Chapter 1 Shloka 30

गाण्डीवं स्रंसते हस्तात् त्वक् चैव परिदह्यते।

न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मन:।।३०।।

Now Arjuna said to Lord Krishna:

The Gandiva is dropping from my hands,

my skin is burning, my mind is whirling,

and I can stand no longer.

Chapter 1 Shloka 30

गाण्डीवं स्रंसते हस्तात् त्वक् चैव परिदह्यते।

न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मन:।। ३०।।

Now Arjuna said to Lord Krishna:

The Gandiva is dropping from my hands, my skin is burning, my mind is whirling, and I can stand no longer.

Little one, such a plight occurs when one has to oppose one’s near and dear ones to whom one is attached.

1. It is difficult to break a relationship where one is very attached.

2. It is difficult to harm those whom one has considered and respected as great.

3. It is very difficult to ignore one’s deep rooted concepts.

4. It is difficult to wage a war against one’s own Guru or Preceptor.

5. It is very difficult for one who is a benign model of learning, practised in life, to go towards his swaroop, transcending all such attributes.

6. How can one fling away the ideals and basic principles that one has been upholding all one’s life? Those decisions which one takes after considered thought are difficult to put aside.

7. A sadhak does not find it easy to relinquish a certain mode of behaviour that has earned him goodwill.

8. It is difficult to change one’s basic trend of mental thought, intellectual or natural attributes.

9. To renounce one’s mode of interacting which has earned one the epithet of a sadhu or dharmatma is not easy, especially when one believes that mode to be correct and true.

One’s mind is naturally disturbed when faced with such a situation. This is the mistake a sadhak generally makes.

The difficulties of a sadhak

a) A sadhak imbued with divine attributes becomes attached to the luminescence of Truth.

b) He becomes attached to his own qualities and therefore fears to take the next step to a higher state.

c) The ‘I’ still exists and the thought ‘I am this or that’ is prevalent.

d) He is attached to knowledge, to his virtuous nature and saintly demeanour. He therefore retains no friendship with the wicked and debased.

e) He watches his every step since he is afraid of defame; this too is a kind of ignorance – a form of moha.

Such considerations weaken a sadhak’s resolve and prove to be a formidable obstacle on the spiritual path. Arjuna was in a similar predicament. Faced with this great trial, he became disturbed; the Gandiva slipped from his hands and he succumbed to his anguish like a coward.


Sanyas does not indicate any withdrawal from the situation. Sanyas indicates self-forgetfulness. Such an individual is awake to the world and ever asleep or silent towards himself. Little one! The Form and Essence – roop and swaroop of sanyas, love, detachment, compassion, wisdom and the absence of the idea ‘I am the body’, are very different from each other. The swaroop is one’s internal state. The external manifestation, the roop, is different.

The roop of one who is established in the swaroop

One who abides in the Supreme Essence can never have any fixed mode of action or behaviour. His every act will depend on the requirement or mental state of any person or situation that comes before him at that given time. His complete indifference towards himself will be evident in his every word, deed and interaction. It is a state which others find very difficult to understand. In order to reach it, the sadhak has to practice the inculcation of divine qualities in his life. Little one, in order to establish oneself in the swaroop, self-forgetfulness is imperative. The method lies in the practice of yagya, tapas and daan, that is in selfless giving, emotional forbearance and generosity.

अध्याय १

गाण्डीवं स्रंसते हस्तात् त्वक् चैव परिदह्यते।

न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मन:।।३०।।

फिर अर्जुन कहने लगे श्री कृष्ण से :

शब्दार्थ :

१. मेरे हाथ से गाण्डीव धनुष गिर रहा है

२. और त्वचा भी बहुत जलती है,

३. मेरा मन भ्रमित सा हो रहा है (इसलिये मैं),

४. खड़ा रहने में भी असमर्थ हूँ।

तत्व विस्तार :

देख नन्हीं! जहाँ संग हो, वहीं पर प्रहार करना पड़े तब यह ही हालत होती है क्योंकि:

क) जहाँ संग हो, वहाँ नाता तोड़ना बहुत कठिन है।

ख) जिन्हें सदा श्रेष्ठ कहते आये हो, उन्हें मारना बहुत कठिन है।

ग) अपनी मान्यता को छोड़ देना बहुत कठिन है।

घ) भावना के बन्धन को तोड़ देना बहुत कठिन है।

ङ) जिन्हें गुरु मान चुके हो, उनसे युद्ध करना बहुत कठिन है।

च) सौम्य ज्ञान रूप धरने के पश्चात् स्वरूप की ओर जाना बहुत मुश्किल है।

छ) जीवन के जो आदर्श बनाये हों, उन्हें इन्सान कैसे छोड़ दे?

ज) जीवन के मूल सिद्धान्तों को जीव कैसे छोड़ दे?

झ) विशिष्ट विचार पूर्ण जो निर्णय जीव ने जीवन में लिये होते हैं, उन्हें त्याग देना कठिन है।

ञ) जीवन में सद्भावना पूर्ण व्यवहार रूप स्वभाव को साधक नहीं छोड़ सकता।

ट) मानसिक मनोबहाव और स्वभाव बदल देना बहुत कठिन होता है।

ठ) बुद्धि की विचार धारा की मुहार को बदल देना बहुत कठिन होता है।

ड) जिस व्यवहार को नित सत् पूर्ण तथा उचित कहते आये हो, उसे छोड़ देना बहुत कठिन है।

ढ) जिस व्यवहार राही हम साधु, श्रेष्ठ और धर्मात्मा कहलाते आये हों, उसे छोड़ देना कठिन है।

जब हम किसी ऐसी परिस्थिति में फंस जाते हैं, तब मन घबरा जाता है। साधक गण भी यही भूल कर बैठते हैं।

साधक की कठिनाईयाँ :

क) दैवी सम्पद् सम्पन्न साधक को सत् तथा प्रकाश से संग हो जाता है।

ख) दैवी सम्पद् सम्पन्न साधक को अपने ही गुणों से संग हो जाता है।

ग) इस कारण वह इससे अगली स्थिति पर कदम धरते डरता है।

घ) अभी ‘मैं’ बाकी है, और ‘मैं यह हूँ’या ‘मैं वह हूँ’ यह वह मानता है।

ङ) ज्ञान से भी उसे संग होता है।

च) साधु स्वभाव और साधु रूप से भी उसे संग होता है।

छ) बुरों या असुरों के साथ वह मैत्री नहीं रखता।

ज) कलंक न लग जाये कहीं, इस कारण वह बच बच कर चलता है। यह भी एक प्रकार का मोह है। यह भी एक प्रकार का अज्ञान ही है।

यह भी जीव को निर्बल बनाता है और राहों में विघ्न बन जाता है। अर्जुन का भी यही हाल हुआ। जब इतना बड़ा इम्तहान सामने आया तब वह घबरा गये, हाथों से गाण्डीव छूट गया और वह भीरु के समान शोक युक्त तथा व्याकुल हो गये।

संन्यास :

संन्यास का अर्थ परिस्थिति से दूर हो जाना नहीं। संन्यास का अर्थ अपनी विस्मृति है। जब जीव औरों के लिये तो जागता है, अपने प्रति नित्य सोया रहता है, अपने प्रति नित्य मौन रहता है।

नन्हीं जान्! संन्यास का, प्रेम का, उदासीनता का, करुणा का, तनत्व भाव त्याग का, ज्ञान का भी रूप और है, स्वरूप और है। स्वरूप अपनी निजी आन्तरिक स्थिति है। रूप और स्वरूप भिन्न भिन्न हैं।

स्वरूप स्थित का रूप :

स्वरूप स्थित का बाह्य रूप निश्चित नहीं होता क्योंकि उसका रूप तो :

1. उसके सामने जो भी आ जाये, उस पर आधारित होता है।

2. उसके सामने जो भी आ जाये उसकी मानसिक स्थिति पर आधारित होता है।

3. उसके सामने जैसी भी परिस्थिति आये, उस पर आधारित होता है।

4. उसके सामने जैसा भी काज आ जाये, रूप तो उस पर आधारित होता है।

5. उसके हर वाक् में, हर काज में, हर व्यवहार में, हर इन्द्रिय स्पर्शन् में उसकी अपने प्रति निहित उदासीनता की झलक मिलती है।

इस तत्व को समझ लेना दूसरों के लिये अतीव कठिन है। किन्तु इस स्थिति पर पहुँचने से पहले जीव देवत्व अभ्यास करता है। नन्हीं! स्वरूप को पाने के लिये अपने को भुलाना ही होता है और अपने को भुलाने के लिये, सत्य में बैठ कर यज्ञ, तप और दान में सिद्धि प्राप्त करनी अनिवार्य है तथा दैवी सम्पदा को उपार्जित करना भी ज़रूरी है।

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