Chapter 5 Shloka 2

श्री भगवानुवाच

संन्यास कर्मयोगश्च नि:श्रेयसकरावुभौ।

तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते।।२।।

The Lord replied:

Sanyas and yoga are both beneficial;

of the two, performance of selfless action (Karma Yoga)

is superior to renunciation of action (Karma Sanyas).

Chapter 5 Shloka 2

श्री भगवानुवाच

संन्यास कर्मयोगश्च नि:श्रेयसकरावुभौ।

तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते।।२।।

The Lord replied patiently:

Sanyas and yoga are both beneficial; of the two, performance of selfless action (Karma Yoga) is superior to renunciation of action (Karma Sanyas).

The Lord has upheld both sanyas and yoga as beneficial for the spiritual aspirant. Like all worldly people, Arjuna too, understood sanyas to mean renunciation of the world, escape from all duties, choosing a solitary location and engaging oneself in meditation.

The Lord specifies otherwise. “Arjuna, sanyas is praiseworthy, but so is yoga.” Thus the Lord is reiterating His earlier injunction to Arjuna (see Chp.3, shloka 4), that man does not attain selflessness through inaction – nor does he attain perfection or success in this manner. In support of this principle, the Lord continues, “Yoga, through engaging in actions with a spirit of detachment, is far preferable to the abnegation of action.” In saying this, the Lord is upholding sanyas, but not the renunciation or tyaag of action.

Sanyas:

1. The absence of attachment with action;

2. The disavowal of the idea ‘I am the body’;

3. The consequence of the abolition of excessive attachment or hatred – raag and dvesh;

4. The result of revoking the intellect that favoured body establishment;

5. To be completely detached whilst engaging in action – not escaping action;

6. To seek no fruit of one’s actions and to maintain equanimity and objectivity towards success and failure, profit and loss.

(Sanyas is discussed in detail in Chp.18, Shloka 2)

Little one, although the Lord has praised yoga through action, He has not disregarded the eminence of sanyas.

Karma

1.    In fact, karma yoga alone effects union with the Atma through sanyas. Abandoning action does not lead to union with the Self.

2. Life is a flow of actions, which cannot be halted as long as life exists.

3. The presence of divine qualities too, is proved through one’s actions. The proof of sadhana too, lies in action.

4. The nature of BrahmAdhyatam – is the greatest act of yagya. The whole of Creation is proof of this.

When the sadhak is unable to comprehend the highest knowledge, the Sadguru comes to his level and explains to him again and again. Lord Krishna too, is doing the same. He tells Arjuna,

1. “You are the Atma! Why are you distressed by questions which pertain only to the body?

2. Attachment with actions is foolishness.

3. It is foolish to think that you are the doer.

4. Aim to achieve Yoga.

5. I shall give you that intellect, obtaining which you will imbibe the knowledge of Saankhya.”

          Then He described the qualities of the stable intellect, which takes one to union with the Atma and said:

6. “Acquire the stable intellect with which you can transcend both sin and virtue and attain Yoga.”

          Then explaining the attributes of One who had achieved Yoga, the Lord said:

7. “Such a One becomes perfect in the performance of action and transcends good and evil deeds.

8. Abandon mental restlessness, attachment and hatred, fear, anger, desire and the body idea and your intellect will be stable.

9. To renounce actions and revel in objects within the mind is deceitful.”

          Giving examples of those who had achieved perfection through actions, the Lord said:

10. “King Janak and others also achieved Realisation through deeds.”

The Lord then gave His own example and explained the mystery of karma: He explained the secret of inaction in action and action in inaction.

Remember little one! Lord Krishna’s principle aim in explaining all this was to urge Arjuna to engage in war.

The Lord then said that one who had attained sanyas from actions as a result of yoga, that one is not bound by action.

In spite of hearing all this, Arjuna had obviously not understood the mysterious depths of karma. He had failed to understand that:

a) He was essentially the Atma – not the body.

b) With the annihilation of attachment, the seeds of actions become impotent. No longer is such a one subject to the fruits of action.

c) The pure intellect is imperative for yoga with the Atma. When the intellect is united with the Atma, the individual is emancipated from his body idea and from the intellect that was partial to the body. The individual then becomes a sanyasi.

Through all these explanations, the Lord is coming down to the level of the sadhak. Since Arjuna was not able to fully imbibe the knowledge of Saankhya that the Lord put before him, the Lord began to take him forward through answers to his own questions. The goal is the Atma, but to become steadfast in it, one must begin with one’s actions in daily life. Arjuna has not understood what sanyas connotes in daily life.

अध्याय ५

श्री भगवानुवाच

संन्यास कर्मयोगश्च नि:श्रेयसकरावुभौ।

तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते।।२।।

अर्जुन की बात सुनकर धैर्यवान् भगवान बोले :

शब्दार्थ :

१. संन्यास और योग दोनों कल्याण ही करने वाले हैं,

२. परन्तु इन दोनों में कर्म संन्यास से कर्म योग विशेष है।

तत्व विस्तार :

भगवान कहने लगे, ‘संन्यास और योग, दोनों ही कल्याण कारक है।’

नन्हीं! पहले अर्जुन की समस्या समझ ले!

जैसे साधारण लोग मानते हैं वैसे ही अर्जुन भी जग को छोड़कर, सब कर्तव्य छोड़कर, सब कर्म छोड़कर, किसी जगह एकान्त में बैठकर तत्व चिन्तन करने को संन्यास मानते थे।

भगवान ने संन्यास को इस मान्यता से अलग ही अर्थ दिया है, जिसे वह आगे जाकर स्पष्ट करते हैं।

भगवान ने कहा, ‘अर्जुन! संन्यास श्रेष्ठ है और योग भी श्रेष्ठ है।’ फिर, जैसे कि वह पहले भी कह आये हैं, (संदर्भ, अध्याय ३, श्लोक ४) वही दोहराते हुए, भगवान कहते हैं कि, पुरुष कर्मों के न करने से निष्कामता को नहीं पाता, न ही संन्यास मात्र से ही सिद्धि को प्राप्त करता है।’ इस सिद्धान्त को सामने रखते हुए, भगवान पुन: कहते हैं कि, ‘कर्मों से त्याग रूप संन्यास की अपेक्षा कर्मों का योग श्रेष्ठ है।’

नन्हीं! भगवान ने कहा, ‘सन्यास श्रेष्ठ है, किन्तु कर्म का संन्यास ठीक नहीं।’ इन दोनों का भेद समझ ले।

संन्यास :

नन्हीं! संन्यास :

1. कर्मों से आसक्ति के अभाव को कहते हैं।

2. तनत्व भाव के त्याग को कहते हैं।

3. राग और द्वेष के अभाव का परिणाम है।

4. देहात्म बुद्धि के अभाव का परिणाम है।

5. बाह्य कर्मों का त्याग कर देने से संन्यास नहीं मिलता। कर्म करते हुए, उनसे नितान्त निरासक्त हो जाना संन्यास है।

6. संन्यास कर्मों का त्याग नहीं। कर्मों राही किसी भी फल की चाहना न रखना और हानि लाभ के प्रति निरपेक्ष और सम रहना, संन्यास है।

नन्हीं! आगे चलकर भगवान स्वयं इसे स्पष्ट करते हैं। इसे अठाहरवें अध्याय के दूसरे श्लोक में विस्तार पूर्वक कहेंगे।

जब भगवान ने कर्म योग को श्रेष्ठ कहा, तब भी उन्होंने संन्यास की उपेक्षा नहीं की।

कर्म :

1. वास्तव में, कर्मयोग ही संन्यास दिलाकर आत्मा से योग सिद्धि करवा सकता है। कर्म त्याग से आत्मा से योग सिद्ध नहीं होता।

2. जीवन कर्म बहाव ही है, वह रोका नहीं जा सकता। यानि, कर्म तो करने ही पड़ेंगे।

3. फिर दैवी गुण भी कर्मों राही ही सिद्ध होते हैं।

4. हर साधक की साधना का प्रमाण तथा चिन्ह, कर्मों में ही निहित होता है।

5. ब्रह्म का स्वभाव जो अध्यात्म है, वह भी तो एक महान् क्रिया रूप यज्ञ है; यह सम्पूर्ण सृष्टि उसी का ही तो प्रमाण है।

नन्हीं! जब साधक परम ज्ञान या उच्च ज्ञान को न समझे, तो सद्गुरु शनै: शनै: उसके स्तर पर उतरने लगते हैं। भगवान ने यह तो पहले कहा कि :

क) तू आत्मा है, इस तन की बातों से क्यों घबराता है?

ख) कर्मों से संग मूर्खता है।

ग) अपने आपको कर्ता मानना मूर्खता है।

घ) तू योग कर।

ङ) तुझे मैं वह बुद्धि देता हूँ, जिसे पाकर तू सांख्य ज्ञान से योग कर सकेगा।

च) फिर उस स्थिर बुद्धि के गुण कहे, जिन्हें पाकर जीव आत्मा से योग कर सकता है।

छ) उस स्थिर बुद्धि की शरण में जा, उस बुद्धि से तू पाप पुण्य से तर जायेगा। फिर योग के चिन्ह बताते हुए कहा :

ज) योग से जीव कर्मों में कुशल हो जाता है और सुकृत् तथा दुष्कृत् दोनों से ऊपर उठ जाता है।

झ) मनो उद्विग्नता, राग द्वेष, भय, क्रोध छोड़ दो, तो स्थिर बुद्धि हो जाओगे।

ञ) कामना और तनत्व भाव जब छूट जायें तब जीव स्थिर बुद्धि हो जाता है।

ट) बाह्य कर्म बन्द करके मन में विषयों का स्मरण करना मिथ्याचार है। फिर यज्ञ करने की बातें समझाने लगे और कहने लगे :

ठ) जनक, इत्यादि ने भी कर्म किये और सिद्धि पाई।

ड) फिर अपने ही जीवन की उपमा देकर कर्म राज़ समझाते रहे।

ढ) फिर कर्मों में अकर्म, तथा अकर्म में कर्म का राज़ भी सुझाया। नन्हीं! यह सब समझाते हुए, याद रहे वे अर्जुन को युद्ध के लिये प्रेरित कर रहे थे।

ण) फिर भगवान ने स्पष्ट कहा कि योग के परिणाम रूप कर्मों से संन्यास पाया हुआ, कर्मों से नहीं बंधता। यानि, जब आपका आत्मा से योग हो तो कर्म आपको नहीं बांध सकेंगे।

नन्हीं यह सब सुनकर भी अर्जुन को कर्म राज़ समझ में नहीं आया। वह यह न समझ सका कि :

1. वह तन नहीं, आत्मा है।

2. संग का अभाव हो जाने से कर्म निष्प्राण हो जाते हैं।

3. आत्मा से योग के लिये बुद्धि अनिवार्य है। बुद्धि का आत्मा से योग हो जाने से जीव नित्य तनत्व भाव रहित, या कहें, देहात्म बुद्धि रहित, नित्य संन्यासी ही होगा।

भगवान साधक को समझाते समझाते उसी के स्तर पर उतरते आ रहे हैं। जब अर्जुन सांख्य को समझकर उसमें टिक न सका, तो भगवान उसे उसी के प्रश्नों के साथ साथ विज्ञान की ओर ले जा रहे हैं और उसी के स्तर पर जाकर उसे ज्ञान समझा रहे हैं। लक्ष्य तो आत्मा है, किन्तु वहाँ टिकने के लिये दिनचर्या तलक पहुँचना ज़रूरी है। अर्जुन दिनचर्या में संन्यास का राज़ नहीं समझ रहा; या कहें संन्यासी का दिनचर्या में रूप नहीं समझ रहा।

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