Chapter 1 Shloka 12

तस्य संजनयन्हर्षं कुरुवृद्ध: पितामह:।

सिंहनादं विनद्योच्चै: शंखं दध्मौ प्रतापवान्।।१२।।

The Revered Grandsire of the Kauravas, Bhishma Pitamah,

blew his conch with a formidable sound

like the roar of a lion,

delighting Duryodhana’s heart.

Chapter 1 Shloka 12

तस्य संजनयन्हर्षं कुरुवृद्ध: पितामह:।

सिंहनादं विनद्योच्चै: शंखं दध्मौ प्रतापवान्।।१२।।

The Revered Grandsire of the Kauravas, Bhishma Pitamah, blew his conch with a formidable sound like the roar of a lion, delighting Duryodhana’s heart.

Bhishma blew his conch with a reverberating roar:

a) to abolish Duryodhana’s distress;

b) to fill Duryodhana’s heart with courage;

c) to make Duryodhana joyous and to reassure him, Bhishma declared war.

Why do great souls thus ‘sell’ themselves?

Why did Bhishma support Duryodhana?

We, too, sell our loyalties in a similar manner.

1. Because we have enjoyed someone’s hospitality, we support our hosts.

2. We support the wrong even when we are afraid of worldly disapproval.

3. Promises previously given prevent us from withdrawing support to the wrongdoers.

4. It is inconvenient to change our stand, so we side the wrong.

5. One’s reluctance to break a long-standing relationship makes one support the false.

6. A false sense of duty sometimes persuades one to take a wrong stand.

7. Due to one’s strong likes, dislikes and attachments one supports the immoral and incurs sin.

8. It becomes difficult to forsake the evil one has supported all one’s life.

Thus Bhishma Pitamah resorted to erroneous reasoning and supported the unjust:

a) forsaking even Krishna;

b) deserting Dharmaraj (the sovereign of justice i.e. Yudhishtir);

c) thus he renounced the support of Truth and joined hands with the evil doers;

d) he defended deceit and fraud in his defence of the greedy and arrogant Duryodhana;

e) he deserted the path of dharma and took the path of injustice.

Reasons for forsaking justice

1. We are afraid of aggressive people.

2. We are afraid of our own sins and the exposure of our own weaknesses.

3. We are afraid of any harm to ourselves.

4. We are afraid of death.

5. We are afraid of taking on any trouble.

Thus a person gives excuses in order to prove himself blameless. He justifies his intentions as pure. He takes the support of illusory arguments to prove himself to be just and fair. He leans on a false sense of duty and fallacious principles or on a misplaced sense of loyalty. Thus he treads the path of his ‘likes’ rather than the course of righteousness.


Little one, you must understand that one’s duty is not towards mankind but towards the Lord. Similarly, our love too must flow towards the Lord.

Those who love the Lord:

a) will necessarily love the Lord’s attributes;

b) will seek to imbibe those qualities;

c) will disseminate mercy and compassion even as they seek it from the Lord;

d) will eradicate enmity, greed and desire from their hearts;

e) will pray for the strength to be humble but will not expect humility or subjugation from the other;

f)  will be forgiving.

Such people love the Truth and their every endeavour is directed towards their duty to that Truth. They love the qualities of sincerity, compassion, renunciation, detachment, selfless endeavour, forgiveness and justice and recognise their duty towards these divine traits.

Try to understand this again: the duty of a seeker does not lie with other human beings but towards upholding the very concept and practice of duty. If one views duty in relationship to other human beings, one gets enmeshed in considerations of one’s relationship with them, of their importance or insignificance, whether they are good or bad.

He who loves justice, is loyal to justice even if he annoys his near and dear ones in the process. He pays no heed to any loss to himself personally – he continues to serve the cause of justice. If his close relations are unjust to anyone, that lover of justice and Truth will always side the aggrieved party, even at the risk of upsetting his own kith and kin and having to bear their abuses. Such an elevated sadhak and the devotee who is established in the Supreme, endures smilingly the ensuing inevitable rush of temper. They tolerate everything silently, because their intrinsic love for compassion, forgiveness and other divine qualities transcends all. These attributes become such an inherent ingredient of their nature, that they pay no heed to any injustice or injury done to them personally. Their compassion and forgiveness encompasses even their detractors.

Bhishma Pitamah knew only too well where justice and Truth lay; even so he supported Duryodhana, the unjust one. This was his blunder.

The view point of a sadhak

The sadhak should understand Dhritrashtra to represent the blind intellect and Bhishma Pitamah, the epitome of illusory justifications – which one indulges in to absolve oneself from not supporting the right and the just. Duryodhana is the mind, immured in the darkness of tamas, wherein only likes and dislikes predominate. Dronacharya is the attached mind which is easily aroused by past enmities and which utilises knowledge wrongly for the fulfilment of its own desires and greed.

The duty of a sadhak

The sadhak must:

a) Increase his love for the Lord and imbibe divine qualities.

b) Prove the efficacy of these qualities in daily life.

c) Fulfil his duties whilst practising these qualities.

d) Give proof of the renunciation of greed and desires in his everyday dealings.

e) Practice forgiveness towards those who deceive and cheat him.

f)  Practice tolerance of insult or indignity and yet embrace that very critic with love.

g) Desist from dissociating himself from what he does not like, but try to understand and accept it.

h) Be loyal to the Lord and His qualities and not to individuals.

This is love for the Truth. This is the method to follow the Truth. This is the essence of tapas. This is the foundation of yagya in action. This is homage to the Lord.


अध्याय १

तस्य संजनयन्हर्षं कुरुवृद्ध: पितामह:।

सिंहनादं विनद्योच्चै: शंखं दध्मौ प्रतापवान्।।१२।।

शब्दार्थ :

१.  दुर्योधन के मन में हर्ष उत्पन्न करते हुए

२.  कुरुवृद्ध प्रतापी भीष्म पितामह ने

३.  सिंह के गर्जन के समान शंख बजाया।


तत्व विस्तार :

अति उच्च गर्जन करके भीष्म पितामह ने प्रतापी शंख बजाया।

1. दुर्योधन का शोक मिटाने के लिये,

2. दुर्योधन को उत्साहित करने के लिये,

3. दुर्योधन को मुदित करने के लिये,

4. दुर्योंधन का धैर्य बढ़ाने के लिये युद्ध घोषित कर दिया।

श्रेष्ठ जीव बिकते क्यों हैं?

भीष्म पितामह ने दुर्योधन का साथ क्यों दिया?

ऐसे ही हम सब बिकते हैं :

1. अन्न खाया है, इसलिये अन्नदाता का समर्थन करते हैं।

2. लोक लाज है, इसलिये ग़लती करने वाले का भी समर्थन करते हैं।

3. प्राण प्रतिज्ञा कर चुके हैं, इसलिये अनुचित का समर्थन करते हैं।

4. स्थान परिवर्तन कौन करें, तकलीफ़ होती है, इस कारण अनुचित का समर्थन करते हैं।

5. दीर्घकाल स्थिर नाता कैसे छोड़ दें? इस कारण अनुचित का समर्थन करते हैं।

6. मिथ्या कर्तव्य परायणता के कारण भी अनुचित का समर्थन करते हैं।

7. मोहित मति के कारण अनुचित का समर्थन करके पाप के भागी बन जाते हैं।

8. जीवन भर पाप का साथ दिया, अब कैसे छोड़ें?

भीष्म पितामह ने मिथ्या सिद्धान्तों का आसरा लेकर अन्यायी का समर्थन करते हुए:

– कृष्ण को भी छोड़ दिया।

– धर्मराज को भी छोड़ दिया।

– सत् सहयोग को भी छोड़ दिया

– मिथ्याचारियों का साथ दिया।

– छल कपट के सहयोगी हो गये।

– इस कारण भीष्म पितामह ने लोभी और घमण्डी दुर्योधन का साथ दिया।

– धर्म के पथ को छोड़ कर अधर्म के पथ को अपना लिया।

न्याय त्याग के कारण :

बात असल में यह है, कि हम

क) क्रोधी से डरते हैं।

ख) दम्भी से डरते हैं।

ग) अपने ही पापों से भी डरते हैं।

घ) अपने ही भेद खुलने से यानि अपनी ही त्रुटि की अनावृति से डरते हैं।

ङ) अपनी किसी भी हानि से डरते हैं।

च) अपनी मौत से भी डरते हैं।

छ) अपने आपको कष्ट देने से डरते हैं।

1. जीव बहाने लगा कर अपने आपको दोष विमुक्त कर लेता है।

2. मन ही मन में अपनी भावना को शुद्ध कहता है।

3. सत्य पर नहीं बल्कि कल्पना पर आधारित तर्क वितर्क करके अपने आपको न्याय मूर्ति ठहराने के यत्न करता है।

4. कभी मिथ्या कर्तव्य का आसरा लेता है।

5. कभी मिथ्या सिद्धान्तों का आसरा लेता है।

6. कभी वफ़ा की बात करने लग जाता है।

यह सब करके हम केवल अपना रुचिकर पथ अपनाना चाहते हैं।

साधना :

नन्हीं! एक बात समझ ले :

कर्तव्य इन्सान के प्रति नहीं, भगवान के प्रति होता है। प्रेम इन्सान के प्रति नहीं, भगवान के प्रति होता है। जो जीव भगवान से प्रेम करते हैं,

क) वे भगवान के गुणों से प्रेम करते हैं।

ख) वे दैवी गुणों से प्रेम करते हैं।

ग) वे परम गुण के याचक हैं।

घ) वे भगवान से दया या करुणा की भिक्षा जब माँगते हैं तो स्वयं ये गुण अपने में लाना चाहते हैं।

ङ) वे अपने मन से वैर भाव मिटा देना चाहते हैं।

च) वे अपने मन से लोभ तृष्णा मिटा देना चाहते हैं।

छ) वे स्वयं झुकने के सामर्थ्य की याचना करते हैं।

ज) किसी दूसरे को झुकाना नहीं चाहते, दूसरे को तो वे क्षमा कर देते हैं।

या यूँ समझो ऐसे जीव का प्रेम :

1. सत्य से होता है और उसका हर कर्तव्य सत्य के प्रति होता है।

2. वफ़ा से होता है और उसका हर कर्तव्य वफ़ा के प्रति होता है।

3. करुणा से होता है और उसका हर कर्तव्य करुणा के प्रति होता है।

4. वैराग्य से होता है और उसका हर कर्तव्य वैराग्य के प्रति होता है।

5. त्याग से होता है और उसका हर कर्तव्य त्याग के प्रति होता है।

6. संन्यास से होता है और उसका हर कर्तव्य संन्यास के प्रति होता है।

7. यज्ञमय जीवन से होता है और उसका हर कर्तव्य यज्ञमय जीवन के प्रति होता है।

8. क्षमा से होता है और उसका हर कर्तव्य क्षमा के प्रति होता है।

9. न्याय से है, इसलिये उसकी वफ़ा न्याय से है।

इसे यूँ समझने की कोशिश करो कि साधक का कर्तव्य इन्सान के प्रति नहीं, कर्तव्य के प्रति होता है। इन्सानों में नाते रिश्ते, न्यून या श्रेष्ठ, बड़े या छोटे, बुरे या अच्छे का भेद भाव होता है।

न्याय से प्रेम करने वाले की वफ़ा न्याय से होती है। न्याय से प्रेम करने वाले की लग्न न्याय से होती है, चाहे लोग उससे रूठ जायें, चाहे अपने नाते रूठ जायें, चाहे उसका अपना नुकसान हो जाये, वह सत्प्रिय न्याय को नहीं छोड़ता। वह न्याय करने वाले का और न्याय चाहने वाले का साथ देता है। मानो उसे न्याय रूपा शक्ति ने बांधा हुआ है।

यदि उसके अपने प्रियगण या नाते रिश्तेदार भी किसी से अन्याय करें तो वह सत्य तथा न्याय प्रेमी होने के कारण, जिससे अन्याय हुआ है, उसके साथ हो जाता है। इससे हो सकता है कि उसके अपने घर वाले या नाते बन्धु उससे नाराज़ हो जायें तो भी वह न्याय का ही साथ देता है। तब घरवालों को तो क्रोध आयेगा ही। वह बुरा भला कहेंगे ही। उच्च स्थिति स्थित साधक और परम में स्थित गण तथा भागवत् प्रेमी गण इस क्रोध की बौछार को मुसकरा कर सहते हैं और मौन रहते हैं क्योंकि उन्हें करुणा, क्षमा और अन्य दैवी गुणों से प्रेम है। वह गुण उनके सहज गुण होते हैं।

इस कारण वे अपने पर किये हुए प्रहार पर, अन्याय पर, क्रोध पर, ध्यान नहीं देते।

अन्यायी के प्रति उनका करुणा और क्षमा भाव ही होता है। किन्तु जिस पर अन्याय हुआ हो, उसकी वे मदद करते हैं और वे उसका साथ देते हैं। भीष्म पितामह सत् को और न्याय को जानते थे। फिर भी उन्होंने दुर्योधन का और अन्याय का साथ दिया, यही उनकी भूल थी।

साधक का दृष्टिकोण :

धृतराष्ट्र को अन्धी बुद्धि समझना चाहिये। जो मिथ्या सिद्धान्तों का आसरा लेकर न्याय को छोड़ देती है और अपनी मान्यता से संग करती है, उस भावना को भीष्म पितामह समझना चाहिये। दुर्योधन को रुचि प्रधान तामसिक मन समझना चाहिये।

द्रोणाचार्य को संग पूर्ण मन जानो, जो पुराने वैर भाव से उत्तेजित होता है और अपने लोभ तथा कामना के कारण ज्ञान का भी दुरुपयोग करता है।

साधक का कर्तव्य :

साधक को चाहिये कि :

1. परम के गुणों से प्रीत बढ़ाये।

2. परम के गुणों का जीवन में अभ्यास करे।

3. दैवीगुणों का जीवन में अभ्यास करते हुए वह देवत्व सिद्ध करे।

4. कर्तव्य कर्म करता हुआ वह इन गुणों का अभ्यास करे।

5. लोभ चाहना के त्याग का सहज तथा सरल जीवन में प्रमाण दे।

6. सहज जीवन में जो उसके साथ छल कपट करे, उसे क्षमा करने का अभ्यास करे।

7. अपमान सहने का अभ्यास करे। जो अपमान करे, उससे भी प्रेम करे।

8. अरुचिकर का त्याग नहीं करे, उसे समझने का यत्न करे।

9. उसकी वफ़ा जीव के गुण या नाते से नहीं बल्कि परम के गुणों से होनी चाहिये।

यही सत् से प्रेम है, यही सत् का अनुसरण है, यही वास्तविक तप है, यही यज्ञ की नींव है, यही वास्तविक पूजा है।


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