Chapter 5 Shloka 25

लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषय: क्षीणकल्मषा:।

छिन्नद्वैधा यतात्मान: सर्वभूतहिते रता:।।२५।।

He whose sins have been washed away

and whose doubts have been shattered;

That One, whose mind is established in the Supreme

and who is ever engaged in the service of all,

He attains Brahm Nirvana or mergence in Brahm.

Chapter 5 Shloka 25

लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषय: क्षीणकल्मषा:।

छिन्नद्वैधा यतात्मान: सर्वभूतहिते रता:।।२५।।

He whose sins have been washed away and whose doubts have been shattered; That One, whose mind is established in the Supreme and who is ever engaged in the service of all, He attains Brahm Nirvana or mergence in Brahm.

Little one, the Lord further describes those glorious sages. When their sins are annihilated:

a) Their lives are imbued with Yagya.

b) Their minds are ever fixed in the Supreme.

c) Such a one becomes a non-participating witness and Brahm Himself presides over his actions.

d) Knowing that all actions are controlled by the interaction of the gunas, his feeling of doership ceases.

e) He transcends desire and attachment.

f) His moha is annihilated.

g) He depends on none and has expectations from none.

h) He transcends the ego.

Dvaidha (द्वैधा)

Dvaidha means indecision, suspicion, conflict, doubt, dilemma, error. The Lord says, those who are freed from all doubts and confusion, become the benefactors of all.

Such a One is Sarva Bhoot Hite Ratah (सर्वभूतहितेरता:). He is ever engaged in the welfare of all beings.

1. His very life is a yagya, so he will naturally perform every deed for the other’s benefit.

2. The Atmavaan would have thus given his body for the welfare of the other.

3. Duty is his motto and Adhyatam is his very nature. Therefore as Brahm looks after the welfare of all beings, the Atmavaan, too, will do the same.

Little aspirant of the Atma! Such a one is a Sarva Bhoot Hite Ratah from yet another angle:

a) Others who witness his life, also wish to emulate his noble example and benefit thereby.

b) Thus their intellects awaken to divinity.

c) They too, are inspired to tread the path of duty.

d) They too, will lead a life of yagya.

e) They too, will learn to love.

f) They will learn forgiveness.

g) They will become magnanimous.

Thus such an elevated soul benefits others even through his silent example.

The Lord now says, that these beneficial souls merge into Brahm. They achieve supreme liberation. The Atma merges into Atma and having achieved freedom from bodily fetters, they are emancipated even whilst still alive.

Brahm Nirvana (ब्रह्म निर्वाण)

Nirvana means to disappear; to become silent, invisible; to be freed from Prakriti and merge in the Supreme; to attain salvation, liberation and peace.

1. Such a one becomes unmanifest just as Brahm is formless.

2. He ceases to be affected by the gunas of Prakriti even as Brahm transcends Prakriti.

3. He is freed from the cycle of birth and death.

4. He becomes one with Brahm.

Such a one, who has renounced the body idea, naturally becomes ‘unmanifest’ since he no longer identifies himself with his manifest form. When he, so to say, ‘renounces the body idea’, the world receives another living divine Manifestation – a Bhagwan in their midst!

अध्याय ५

लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषय: क्षीणकल्मषा:।

छिन्नद्वैधा यतात्मान: सर्वभूतहिते रता:।।२५।।

शब्दार्थ :

१. जिनके पाप सम्पूर्ण नष्ट हो गये हैं,

२. जिनके संशय छिन्न भिन्न हो गये हैं,

३. जो निरन्तर, अखिल भूत हितकर हो गये हैं,

४. वे ब्रह्म निर्वाण को पाते हैं।

तत्व विस्तार :

नन्हीं! अब भगवान उन ऋषिगण की बात करते हुए कहते हैं कि जब वह पाप विमुक्त हो जाते हैं, तो :

1. उनका जीवन यज्ञमय हो जाता है;

2. उनका चित्त नित्य परम में टिक जाता है;

3. वे नित्य साक्षी आत्म हो जाते हैं;

4. उनके कर्मों के अध्यक्ष ब्रह्म हो जाते हैं;

5. यह जानकर कि गुण गुणन् में वर्तते हैं, उनका कर्तापन मिट जाता है;

6. उनकी चाह और संग का नितान्त अभाव हो जाता है;

7. उनका मोह भी मिट जाता है;

8. वे निराश्रित और निर् आशी हो जाते हैं;

9. अहं का नितान्त अभाव हो जाता है;

नन्हीं! जो पाप रहित हो जाते हैं, उनका कोई संशय नहीं रहता।

‘द्वैधा’ :

द्वैधा का अर्थ है :

क) मन में अनिश्चितता;

ख) मन में संशय का उठना;

ग) मन में संघर्ष का उठना;

घ) मन में संदेह का उठना;

ङ) मन का दुविधा में पड़ जाना;

च) मन का असमंजस में पड़ जाना।

फिर देख भगवान क्या कहते हैं। जिनकी विभ्रान्तकर दुविधा नहीं रही, वे ‘सर्वभूतहितेरता:’ हो जाते हैं।

सर्वभूतहितेरता :

1. नन्हीं! जिसका जीवन अखण्ड यज्ञ होगा, वह सब भूतों का हित करने वाला ही होगा।

2. जो आत्मवान् होगा, उसने अपना तन दान में दे ही दिया होगा।

3. जो नित्य अपना कर्तव्य करता होगा, वह सबका कल्याण ही करता होगा।

4. यदि अध्यात्म ब्रह्म का स्वभाव है, तो आत्मवान् ब्रह्म के स्वभाव वाला होगा ही। ज्यों ब्रह्म सम्पूर्ण जग का कल्याण करते हैं, वह सबका कल्याण करता ही होगा।

नन्हीं आत्म प्रिया! फिर, यदि दूसरे दृष्टिकोण से लो तो यूँ समझो कि ऐसे का जीवन देख कर :

क) लोग भी वैसा बनना चाहेंगे तो उनका भी कल्याण हो जायेगा।

ख) लोग भी उसका अनुसरण करेंगे तो उनका भी कल्याण हो जायेगा।

ग) अनेकों लोगों की बुद्धियाँ खुल जायेंगी।

घ) अनेकों लोग उसी की तरह कर्तव्य परायण हो जायेंगे।

ङ) अनेकों लोग यज्ञ करने लग जायेंगे।

च) अनेकों लोग प्रेम करना सीख जायेंगे।

छ) अनेकों जीव क्षमा करना सीख जायेंगे।

ज) अनेकों जीव उदार हो जायेंगे।

नन्हीं! उसका तो हर कर्म अखिल भूत हितकर ही होता है।

भगवान कहते हैं, ‘ऐसे लोग ब्रह्म निर्वाण पा लेते हैं।’

1. परमात्मा में लीन हो ही जाते हैं;

2. स्वरूप में स्थित हो ही जाते हैं;

3. आत्मा में आत्मा हो ही जाते हैं;

4. तन से मुक्ति पा ही लेते है;

5. जीवन मुक्त हो ही जाते हैं।

निर्वाण का अर्थ है :

क) लुप्त हो जाना,

ख) मौन हो जाना,

ग) दृष्टि से ओझल हो जाना,

घ) प्रकृति से मुक्त होकर परमात्मा में लीन हो जाना,

ङ) मोक्ष पाना,

च) मुक्ति तथा शान्ति पा लेना।

‘ब्रह्म निर्वाण’ का अर्थ हुआ :

1. ब्रह्म के समान अदृश्य हो जाना,

2. ब्रह्म के समान प्रकृति से मुक्त हो जाना,

3. जन्म मरण के चक्र से मुक्त हो जाना,

4. ब्रह्म में ब्रह्म ही हो जाना।

बात तो ठीक है नन्हीं! जब तनत्व भाव ही नहीं रहा तो वह आत्मवान् तन के रहते हुए ही निराकार हो जाते हैं क्योंकि वे आकार रूप तन को त्याग चुके होते हैं। फिर देख नन्हीं! जब वह तनत्व भाव छोड़ देते हैं, तब जहान को भगवान मिल जाते हैं।

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