Chapter 11 Shlokas 32, 33

श्री भगवानुवाच

कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्त:।

ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिता: प्रत्यनीकेषु योधा:।।३२।।

तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून्भुंक्ष्व राज्यं समृद्धम्।

मयैवैते निहता: पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्।।३३।।

Bhagwan says, O Arjuna!

I am the impending death, which annihilates these planes of existence, and I am here with the purpose of destroying these worlds. These courageous warriors, who stand in the opposing army, will not exist even without you. Therefore rise and attain glory. Conquer your foes and enjoy this abundant kingdom. These warriors already lie slain by Me. O Savyasaachin Arjuna, be thou merely an instrument.

Chapter 11 Shlokas 32, 33

श्री भगवानुवाच

कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्त:।

ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिता: प्रत्यनीकेषु योधा:।।३२।।

तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून्भुंक्ष्व राज्यं समृद्धम्।

मयैवैते निहता: पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्।।३३।।

Bhagwan says, O Arjuna!

I am the impending death, which annihilates these planes of existence, and I am here with the purpose of destroying these worlds. These courageous warriors, who stand in the opposing army, will not exist even without you. Therefore rise and attain glory. Conquer your foes and enjoy this abundant kingdom. These warriors already lie slain by Me. O Savyasaachin Arjuna, be thou merely an instrument.

a) The Lord is speaking here of fate and destiny.

b) He is speaking of the inevitable.

c) He has already spoken of swabhav or one’s innate nature.

d) He has also explained about the attraction and repulsion of qualities or gunas.

e) He has explained the interaction of gunas.

f) He has also stated that:

­­–  It is He who fills attributes in all.

­­–  He is the protector of all.

­­–  He is also the destroyer of all.

­­–  He is the creator, the sustainer and the annihilator.

­­–  It is He who nourishes and rears all.

Now the Lord says:

1. He is impending death.

2. The last moments of these warriors are at hand.

3. They must die.

4. ‘Arjuna, rise and be instrumental in their extinction.’

Remember that the Lord first stated that nobody kills nor can kill anyone, nor can anyone get anyone else killed. The Lord advises Arjuna, ‘Be Thou an instrument; for I have already killed these warriors.

1. Thereafter, you shall attain renown.

2. You shall receive joy.

3. You shall enjoy a prosperous kingdom.’

The Lord is saying all this from Arjuna’s point of view. Even otherwise, this had to happen. When the death of the opposing army was pre-destined, then the victory of the Pandavas was indeed pre-ordained.

Arjuna had become extremely afraid of battle. There were several reasons for his fear – but one reason was the preponderating doubt as to whether he would win or lose. At this juncture, it was important for the Lord to describe the inevitable fruits of victory in order to impel Arjuna towards this battle. Faith in the inevitability of this fruit of victory was attracting Arjuna to fight. Knowing of the interaction of qualities, the Lord was using the factor of victory to inspire Arjuna to fight.

Little one, the Lord says:

1. He is the death of this entire creation.

2. He is the cause of the final dissolution.

3. His purpose is the annihilation of these worlds.

Little one, saying this, the Lord is explaining:

a) “I am death.

b) It is I who have wrought this terrible war.

c) So do not associate Me merely with benevolent attributes, for I am also the fearsome form of this creation.

d) I am the sorrow and pain of people; their terrible death and torment.

e) All this springs forth from Me and it is I who am according them all these different types of death.

Therefore fight!”

The Jiva – an instrument

The Lord says:

1. ‘The death of these people is inevitable and your victory is also assured.

2. You are merely an instrument in the death of these warriors.

3. Only in name are you the agent of their destruction – you cannot kill them of your own accord.

4. Yet, die they must – that too, at your hands.

It is given in your destiny that they shall be killed by your hand, but you have no connection with this killing. You are merely a tool. One could say, you are the previously appointed cause of their death.’

अध्याय ११

श्री भगवानुवाच

कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्त:।

ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिता: प्रत्यनीकेषु योधा:।।३२।।

तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून्भुंक्ष्व राज्यं समृद्धम्।

मयैवैते निहता: पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्।।३३।।

भगवान कहते हैं, अर्जुन सुन!

शब्दार्थ :

१. मैं लोकों को क्षय करने वाला,

२. बढ़ा हुआ काल हूँ,

३. यहाँ लोकों का संहार करने के लिये प्रवृत्त हुआ हूँ।

४. जो वीर गण प्रतिपक्षी सेना में स्थित हैं,

५. वे तेरे बिना भी नहीं रहेंगे।

६. इसलिये तू खड़ा हो,

७. यश को प्राप्त कर,

८. शत्रुओं को जीत कर समृद्ध राज्य को भोग।

९. ये सब तो मेरे द्वारा पहले ही मारे जा चुके हैं,

१०. हे सव्य साचिन्! तू (केवल) निमित्त मात्र ही हो जा।

तत्त्व विस्तार :

भगवान यहाँ :

क) विधान की बात कहते हैं।

ख) रेखा की बात कहते हैं।

ग) अवश्यम्भावी की बात कहते हैं।

घ) पहले वह स्वभाव की बात कह आये हैं।

ङ) गुण आकर्षण की बात कह आये हैं।

च) गुण प्रतिकर्षण की बात भी कह आये हैं।

छ) गुण गुणों में वर्तने की बात भी कह आये हैं।

फिर यह भी कह आये हैं कि :

ज) सब में गुण भी वही भरते हैं।

झ) संरक्षक भी वही आप हैं।

ञ) संहारक भी वही आप हैं।

ट) उत्पत्ति, स्थिति, लय कारण भी वह आप हैं।

ठ) भरण और पोषण कर्ता वह आप हैं।

इस समय कह रहे हैं कि :

1. महाकाल वह आप हैं।

2. इन वीरों की मृत्यु बेला आ चुकी है।

3. इन्हें तो मरना ही है।

4. अर्जुन! तू उठ और निमित्त बन कर इन्हें मार दे।

याद रहे, भगवान पहले कह आये हैं कि न कोई किसी को मार सकता है, न कोई किसी को मारता है, न कोई किसी को मरवा सकता है।

इस समय अर्जुन से कहते हैं कि तू निमित्त मात्र बन। बाकी तो मैं इन्हें मार ही चुका हूँ।

तत्पश्चात् :

1. तुझे यश मिलेगा।

2. तुझे सुख मिलेगा।

3. तू समृद्ध राज्य भोगेगा।

ये सब उन्होंने अर्जुन के दृष्टिकोण से कहा है। वैसे यह तो होना ही था। जब प्रतिपक्षी गणों की मृत्यु लिखी ही हुई थी तो यह भी निश्चित ही होगा कि विजय पाण्डवों की होगी।

अर्जुन तो रण से भयभीत हुआ था, इसके कारण अनेकों थे। एक कारण यह भी था कि न जाने वे जीतेंगे या हारेंगे! इस अवस्था में अर्जुन को उत्तेजित करने के लिये भगवान का विजय रूपा फल का वर्णन करना ज़रूरी था। विजय रूप फल पर विश्वास का गुण अर्जुन को युद्ध करने के लिये आकर्षित कर रहा था। गुण गुणों में वर्तते हैं, इस कारण भगवान विजय रूपा गुण बता कर अर्जुन को युद्ध करने के लिए उत्तेजित कर रहे थे।

नन्हीं! भगवान कहते हैं कि :

1. वही सम्पूर्ण संसार की मृत्यु भी हैं।

2. वही सम्पूर्ण संसार का लय भी हैं।

3. ‘यहाँ पर मैं लोकों के संहार के लिए ही प्रवृत्त हुआ हूँ।’

नन्हीं! यह कह कर भगवान समझा रहे हैं कि :

क) मृत्यु भी मैं ही हूँ।

ख) यह भयानक युद्ध भी मैंने ही रचा है।

ग) केवल सौम्यता ही मुझ पर आरोपित न कर, विकराल रूप भी मैं ही हूँ।

घ) लोगों के दु:ख दर्द, भीषण मृत्यु, संताप इत्यादि भी मैं ही हूँ।

ङ) यह सब भी मुझी से होता है और मैं ही इन सब को यहाँ विभिन्न प्रकार की मृत्यु दे रहा हूँ।

इसलिये तू युद्ध कर!

निमित्त मात्र जीव:

भगवान कहते हैं :

– इन लोगों की मृत्यु निश्चित है और तुम्हारी विजय भी निश्चित है।

– तुम तो केवल इन लोगों की मृत्यु का निमित्त मात्र हो।

– यानि तुम तो उनकी मृत्यु के नाम मात्र कर्ता हो, तुम स्वेच्छा से इन्हें नहीं मार सकते।

– इन्हें तो मरना ही है, केवल तुम्हारे हाथों से मारे जाना है।

तुम्हारी रेखा में दिया हुआ है कि इन्होंने तेरे तन राही मारा जाना है, किन्तु इसमें तुम्हारा इनको मारने से कोई सम्बन्ध नहीं है। तुम तो केवल एक निमित्त मात्र हो। यूँ कह लो कि तुम इन लोगों की मृत्यु का एक पूर्व नियोजित कारण हो।

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