid and abet the unjust, but to watch silently as injustice is being done is also sinful.

b) When one is personally beset by problems, one fights for release from those difficulties; when another is enmeshed in difficulties, it is a sin not to do one’s all to save him.

c) To watch an oppressor tyrannise others and yet to remain silent is a sin.

Arjuna was a great fighter. He had defeated countless warriors in the battlefield. Why did he falter? Why was he confused and why did he capitulate to cowardice?

If he did not consider it a sin to kill other sinners in the past, why did he consider it a sin to kill the Kauravas?

The present problem

Little one, this is how people react in life:

1. It is easy to set another’s home afire but difficult to set fire to one’s own home;

2. It is simple to denounce another as a thief but difficult to accuse one’s own relations;

3. To destroy another’s family is comparatively easy but to place the mirror of Truth before one’s own family is extremely difficult;

4. How easy it is to sully the honour of the other; to do the same with one’s own near and dear ones is well nigh impossible.

The Bhagavad Gita holds the remedy for this terrible disease wrought by Kaliyuga.

Those who stood opposite Arjuna, prepared for battle, were his own Grandsire, his uncles, his in-laws, his sons and grandsons, his brothers-in-law and several other near and dear relations. It was difficult to even consider killing them in battle. Even if one’s own people are oppressors and perpetrators of atrocities, it is difficult to oppose them. How could he widow the women of his own clan? It would have been different if they were strangers. Therefore Arjuna says to the Lord, ‘Even if these people are wicked sinners, it would be a sin to kill them!’

1. Arjuna’s entire conversation with Lord Krishna in this chapter, is based on his moha.

2. Overcome by moha, a warrior of his calibre and strength became ready to flee the field of battle!

3. He was impervious even to the consideration of his own defame in fleeing the battlefield.

4. He even forgot his basic essence and his Kshatriya nature!

In today’s world are we, too, not guilty of:

a) maintaining silence even when we see our family doing injustice to others? Yet we seek to eradicate injustice from the world!

b) keeping quiet and not raising our voice against evil conduct in our own homes? Yet we make efforts to obliterate evil from the world!

c) not raising our voice against our own near and dear ones, nor making any effort to fight their atrocities?

The thieves, oppressors, black marketeers of this world are all related to one or another of us. The evil wrongdoers and traitors of the world also belong to our families. Those who sell themselves for petty gains and leave the course of justice, they too, are people like us. If you are a lover of justice, raise your voice against your own people first. This is the dharma and foremost duty of a sadhak. In this lies the redemption of the honour of the family. This is the way to uphold one’s familial traditions and values.

In actual fact, the venerated ones of the family are those who:

a) protect the great traditions of the family;

b) establish divinity in the family;

c) give proof of that divinity in their personal lives.

Arjuna said, “If we kill our kith and kin, our familial dharma will be destroyed.” If one considers this carefully, one will realise that the family’s honourable traditions will be destroyed if demoniacal attributes and tendencies gain supremacy. If those who possess divine attributes rule the kingdom, dharma can never decline; in fact it will be firmly established.

Now understand another fact. It is not necessary that Truth cannot be established without a bloody war! In today’s world, one can seek the assistance of the government and the judiciary to establish justice. An individual can also resort to several other methods and non-injurious means to establish dharma in his own family and in society.

अध्याय १

संजय उवाच

एवमुक्त्वार्जुन: संख्ये रथोपस्थ उपाविशत्।

विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानस:।।४७।।

संजय कह रहे हैं धृतराष्ट्र से, कि हे राजन्!

शब्दार्थ :

१.  इस प्रकार कह कर,

२.  शोक से उद्विग्न हुए मन वाला अर्जुन,

३.  रण भूमि में, बाण सहित धनुष को त्याग कर,

४.  रथ के पिछले भाग में बैठ गया।

तत्व विस्तार :

देख नन्हीं जान्! यह सब ज्ञान भगवान कृष्ण को देने के पश्चात् अर्जुन ने बाण और धनुष दोनों को छोड़ दिया।

अर्थात् :

क) रण में लड़ने से इन्कार कर दिया।

ख) इतना शोक ग्रसित हो गया कि वह घबरा गया।

ग) मोह ने उसे भीरु बना दिया।

घ) ज्ञान ने भी उसका साथ छोड़ दिया और लुप्त हो गया। ज्ञान की जगह पर अज्ञान ने अर्जुन को घेर लिया।

गर ध्यान से देखें तो समझ आ सकता है कि उसने न्याय से नाता तोड़ कर अन्याय से नाता जोड़ दिया।

देख नन्हीं!

1.  केवल अन्यायी का साथ देना ही पाप नहीं, अन्याय को देख कर चुप रहना भी पाप है।

2.  जब अपने सिर पर कष्ट आ पड़े तब तो सब ही लड़ते हैं, जब दूसरे पर मुसीबत आन पड़े, उसे न बचाना भी पाप है।

3.  किसी अत्याचारी को लोगों पर अत्याचार करते देख कर ख़ामोश रहना पाप है।

अर्जुन महा शूरवीर तथा निर्भय योद्धा थे। अनेकों बाहुबली योद्धाओं को रण में हरा चुके थे।

अब सोचना यह है कि इस युद्ध में वह:

क) संकोच पूर्ण क्यों हो गये?

ख) घबरा क्यों गये?

ग) कायरता पूर्ण क्यों हो गये?

यदि औरों को मारना पाप नहीं समझते थे तो कौरव कुल को मारना क्यों पाप समझने लगे?

पापियों के साथ तो वह नित्य युद्ध करते आये थे। पापियों का तो वह नित्य हनन करते आये थे।

आधुनिक समस्या :

नन्हीं! जीवन में भी लोग यही करते हैं।

क) औरों के घर जला देने आसान हैं, अपने घर को आग लगानी मुश्किल है।

ख) औरों को चोर कहना आसान है, अपने घर वालों को चोर कहना मुश्किल है।

ग) औरों के कुल तबाह कर देना आसान है, अपने कुल को सत् दर्शन कराना मुश्किल है।

घ) औरों के कुल की लाज हर लेना आसान है, अपने कुल की लाज हर लेना मुश्किल है।

कलियुग के परिणाम रूप आजकल के इस भयंकर रोग का इलाज गीता में निहित है।

अर्जुन के सम्मुख जो लोग युद्ध करने के लिये खड़े थे, वह उसके :

1.  दादा तथा दादा तुल्य लोग थे,

2.  ताऊ तथा चाचा तुल्य लोग थे,

3.  मामा गण तथा मामा तुल्य लोग थे,

4.  ससुर समान लोग थे,

5.  पुत्रों के समान लोग थे,

6.  पौत्रों के समान लोग थे,

7.  सालों के समान लोग थे,

अन्य भी सभी सम्बन्धी लोग थे। इन सब को मार देना बहुत कठिन है। सब उनके निजी रिश्ते नाते थे।

अपने लोग चाहे अत्याचारी ही हों, उनसे भिड़ जाना कठिन है। अपने सम्पूर्ण रिश्तेदारों से कौन लड़ाई ले? उन्हें कौन मारे? अपने सम्पूर्ण रिश्तेदारों की पत्नियों को विधवा कौन बनाये? हाँ! गर यह पराये लोग होते तो बात और थी। भगवान को मानो अर्जुन यही कह रहे हैं कि ‘चाहे ये लोग दुष्ट तथा पापी ही हैं, इन्हें मारना हमारे लिये पाप है।’

1.  इस अध्याय में अर्जुन ने जितनी बातें भगवान से कहीं, उनका आधार कुल से मोह था।

2.  एक महाबली तथा युद्ध प्रवीण योद्धा इस मोह के कारण रण से भागने को तैयार हो गये।

3.  उन्हें अपनी बदनामी का भी ध्यान न आया।

4.  उन्हें अपना स्वरूप तथा क्षत्रिय स्वभाव भी भूल गया।

आज दुनिया में भी हम लोग अपने ही घर में :

क) जो लोग बेईमानी करते हैं, उन्हें कुछ न कह कर जनता में बेईमानी से लड़ना चाहते हैं।

ख) जो लोग दुराचारी होते हैं, उन्हें कुछ न कुछ कह कर, जनता में दुराचार मिटाने के यत्न करते हैं।

ग) अपने घर वालों के विरुद्ध आवाज़ नहीं उठाते।

घ) अपने घर वालों के ज़ुल्मों के विरुद्ध नहीं लड़ते।

जो लोग चोरी करते हैं, जो लोगों को तंग करते हैं, जो धन दबाये बैठे हैं, जो अन्न दबाये बैठे हैं, वे हम में से ही किसी के नाते रिश्ते हैं।

दुष्ट, दुराचारी, अत्याचारी, देश द्रोही, देश के गद्दार भी तो हम लोगों के नाते रिश्तेदारों में से ही हैं। जो थोड़े से धन के कारण बिक जाते हैं तथा न्याय छोड़ देते हैं, वे भी हमारे ही नातों में से हैं। वे भी हम जैसे ही तो हैं। गर आवाज़ उठानी है तो पहले अपने ही घर में उठाईये। साधक का धर्म भी यह ही है, साधक का सर्व प्रथम कर्तव्य भी तो यह है। वास्तव में कुल की लाज भी इसी में निहित है, कुल का धर्म भी इसी में निहित है, पितृ धर्म भी इसी में निहित है। वास्तव में कुल की मर्यादा भी इसी में है।

गर समझ सको तो समझ लो कि साधक की साधना भी इसी में है। वास्तव में कुल श्रेष्ठ वही होते हैं, जो :

1.  कुल की श्रेष्ठता का संरक्षण करते हैं।

2.  कुल में देवत्व स्थापित करते हैं।

3.  कुल में देवत्व का प्रमाण देते हैं।

अर्जुन ने कहा कि ‘इन अपने कुल वाले नाते बन्धुओं को यदि हम मार देंगे तो हमारा पितृ धर्म नष्ट हो जायेगा।’

ध्यान से देखो! यदि असुरत्व बढ़ गया तो पितृ धर्म नष्ट हो ही जायेगा। यदि दैवी गुण सम्पन्न देवत्व भाव वाले राज्य करेंगे तो धर्म का पतन नहीं होगा, बल्कि वह स्थापित हो जायेगा।

अब एक बात और समझ ले। यह ज़रूरी नहीं कि युद्ध किये बिना घर में सत्त्व नहीं लाया जा सकता।

आजकल के ज़माने में सरकार तथा न्याय की सहायता मिल सकती है। फिर जब सरकार तथा न्याय की सहायता से लोग डरते भी हैं, अपने ही घर तथा कुल में धर्म स्थापित करने के लिये जीव अनेकों अहिंसक मार्गों तथा नीतियों को अपना सकता है।

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे

श्रीकृष्णार्जुनसंवादे अर्जुन विषादयोगो

नाम प्रथमोऽध्याय:।।१।।

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