Chapter 1 Shloka 15

पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनंजय:।

पौण्ड्रं दध्मौ महाशंखं भीमकर्मा वृकोदर:।।१५।।

Sanjay describes to Dhritrashtra:

Hrishikesh – Lord Krishna, blew the Panchjanya conch;

Dhananjaya – Arjuna blew his conch – Devdatta;

Bhima the performer of formidable deeds,

blew the great conch Poundra.

Chapter 1 Shloka 15

पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनंजय:।

पौण्ड्रं दध्मौ महाशंखं भीमकर्मा वृकोदर:।।१५।।

Sanjay describes to Dhritrashtra:

Hrishikesh – Lord Krishna, blew the Panchjanya conch; Dhananjaya – Arjuna blew his conch – Devdatta; Bhima the performer of formidable deeds, blew the great conch Poundra.

Little Abha, first let us understand the meaning of Hrishikesh’ – an epithet of the Lord, then we will be able to understand the significance of the Panchjanya conch.

Hrishikesh (हृषीकेश) = Hrishik + Ish

Hrishik:

a) The organs of sense perception:

­­–   Ears that hear sounds,

­­–   Eyes that perceive forms,

­­–   The nose that smells odour,

­­–   The skin that perceives through touch,

­­–   The tongue that tastes.

b) The pleasure one gets through those organs;

c) To be filled with joy, happiness and bliss.

Ish means:

a) the ruler,

b) endowed with power,

c) the giver of power and strength,

d) the Supreme Lord of prowess,

e) the Master who commands, who controls all.

Thus Hrishikesh would mean:

1. One who has control over the organs of sense perception.

2. The Lord of the organs of perception.

3. The Master of knowledge who is knowledge Itself.

4. The paragon of joy and bliss.

5. Happiness Itself.

6. One who sees, smells, hears, feels and tastes only the Truth; who receives only the Truth through touch, taste etc.

That omniscient Lord Krishna blew the conch. on Arjuna’s behalf, who was in control of these five organs of perception since birth. Any sound that emanates from Lord Krishna’s conch is the declaration of One who epitomises knowledge and wisdom itself.

There is a prevalent story concerning the Panchjanya conch. It was extracted from the stomach of a demon of the sea – Panchjanya, who was killed by Lord Krishna. Little one! This story is significant as the sense organs stay within the ocean of the mind. When the ocean of the mind begins to dry up, when the attachment of the senses is quelled, the demon of material attachment dies a natural death. It is then that a Hrishikesh’ or one who has control over the senses, can emerge; it is then that knowledge supported by love is born. Every declaration by such a Hrishikesh will be a declaration of Truth.

Arjuna’s conch was called ‘Devdatta

Devdatta’ means:

a) a gift from the gods.

b) the bequest of one with divine powers.

Dhananjaya or Arjuna blew this conch.

Dhananjaya’ means:

1. One who has conquered wealth.

2. One who possesses all kinds of wealth – namely, the wealth of knowledge, tapas, divine qualities, recognition and fame.

3. Arjuna, replete with divine qualities, was called by this name.

Vrikodara’ or Bhima, was known for his phenomenal strength. He  who had performed frightful deeds and even drank the blood of his enemies, was called ‘Vrikodara’ or one with a wolf’s stomach – who ate everything.

Bhima blew his conch, the ‘Poundra’ which emitted a fearful and deafening sound.

Just try to understand this combination, little one!

When the Intellect blows the conch of the Epitome of Knowledge – Lord Krishna, then the mind sounds the conch of Arjuna – the embodiment of divine qualities and the body resounds with the conch of Bhima, indicative of deeds of great prowess and strength.

It is with this combination that a seeker’s spiritual endeavour finds completion. For success, the following are essential ingredients:

a) an impartial intellect,

b) the treasury of divine qualities,

c) supporting deeds performed with shrewdness and strength.

With a combination of all these, sadhana can be successfully accomplished.

 

अध्याय

पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनंजय:।

पौण्ड्रं दध्मौ महाशंखं भीमकर्मा वृकोदर:।।१५।।

संजय कह रहे हैं धृतराष्ट्र से :

शब्दार्थ :

१. पाञ्चजन्य शंख को हृषीकेश ने बजाया,

२. देवदत्त नामक शंख को अर्जुन ने बजाया

३. और पौण्ड्र महाशंख को, भयंकर कर्म करने वाले भीमसेन ने बजाया।

तत्व विस्तार :

नन्हीं आभा! प्रथम, भगवान के नाम हृषीकेश का अर्थ समझ ले, तब पाञ्चजन्य शंख भी समझ आ जायेगा।

हृषीकेश = हृषीक + ईश

हृषीक का अर्थ है : ज्ञानेन्द्रियाँ।

1. कान जो शब्द सुनते हैं।

2. आँख जो रूप देखती है।

3. नाक जो गन्ध सूंघती है।

4. त्वचा जो स्पर्श से ज्ञान पाती है।

5. जिह्वा जो रसना से ज्ञान पाती है।

6. हमें इन्द्रियों राही जो सुख मिलता है।

7. आनन्द भर जाने को भी हृषीक कहते हैं।

8. उस प्रसन्नता को हृषीक कहते हैं।

ईश का अर्थ है शासन करने वाला, शक्ति-सम्पन्न, शक्ति-प्रद, शक्ति-पति, ऐश्वर्य-युक्त, समर्थवान, आदेश देने वाला स्वामी जिसके अधिकार में सब हो, उसको ईश कहते हैं।

गर अब हृषीकेशका अर्थ करें तो इसे यूँ कहेंगे कि :

1. ज्ञानेन्द्रियाँ जिसके वश में हों, वह हृषीकेश हैं।

2. जो ज्ञानेन्द्रियों का पति हो, उसे हृषीकेश कहते हैं।

3. क्यों न कहें कि ज्ञान के पति को हृषीकेश कहते हैं।

4. आनन्दघन को हृषीकेश कहते हैं।

5. ज्ञानघन को हृषीकेश कहते हैं।

जो सत् सुने, जो सत् देखे, जो सत् गन्ध जाने, जो स्पर्श राही भी सत् जाने, जो रसना राही भी सत् जाने उसे हृषीकेश कहते हैं।

ऐसे सर्वज्ञ ज्ञानघन कृष्ण ने अर्जुन के लिये शंख बजाया जो इन पाँच ज्ञानेन्द्रियों पर विजय पाकर जन्मा था।

कृष्ण के शंख की ध्वनि जो भी होगी, वह ज्ञानघन की ही घोषणा होगी।

वैसे नन्हीं! एक कहानी भी पांचजन्य शंख के साथ कही जाती है। समुद्र में पांचजन्य नामक एक दैत्य रहता था, उसे भी कृष्ण ने मारा और उसके पेट से यह शंख निकला।

यानि मनोसागर में इन्द्रियाँ रहती हैं। जब मनोसागर शुष्क हो जाता है, जब इन्द्रिय संग छूट जाता है, मनो विषय आसक्ति रूपा दैत्य की मृत्यु हो जाती है तब हृषीकेश तत्व का जन्म होता है, या कह लो ज्ञान प्रेम घनता का जन्म होता है। तत्पश्चात् हृषीकेश जो भी जहाँ घोषणा करे, वह सत् ही होती है।

अर्जुन के शंख का नाम देवदत्त = देव + दत्त

देवका अर्थ है :

क) देवता गण।

ख) पूज्य गण।

ग) सुर गण।

दत्तका अर्थ :

क) दिया हुआ।

ख) भेंट किया हुआ।

ग) दूसरे के अधिकार में किया हुआ।

घ) यानि, देवताओं की देन।

देवत्व शक्ति पूर्ण जीव का शंख अर्जुन ने बजाया। अर्जुन को यहाँ धनंजय नाम से पुकारा है।

1. धनंजय, यानि धन को जीतने वाला।

2. सम्पूर्ण धन विजेता, जैसे कि ज्ञान धन, तपो धन, दैवी सम्पदा का धन तथा मान भी धन ही है।

अर्जुन दैवी सम्पदा सम्पन्न होने के नाते धनंजय कहलाते थे।

भीम : भीम कर्मा वृकोदर:भीमसेन के लिये कहा है।

भीमकर्माको पहले समझ। इसका अर्थ है :

भयानक कर्म, भीषण कर्म, तड़पा देने वाले कर्म, भयभीत करने वाले कर्म, महा बलपूर्ण कर्म करने वाला।

वृकोदर: = वृक्+उदर; यानि,

क) भेड़िये जैसे पेट वाला,

ख) जो सब कुछ खा जाये,

इसी ने दुश्मन का खून पिया था।

भीम ने पौण्ड्र नामक महा उच्च तथा भयानक आवाज़ वाला शंख बजाया।

नन्हीं इसे यूँ समझ! जब बुद्धि ने ज्ञानघन श्याम का शंख बजाया तब मन ने दैवी सम्पदा सम्पन्न अर्जुन का शंख बजाया और तन ने महा बलवान कर्म रूप भीम का शंख बजाया, तब ही साधक की साधना सफ़ल हो सकती है। यानि, निरपेक्ष बुद्धि भी हो, दैवी सम्पदा भी हो, साथ कर्म शीलता भी हो, दक्ष तथा बल युक्त कर्म भी हों, तब ही साधना सफ़ल हो सकती है।

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