Chapter 11 Shloka 24

नभ:स्पृशं दीप्तमनेकवर्णं व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम्।

दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो।।२४।।

Witnessing Your form touching the heavens,

effulgent and multicoloured,

mouth wide open and with large flaming eyes,

I am stricken with fear within;

I have lost my fortitude and become devoid of peace.

Chapter 11 Shloka 24

नभ:स्पृशं दीप्तमनेकवर्णं व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम्।

दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो।।२४।।

O omnipresent Lord!

Witnessing Your form touching the heavens, effulgent and multicoloured, mouth wide open and with large flaming eyes, I am stricken with fear within; I have lost my fortitude and become devoid of peace.

Arjuna’s reaction to the Lord’s terrifying Cosmic Form

O Lord!

a) Upon witnessing Your terrible form;

b) Upon witnessing Your form as the final death-giver and destroyer of the world;

c) Upon witnessing Your immense form;

d) Having perceived Your fearful visage, with frightful open mouths, I am terrified.

­­–  My peace is shattered.

­­–  My serenity has vanished.

­­–  My fortitude is broken.

Pay attention to these words!

It is strange that although the Supreme Purusha – foremost among all men, Himself stands before Arjuna, revealing His divine form and essential being, yet, Arjuna is becoming even more fearful and disturbed. He is losing his fortitude and endurance. Why did this happen?

The reason for Arjuna’s reaction

1. The attainment of the supreme state was not Arjuna’s basic aim.

2. His basic problem was not the discernment between Truth and non-Truth.

3. Arjuna did not seek the Supreme.

4. Nor was he a traveller on the path that led to the Supreme.

5. Arjuna did not desire knowledge.

6. He merely sought to know what constituted the right action and what would be considered as wrong in the present situation of war that confronted him.

7. Confused as to where his duty lay, he had sought the refuge of the Lord.

Then why was the Lord bestowing upon Arjuna the benediction of a glimpse of His divine form?

1. The Lord bestowed such grace upon Arjuna in order to emancipate him from his moha.

2. He conferred knowledge upon him in order to remind him of his essential nature.

3. The Lord was supporting him as his charioteer in order to secure his victory.

4. The Lord thus fulfilled his obligation as a friend.

5. The Lord was merely acting in accordance with His nature, which is to bestow His all-embracing love upon His devotees.

6. He was thus drawing Arjuna’s mind in a different direction.

7. He was liberating Arjuna from the fetters of sin and virtue.

8. He was endeavouring to engage Arjuna in the terrible war that loomed ahead.

9. He wished to revive Arjuna’s basic warrior-like nature.

10. He wished to rid him of the two conflicting thoughts ‘I shall kill or be killed’.

11. He sought to lift Arjuna from the fear that accompanied the thought of defeat versus victory.

12. In other words He is saying, “Everything is pre-destined; all is indeed Vaasudeva – the Lord Himself. Why do you fear?”

13. He is trying to comfort him, “All is the Atma – why do you worry?”

14. “Everything transpires automatically: qualities interact with other qualities – why should you worry?”

15. “Understand the Essential Being of Brahm. He too, takes birth for the establishment of dharma. You too, must fight this war for the restoration of dharma.”

16. “The Lord’s life is an unbroken string of actions performed as an egoless offering in the spirit of yagya. You too, must do the same.”

The Lord is explaining the practical aspect of the knowledge that Arjuna already possessed. He seems to be saying:

a) Translate your knowledge into the science of practice.

b) Convert knowledge into life.

c) You should engage in this war as a duty – it is but right for you to do so.

d) This is also the path of the one who aspires for the Supreme.

e) Whatever one’s situation in life, one must colour it with the practice of that Supreme Knowledge.

Arjuna was so frightened after seeing the awesome cosmic form of the Lord, that, instead of being enraptured by it, he lost his fortitude and peace of mind. He was not able to surrender himself to the Lord standing before him. He could not forget his own individuality and hence could not immerse himself in the totality of the Lord’s cosmic form.

अध्याय ११

नभ:स्पृशं दीप्तमनेकवर्णं व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम्।

दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो।।२४।।

हे सर्वव्यापी विष्णु स्वरूप भगवान!

शब्दार्थ :

१. आकाश से स्पर्श करते हुए,

२. प्रकाशमान, अनेक रंगों वाले,

३. खुले हुए मुखों वाले

४. और चमकते हुए विशाल नेत्रों वाले आपके इस रूप को देख कर,

५. भयभीत हुए अन्त:करण वाला मैं,

६. धीरज और शान्ति को नहीं पाता हूँ।

तत्त्व विस्तार :

विकराल रूप के प्रति अर्जुन की प्रतिक्रिया

‘हे भगवान!

1. तेरा विकराल रूप देख कर,

2. तेरा महाकाल रूप देख कर,

3. तेरा विशाल रूप देख कर,

4. तेरा भयंकर रूप देख कर, महा भयंकर खुले हुए मुख को देख कर मैं घबरा गया हूँ।

क) मेरी शान्ति भंग हुई जाती है।

ख) मेरा चैन चला जा रहा है।

ग) मेरा धीरज टूटा जा रहा है।’

इन वाक्यों पर ध्यान धर कर समझ!

अजीब बात है! परम पुरुष पुरुषोत्तम स्वयं सम्मुख खड़े होकर रूप सहित अपना स्वरूप दर्शा रहे हैं और अर्जुन अशान्त और भयभीत हुआ जा रहा है, अर्जुन का धीरज छूटा जा रहा है। यह क्यों हुआ?

अर्जुन की प्रतिक्रिया का कारण :

1. अर्जुन की निहित माँग ब्राह्मी स्थिति नहीं थी।

2. अर्जुन की समस्या सत् असत् विवेक नहीं थी।

3. अर्जुन परम अभिलाषी नहीं थे।

4. अर्जुन परम पथ अनुयायी भी नहीं थे।

5. अर्जुन ज्ञान भी नहीं चाहते थे।

6. वह तो केवल युद्ध रूपा आधुनिक परिस्थिति में उचित अनुचित जानना चाहते थे।

7. वह तो ‘किंकर्त्तव्य विमूढ़’ हुए भगवान की शरण में आये थे।

फिर भगवान, अर्जुन को विराट रूप के दर्शन क्यों दे रहे हैं?

भगवान तो केवल :

1. मोह निवृत्ति अर्थ उसे ज्ञान दे रहे हैं।

2. स्वभाव स्मृति अर्थ उसे ज्ञान दे रहे हैं।

3. सारथी रूप में युद्ध विजय अर्थ उसका साथ दे रहे हैं।

4. साख्य भाव निभाने के लिये उसका साथ दे रहे हैं।

5. अपने भक्त वत्सल स्वभाव के अनुकूल ये सब कह रहे हैं।

6. अर्जुन के मन को दूसरी ओर आकर्षित कर रहे हैं।

7. अर्जुन को पाप पुण्य से उठा रहे हैं।

8. अर्जुन को महा भयंकर युद्ध में नियोजित कर रहे हैं।

9. उसका क्षत्रिय भाव पुन: उसमें जगाना चाह रहे हैं।

10. ‘मैं मरूँगा या मैं मारूँगा’, इन दोनों भावों के अभाव की चेष्टा कर रहे हैं।

11. विजय पराजय रूपा भय युक्त भावों से उठा रहे हैं।

12. ‘पूर्ण निश्चित है, पूर्ण वासुदेव ही है, तू घबराता क्यों हैं’, ऐसा कह रहे हैं।

13. ‘पूर्ण आत्मा ही है, तू घबराता क्यों हैं’, ऐसा समझा रहे हैं।

14. ‘सब स्वत: गुण गुणों में वर्त रहे हैं, तू घबराता क्यों है’, ऐसा समझा रहे हैं।

15. ‘ब्रह्म का स्वरूप समझ, वह भी धर्म संस्थापन अर्थ जन्म लेते हैं, तू भी धर्म संस्थापन अर्थ यह युद्ध कर।’

16. भगवान का जीवन अहंकार रहित अखण्ड यज्ञ है, तू भी अपना जीवन अहंकार रहित अखण्ड यज्ञ बना ले।

अर्जुन के पास जो ज्ञान पहले ही था, भगवान उसे उसी का विज्ञान रूप बता रहे हैं।

मानो कह रहे हैं,

क) अपने ज्ञान को विज्ञान में परिणित कर।

ख) अपने ज्ञान को जीवन में परिणित कर।

ग) तुझे कर्तव्य रूप युद्ध करना ही चाहिये, तुम्हारे लिये यही उचित है।

घ) परम पथिक का पथ भी यही है।

ड) इस ज्ञान को जीवन में उतारना ही पड़ेगा।

च) जैसी भी अपनी परिस्थिति है, उसी में इस परम ज्ञान का अभ्यास कर।

परन्तु अर्जुन विराट रूप देख कर गद्गद् होने की जगह धृतिहीन, भयभीत तथा अशान्त हो गया। वह अपने आपको भगवान में न खो सका। वह अपनी व्यक्तिगतता को न भूल सका। वह यह नहीं भूला कि भगवान उसके सामने खड़े हैं, परन्तु वह अपने आपको उनमें विलीन न कर सका, अपने आपको भगवान की पूर्णता में समाहित न कर सका, इस कारण घबरा गया।

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