Chapter 11 Shloka 25

दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि।

दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास।।२५।।

Upon seeing Your jaws with their fearful teeth and Your

myriad mouths flaming like the fires of final dissolution,

my head is reeling. I cannot perceive any direction,

nor find any happiness. Therefore, O Lord of all Gods

in whom the universe abides, be kindly disposed.

Chapter 11 Shloka 25

दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि।

दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास।।२५।।

Haltingly Arjuna said:

Upon seeing Your jaws with their fearful teeth and Your myriad mouths flaming like the fires of final dissolution, my head is reeling. I cannot perceive any direction, nor find any happiness. Therefore, O Lord of all Gods in whom the universe abides, be kindly disposed.

Arjuna’s reaction at the sight of the Lord’s fear-inspiring Cosmic Form:

Arjuna says, “Lord! I am terrified at perceiving Your fear-inspiring form. My head reels. Pray reappear before me in Your gentle aspect once more.”

a) Renounce this form of Yours and don once more, your gentle form.

b) I am afraid when I see Your fearsome demeanour.

c) I feel as if You are extremely angry with me.

d) O Lord of all deities, O refuge of the Universe, be Thou kindly disposed.

1. I am thoroughly distressed upon witnessing this aspect of Yours.

2. I have lost my peace of mind.

3. I have become unconscious of everything.

4. I cannot understand anything.

So perturbed am I that I cannot even discern the direction I must take. Which is the north? Where is the east?

O Merciful One, be Thou happy and, shedding this frightening aspect, assume once more Your benevolent form.

Little one, the mind does become perturbed upon seeing the terrifying form of the Supreme. It was but natural for Arjuna to be thus disturbed at this frightening aspect of his usually benevolent and gracious friend.

The difference between the knowledge and the living experience of the Lord’s fearsome aspect

Little one, the Lord had earlier described His cosmic form to Arjuna. Then why was Arjuna now frightened upon witnessing that same form?


If a dear friend of yours told you of his temper whilst speaking to you confidentially and confessed that when he was overcome by anger, he became very ferocious and terrifying, you will appreciate and admire him for his truthful disclosure. Yet, if one day you were to be the focus of his anger and you were to experience his rage first hand, you would forget your appreciation of him and you would be thoroughly discomfited by his behaviour!

Little one, this was Arjuna’s state and this is what happens to the spiritual aspirant and others as well.

The reaction of people towards the fearsome aspect of the Lord

This, in fact, is the biggest hurdle in the path of spiritual seekers.

1. They are extremely happy at hearing and imbibing knowledge.

2. They are filled with joy at listening to descriptions of the essential Being of man.

3. They are overjoyed at hearing about love.

4. They listen to what interests them and act in accordance with their likes.

5. Even the service of the Guru depends on the Guru being favourable to them.


a) If they are told something that goes against their concepts, they become agitated.

b) If someone opposes them, they are greatly angered.

c) If someone tells them that what they know is not in compliance with the Truth because their life is not in consonance with their knowledge, they will not even wish to look at that person again.

If general comments are made that their life does not match their knowledge of Truth, they might accept it smilingly. However, if one begins to point out their lacunae in particular incidents or situations in their personal life, they become very agitated.

Little one, the sadhak’s spiritual endeavour does not merely consist of mental games. If this same knowledge is not proved in his daily living, he cannot be called an aspirant of Truth.

If the one who instructs you in spiritual knowledge puts on a fearsome form, you are likely to forget that it is your Guru who stands before you, and you may even begin to insult and ridicule him.

The sadhak is agitated when he meets with such opposition and is confronted by this fearsome exterior. Everyone likes a gentle person. Who can tolerate someone fearsome and demonic? So Arjuna’s fear was but natural.

The Atmavaan who endures this terrifying aspect of the Lord

The one who can smilingly embrace this fearsome form of the Lord will in fact be no less than Him. He, who lovingly accepts a person who embodies such fearsome attributes, is no less than the Lord Himself. It is only a person with tremendous faith and immense knowledge who can tolerate such hostile negativity with ease in his daily life.

Arjuna too, became agitated upon experiencing the apparently terrifying form of his bosom friend, who had now taken on the role of his charioteer. In his agitation he even began to repeat himself.

अध्याय ११

दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि।

दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास।।२५।।

अर्जुन डरता हुआ बोला :

शब्दार्थ :

१. आपके विकराल, दांतों के जबड़ों वाले

२. और प्रलय काल में अग्नि के सामान,

३. प्रज्वलित मुखों को देख कर,

४. मुझे चक्कर आते हैं, यानि दिशायें नहीं सूझतीं,

५. और (मैं) सुख को भी नहीं पाता हूँ।

६. इसलिये हे देवों के ईश्वर! हे जगत के निवास!

७. आप प्रसन्न होंवें।

तत्व विस्तार :

विकराल रूप देख कर अर्जुन की प्रतिक्रिया :

अर्जुन कहते हैं, ‘भगवान! मैं तुम्हारे विकराल रूप को देख कर घबरा गया हूँ और चकरा गया हूँ। अब सौम्य रूप तुम धर लो श्याम!’


क) ‘इस रूप को अब तुम छोड़ कर पुन: अपना सौम्य रूप धर लो।

ख) तुम्हारा भयंकर रूप देख कर मुझे तुमसे डर लगता है।

ग) मुझे ऐसे लगता है कि तुम बहुत नाराज़ हो।

घ) हे देवों के देव, हे जगत के निवास स्थान, अब आप प्रसन्न होंवें।

तुम्हारा ऐसा रूप देख कर :

1. मैं तो विभ्रान्त हो गया हूँ।

2. मैं तो अपना चैन गंवा बैठा हूँ।

3. मैं तो अचेत हो गया हूँ।

4. मुझे कुछ सूझता ही नहीं है।

तुम्हारा यह रूप देख कर मुझे ऐसा चक्कर आ रहा है कि अब मुझे दिशाओं का भी अन्दाज़ नहीं रहा। उत्तर किस ओर है और पूर्व किस ओर है, यह भी नहीं सूझ रहा।

हे दयानिधि! आप प्रसन्न हों और इस विकराल रूप को हटा कर सौम्य रूप धर लीजिये।’

नन्हीं! विकराल रूप देख कर मन घबरा ही जाता है। फिर अपने सौम्य तथा नित्य अनुकूल सखा को ऐसे भयंकर रूप में देख कर घबरा जाना तो सहज ही बात है।

विकराल रूप का ज्ञान और जीवन में भेद

नन्हीं! बातों में तो भगवान अपना विराट स्वरूप बता ही आये थे। फिर यह रूप देखकर अर्जुन घबरा क्यों गया?

केवल ज्ञान की बातें सुनने से जीव घबराता नहीं है।

दृष्टांत :

यदि कोई आपका अतीव प्रिय आपसे प्रेम की बातें करते करते आपको अपने ही क्रोध की बातें भी कहे और कहे कि ‘मैं अतीव क्रोधी भी हूँ और जब मुझे क्रोध आता है तो मैं बहुत भयानक रूप धर लेता हूँ’, तब आप उसकी बातें सुन कर उसे ही श्रेष्ठ कहते हो। तब मन स्वत: यह सोचता है कि यह कितना अच्छा है, इसने अपने क्रोध की बात भी सच सच कह दी, इसने अपने लोभ की बात भी सच सच कह दी; किन्तु जब वह महाक्रोधी का रूप धारण करके आप पर ही क्रोध करने लगे, तब उसका अच्छापन भूल जाता है। तब आप भी भड़क जायेंगे और घबरा जायेंगे।

नन्हीं! यही अर्जुन से भी हुआ और यही साधकों तथा अन्य लोगों के साथ भी होता है।

विकराल रूप दर्शन की आम लोगों में प्रतिक्रिया :

साधक गण की साधना की राहों में सबसे बड़ा विघ्न भी यही है।

1. वे ज्ञान तो सुन सकते हैं और ज्ञान सुन कर बहुत खुश होते हैं।

2. वे स्वरूप की बातें सुनते हैं और सुन कर बहुत खुश होते हैं।

3. वे प्रेम की बातें सुनते हैं और सुन कर बहुत खुश होते हैं।

4. वे रुचिकर बातें सुनते हैं और अपनी रुचि के अनुसार काज करते हैं।

5. गुरु सेवा भी गुरु अनुकूलता के कारण करते हैं।

किन्तु नन्हीं! यदि कोई :

क) उन्हें उन्हीं की मान्यता के विरुद्ध बात बताये, तो वे भड़क जाते हैं।

ख) उन्हीं के विरुद्ध बात कहे, तो वे भड़क जाते हैं।

ग) उन्हें यह कहे कि तुम्हारा ज्ञान सत्य नहीं क्योंकि तुम्हारा जीवन उस ज्ञान के अनुकूल नहीं, तो वे आपको देखना पसन्द नहीं करेंगे।

बातों में कह भी दो कि ज्ञान अनुकूल जीवन नहीं है, उसको तो मुसकरा कर मान भी लेंगे, किन्तु यदि आप उनको उनके निजी जीवन की सहज बातों में टोकना शुरू कर दें, तो वे तड़प जायेंगे।

नन्हीं! साधक की साधना केवल मानसिक खिलवाड़ नहीं है। यदि आपके सहज जीवन में यही ज्ञान पूर्ण रूप से प्रमाणित नहीं होता तो आप सत्त्व अभिलाषी नहीं।

यदि आपके सम्मुख, आपको ज्ञान बताने वाला भयानक रूप धर ले तो आप यह भी भूल जायेंगे कि आप अपने गुरु से बात कर रहे हो और शायद उसे मूर्ख भी कहना आरम्भ कर दें।

साधक गण तथा शिष्य गण भी ऐसी विपरीतता को विकराल रूप समझ कर घबरा जाते हैं।

नन्हीं! सौम्य रूप तो आप पसन्द करते हैं, भयंकर राक्षसी रूप को कौन सह सकता है? सो अर्जुन की घबराहट सच्ची थी।

विकराल रूप सहने वाला आत्मवान् :

जो भगवान के विकराल रूप को मुसकरा कर सह ले, वह भगवान से कम नहीं होगा। नन्हीं! जो कालिमा को व्यक्तिगत जीवन में सप्राण रूप में अंगीकार कर ले, वह भगवान से कम नहीं होगा। जीवन में सहज लोगों से विकरालता को सह लेना महा भक्तिपूर्ण ज्ञानवान् का चिह्न है।

अर्जुन भी अपने नित्य सखा तथा सारथी रूप सहयोगी के विकराल रूप से घबरा गया और घबराहट के कारण अपनी बातें भी दोहराने लगा।

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