Chapter 5 Shloka 29

भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्।

सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति।।२९।।

Knowing Me to be the Partaker

of all Yagyas and austerities,

the Supreme Lord of all the world

and the Friend of all beings,

My devotee attains peace.

Chapter 5 Shloka 29

भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्।

सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति।।२९।।

Knowing Me to be the Partaker of all Yagyas and austerities, the Supreme Lord of all the world and the Friend of all beings, My devotee attains peace.

The Lord says, “He who knows Me as the Partaker of all Yagyas and Tapas (austerity)”:

Little one!

1. It is extremely difficult to conduct oneself in the spirit of Yagya in this world.

2. It is extremely difficult to sacrifice oneself.

3. It is extremely difficult to forget oneself in the fulfilment of the other’s desired goal.

4. It is extremely difficult to do the trivial little jobs of others at the cost of one’s whole future.

5. Similarly, to help another get started in life, ignoring one’s own home and hearth is very difficult.

6. To put aside one’s own plans of life to fulfil those of another, is a difficult task.

The practice of tapas, too, is not easy:

a) To be able to forfeit your reputation,

b) to disregard esteem,

c) to serve the very one who has slandered you,

d) to turn away from what you like,

e) to embrace that which is not likeable,

f) to act against your beliefs,

g) to withstand the opposition of your mind,

h) to forget oneself and give happiness to the other,

– all this is extremely difficult.

Progressing further one realises that:

1. To fulfil the tasks of others and then give them the credit for that task fulfilled is even more difficult.

2. To bear insults from the very person whom one is endeavouring to establish, is well nigh impossible to endure.

3. To destroy oneself in the effort to establish another is indeed an arduous path.

4. To continue to do good to another despite the other’s insults, is not at all easy.

5. To support those base souls who criticise and slander, is indeed difficult.

6. To give judgement against oneself when justice has to be done, is most difficult.

Here the Lord says that:

a) His devotees offer their all, knowing that the Lord is the Partaker of all acts of yagya.

b) They smilingly bear all the sorrows of the world, knowing the Lord to be the Receiver of all acts of Tapas, or austerity.

c) They worshipfully receive all the hardships and negativity of the world as the Lord’s endowment to them, knowing Him to be the Lord of the whole Universe.

d) They know That Lord to be the Friend of all and, lost in the ecstasy of His love, His devotees endure all adversity.

e) They attain peace in the knowledge that this entire Creation and all beings in it are wrought by Him and are dependent on Him.

In saying all this, the Lord implies that:

1. if the aspirant has confidence in the Lord;

2. if the aspirant loves the Lord;

3. if he takes refuge in Him and His eternal qualities;

4. if he has deep faith in the Lord;

– he will speedily attain peace.

Such a one performs yagya in the Lord’s Name and receives yagyashesh – the divine remnants of yagya. Thus successful in relinquishing the fruits of action, and becoming indifferent to the world, he receives the prasaad, the sanctified offering, of Supreme Compassion. You could say the individual attains satiation, while performing acts of yagya and tapas for His Lord. He also receives the prasaad of divine qualities, which bestow eternal joy and everlasting peace. All this the individual does naturally, in his love for the Lord.

Little one, if you, too, regard the Lord as the Overlord of this entire creation,

1. you will serve all as the Lord’s own people;

2. you will regard the whole world as the Atma embodied;

3. all you do will not be for the other, but for the Atma – for your Beloved Lord – for your own Self.

If you perform yagya with this attitude, then you are not doing a favour to anybody. Such an attitude will establish you in Yoga.

He who considers the Supreme Lord to be Suhrid (सुहृद), knows Him to be:

a) the Friend of all beings;

b) the sole Refuge of all;

c) the sole Well-wisher and Benefactor of all;

d) the One who belongs to all.

He who worships That Self of all through gyan and tapas, he becomes an Atmavaan. He, who knows That One in Truth, attains peace.

अध्याय ५

भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्।

सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति।।२९।।

नन्हीं! अब भगवान कहते हैं कि :

शब्दार्थ :

१. मेरे भक्त, मेरे को यज्ञ और तपों का भोगने वाला

२. और अखिल लोक महेश्वर तथा ‘सर्वभूत सुहृद्’ जानकर,

३. शान्ति को पाते हैं।

तत्व विस्तार :

देख नन्हीं जान! भगवान यहाँ क्या कह रहे है। मुनिजन, भगवान को यज्ञ तथा तप का भोक्ता मानकर, अखिल लोकेश्वर मान कर तथा सर्वभूत सुहृद् जानकर शान्ति को पाते हैं।

प्रथम ‘यज्ञ तथा तप का भोक्ता’ समझ लो।


1. जीवन में यज्ञ करना बहुत कठिन है।

2. जीवन में अपनी बलि ही दे देना बहुत कठिन है।

3. जीवन में अपने आपको भूलकर, लोगों के कार्य सिद्ध करना बहुत कठिन है।

4. जीवन में अपने आपको तबाह करके दूसरे के छोटे छोटे काम करना बहुत कठिन है।

5. जीवन में अपने घर को भूलकर दूसरों के घर को बसाना बहुत कठिन है।

6. जीवन में अपनी योजनाओं को भूलकर दूसरों के योजन का संयोग कठिन है।

फिर नन्हीं! जीवन में तप भी बहुत कठिन है।

क) अपने मान को गंवा देना,

ख) अपने मान की परवाह न करना,

ग) लोगों से अपनी हानि करवा लेना,

घ) जो अपमान करें, उनकी सेवा करना,

ङ) जीवन में अपने रुचिकर को छोड़कर अरुचिकर करना,

च) अपनी ही मान्यताओं के विरुद्ध कार्य करना,

छ) जीवन में अपने मन की विरुद्धता को सह लेना,

ज) जीवन में अपने को भूलकर औरों को खुशी देना, बहुत कठिन है।

फिर ज़रा आगे बढ़ें तो देखें कि :

1. जीवन में औरों के काज करके, उन्हें ही कार्य सिद्धि का सेहरा देना बहुत कठिन है।

2. दूसरों का घर बसाने के लिये उन्हीं से अपमानित होना बहुत कठिन है।

3. अपने आपको मिटाकर औरों को बसा देना बहुत कठिन है।

4. अपमान सहकर भी दूसरे का भला करना बहुत कठिन है।

5. निन्दक, कलंकित, दुष्ट इत्यादि को भी सहारा देना बहुत कठिन है।

6. न्याय की कसौटी पर अपने ही खिलाफ़ न्याय दे सकना बहुत कठिन है।

नन्हीं! यहाँ भगवान कह रहे हैं कि भक्त गण :

क) भगवान को यज्ञ का भोक्ता मानकर खुशी से अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देते हैं।

ख) भगवान को तप का भोक्ता मानकर संसार के सम्पूर्ण दु:खों को मुसकराते हुए सहन कर लेते हैं।

ग) भगवान को सम्पूर्ण सृष्टि का ईश्वर मानकर हर दु:ख तथा विपरीतता उसी की देन जानकर उसे शिरोधारण करते हैं।

घ) भगवान को सम्पूर्ण लोगों का स्वार्थ रहित सुहृद् जानकर, उनके प्रेम से मदमस्त हुए, सब कुछ सहन कर लेते हैं।

ङ) सम्पूर्ण रचना तथा जीव भगवान रचित ही हैं और भगवान के अधीन हैं, यह मानकर भक्तगण शान्ति को प्राप्त होते हैं।

यह सब कहने से, भगवान का तात्पर्य यह है कि :

1. यदि जीव भगवान पर भरोसा रखे,

2. यदि जीव भगवान से प्रेम करे,

3. यदि जीव भगवान के गुणों का आश्रय ले,

4. यदि जीव भगवान में श्रद्धा रखे,

5. यदि जीव भगवान के परायण हो जाये, तो वह सहज में ही शान्ति पा लेता है।

फिर नन्हीं! आगे समझ! जीव यज्ञ भगवान के नाम पर करता है, और

क) परिणाम में यज्ञ शेष खाता है।

ख) कर्म फल त्याग में सिद्धि पाता है।

ग) जीवन के प्रति उदासीन होने लगता है।

घ) जीवन में करुणा पूर्णता रूप प्रसाद पाता है।

क्यों न कहें, जीव भगवान के नाम के आधार पर यज्ञ और तप करता हुआ तृप्ति पाता है। भगवान के नाम पर और भगवान को भोक्ता मानकर, भागवद् अर्थ यज्ञ तथा तप करने वाले प्रसाद में भागवद् गुण पाते हैं। इनके परिणाम रूप उन्हें नित्य आनन्द तथा शाश्वत शान्ति मिलती है। जीव भगवान से प्रेम करता हुआ यह सब कुछ सहज में ही कर सकता है।

आप भगवान को सर्व लोक महेश्वर मानोगे; तो :

1. आपके यज्ञ से जिसको भी लाभ हो, आप उसे भगवान का ही जीव मानोगे।

2. आत्म स्वरूप भगवान यदि महेश्वर हैं, तो जहान भी आत्म रूप ही है।

3. आपने तो जो किया, वह अपनी आत्मा के लिये किया।

4. वह अपने भगवान के लिये किया।

5. वह अपने आपके लिये किया।

यदि इस भाव में यज्ञ किया तो आपने किसी पर कोई एहसान नहीं किया। यह भाव आपको योग में स्थित करवा देता है।

भगवान को ‘सुहृद्’ मानने वाले, भगवान को :

क) अखिल आत्मा का मित्र मानते हैं।

ख) अखिल आत्मा का एकमात्र आश्रय मानते हैं।

ग) अखिल आत्मा का एकमात्र सखा और सुहृद् मानते हैं।

घ) अखिल आत्मा का एकमात्र अपना मानते हैं।

नन्हीं! जो आत्मा को यज्ञ और तप से पूजते हैं, वे आत्मवान् बन ही जाते हैं। जो इस आत्मा को तत्व से जानते हैं, वे शान्ति पाते हैं।

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे

श्रीकृष्णार्जुनसंवादे कर्मसंन्यासयोगो नाम


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