Chapter 5 Shloka 3

ज्ञेय: स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति।

निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते।।३।।

O Arjuna! One who neither harbours

hatred nor desire, know him to be a Sanyasi;

for one who has transcended duality

is easily liberated from worldly bondage.

Chapter 5 Shloka 3

ज्ञेय: स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति।

निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते।।३।।

Now Bhagwan speaks of the state of a sanyasi:

O Arjuna! One who neither harbours hatred nor desire, know him to be a Sanyasi; for one who has transcended duality is easily liberated from worldly bondage.

Look little one! The Lord says that one who has transcended strong attachment and hatred may be considered to be a sanyasi.

Dvesh (द्वेष)

First understand ‘dvesh’:

Opposing another, jealousy, hatred, turning away from another because he is bad, or harbouring enmity, all form part of dvesh.

Na Dveshti (न द्वेष्टि) – He does not harbour dvesh. Such a one is devoid of dvesh or hatred:

1. He does not reject anyone.

2. He does not look at another with contempt.

3. He has no enmity in his heart for anyone.

4. He does not consider anyone as his rival.

5. He does not shun anyone.

6. He does not seek to escape from anyone.

7. Nor does he seek to give up anyone.

He loves even his enemies. He does not fear adversity and performs even distasteful actions with an impartial attitude. He does not attempt to run away even from the evil and tyrannical. He hates no one, not even the one who injures his reputation or does him physical harm.

Na Kankshati (न काङ्क्षति) – He has no desires. Now understand the one who is desireless:

1. Such a one has no hopes or expectations.

­­–  He is devoid of desire and cravings.

­­–  He thus has no reason to eagerly await someone who will fulfil his desires.

­­–  He never casts an eye on the desires or possessions of another.

­­–  He never stretches out his palm seeking to gain some material possession.

­­–  He has no desire whatsoever for wealth.

2. He does not endeavour to obtain any object which may be to his liking.

3. In fact, such a one is completely devoid of any desire for recognition from the world.

4. He has no wish or intention of doing anything for his personal self.

In short, he has no desires of his own.

The Sanyasi’s state

Little one, the sanyasi is silent towards himself and oblivious of his body and mind.

1. How can dualities affect one who is thus fast asleep towards himself?

2. How can he be troubled by joy and sorrow, who is fast asleep towards himself?

3. How can victory and defeat trouble the one who does not consider himself the body?

4. How can even birth and death trouble him if he does not consider himself to be the body?

5. How can he be affected by craving or repulsion?

6. How can he be affected by honour or dishonour?

7. How can he be affected by knowledge or ignorance?

8. How can he be affected by enmity or friendship?

One who is thus devoid of raag and dvesh is neither attached to engagement in action nor escape from it; he is not attached to the saint nor does he repel the sinner; he has no attachment either with honour or with dishonour; he is not swayed by his likes or dislikes. In fact, he is impartial towards both action and knowledge.

A sanyasi thus devoid of the effect of dualities is ever joyous. Tyaag, Vairaagya, Sanyas, Yoga – all these are infinitely joyous paths, but only when the bonds of raag and dvesh are broken, is true liberation achieved.

Now understand the state of the aspirant of sanyas:

a) Sanyas is an internal state.

b) It is the result of countermanding the mind’s tendencies and the absence of mental traits.

c) It is directed towards non-identification with one’s own body.

d) It has no relationship with relinquishing physical actions.

e) A sanyasi differs from the ordinary man in his perspective. His point of view towards his body and his own self is changed.

Little one, when the ‘I’ identifies itself with the Atma, having disassociated itself from the body, then that seeker attains Yoga or union with the Atma. That body then becomes the body of a sanyasi. Just as divine qualities are yagyashesh, similarly sanyas is the divine remnant or the shesh of yoga with the Atma. The body holds no importance for such one, nor do the actions or events of his life have any purpose for him.

Sanyas, or renunciation, is not a voluntary action – it just happens. The true sanyasi never ‘takes’ sanyas. When he attains union with the Atma, people call him a sanyasi, having witnessed his inherent detachment over a period of time.

अध्याय ५

ज्ञेय: स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति।

निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते।।३।।

नन्हीं! अब भगवान, संन्यासी की स्थिति बताते हैं और कहते हैं :

शब्दार्थ :

१. हे अर्जुन! जो पुरुष, न किसी से द्वेष करता है,

२. और न आकांक्षा करता है,

३. वह नित्य संन्यासी ही समझने योग्य है,

४. क्योंकि निर्द्वन्द्व पुरुष सुख से (आसानी से) बन्धनों से मुक्त हो जाता है।

तत्व विस्तार :

देख नन्हीं! भगवान कहते हैं, जो राग और द्वेष से रहित है, उसे नित्य संन्यासी ही मानना चाहिये।

प्रथम ‘द्वेष’ को समझ ले!

द्वेष का अर्थ है,

1. किसी का विरोध करना;

2. किसी से ईर्ष्या करना;

3. किसी से घृणा करना;

4. किसी से मुँह फेर लेना;

5. किसी से शत्रुता करना;

6. किसी से दूर भागने का प्रयत्न करना क्योंकि वह बुरा है।

अब यह समझ ले, कि ‘आकांक्षा रहित‘ किसे कहते हैं?

1. जो अभिलाषा नहीं करता।

2. जो कामना नहीं करता।

3. जो किसी के लिये लालायित नहीं होता।

4. जो किसी की प्रतीक्षा नहीं करता।

5. जो किसी वस्तु या जीव की इच्छा में आँख नहीं बिछाता।

6. जो किसी के पास हाथ नहीं फैलाता।

7. जिसमें अर्थ पूर्ति की चाह का नितान्त अभाव हो।

नन्हीं! अब कांक्षा तथा द्वेष को पुन: समझ ले!

वह द्वेष नहीं करता‘, यानि,

क) किसी को त्यागना नहीं चाहता;

ख) किसी के प्रति घृणापूर्ण दृष्टि नहीं रखता;

ग) किसी के प्रति शत्रुता का भाव नहीं रखता;

घ) किसी को अपना विरोधी नहीं समझता;

ङ) अपने मन में किसी के लिये वैर भाव नहीं रखता;

च) किसी से निवृत्ति पाने की चाहना नहीं करता;

छ) किसी से भागने के यत्न नहीं करता;

ज) किसी को त्यागने के यत्न नहीं करता।

द्वेष रहित तो अपने शत्रुओं से भी प्रेम करता है। वह विपरीतता से भी नहीं घबराता और अरुचिकर काम भी निरपेक्ष भाव से करता है। वह अत्याचारी से भी भागने के यत्न नहीं करता। कोई उसका मान हर ले या घर हर ले तब भी उससे घृणा नहीं करता।

वह कांक्षा नहीं करता‘, यानि :

क) वह किसी की चाहना नहीं करता;

ख) जो प्रिय लगे, उसे पाने के यत्न नहीं करता;

ग) अपनी पसन्द के पीछे नहीं जाता;

घ) अपना मान स्थापित करने की उसमें कोई चाहना नहीं होती;

ङ) अपने लिये कुछ भी करने की उसमें कोई चाहना नहीं होती।

यानि अपने लिये उसकी कोई कामना नहीं होती।

संन्यासी की स्थिति :

नन्हीं! संन्यासी तो अपने प्रति मौन होते हैं, वे अपने तन और मन को भूले हुए होते हैं, वे तो अपने आपको भी भूले हुए होते हैं।

1. उन्हें द्वन्द्व क्या सतायेंगे जो अपने प्रति प्रगाढ़ निद्रा में सोये हुए हों?

2. उन्हें सुख दु:ख क्या सतायेंगे जो अपने प्रति प्रगाढ़ निद्रा में सोये हुए हों?

3. उन्हें जय या पराजय क्या सतायेंगे जो अपने आप से बेगाने हो गये हों?

4. उन्हें जन्म मृत्यु क्या सतायेंगे जो तन की परवाह नहीं करते?

जो अपने आपको तन ही नहीं मानते,

5. उन्हें राग या द्वेष क्या सतायेंगे?

6. उन्हें मान या अपमान क्या सतायेंगे?

7. उन्हें ज्ञान या अज्ञान क्या सतायेंगे?

8. उन्हें शत्रुता या मैत्री क्या प्रभावित करेंगे?

राग तथा द्वेष रहित को न प्रवृत्ति से न निवृत्ति से; न दुष्ट न सन्त से; न मान से न अपमान से; न रुचिकर से न अरुचिकर से; न कर्म से न ज्ञान से द्वेष है और न ही राग है।

संन्यासी गण के मन में राग द्वेष जनित द्वन्द्वों के प्रभाव का नितान्त अभाव होता है। द्वन्द्व रहित, वे मुदित मन वाले लोग नित्य सुखी ही होते हैं। त्याग, वैराग्य, संन्यास, योग, सब सुख के पथ ही हैं किन्तु जब राग द्वेष के बन्धन टूटें, केवल तब ही वह नित्य मुक्त होता है।

संन्यास चाहुक की स्थिति अब समझ ले नन्हीं जान्!

क) संन्यास एक आन्तरिक स्थिति को कहते हैं।

ख) संन्यास मनोवृत्ति निरोध तथा वृत्ति अभाव का परिणाम है।

ग) संन्यास तो अपने तन से लिया जाता है।

घ) संन्यास आपको आपके तन के प्रति मौन कर देता है।

ङ) संन्यास का स्थूल जीवन के कर्मों से मानो कोई सम्बन्ध नहीं है।

च) संन्यासी के दृष्टिकोण में भेद होता है। उसका अपने प्रति तथा अपने तन के प्रति दृष्टिकोण बदल जाता है।

नन्हीं! जब ‘मैं’ अपने आपको तन न मानकर आत्मा मान लेता है, जब ‘मैं’ का आत्मा से मिलन हो जाता है, जब ‘मैं’ का आत्मा से योग हो जाता है, तब वह तन जो बाकी रह जाता है, वह संन्यासी का तन हो जाता है। ज्यों परम गुण तथा दैवी गुण यज्ञशेष होते हैं त्यों आत्मयोग का शेष संन्यास होता है।

नन्हीं! जब जीव आत्मवान् बन ही गया, तब उसे तन के कार्यों से क्या? संन्यासी को जीवन की कर्म प्रणाली से क्या प्रयोजन हो सकता है?

संन्यास लेते नहीं, संन्यास धारण नहीं करते, संन्यास हो जाता है। वास्तविक संन्यासी तथा नित्य संन्यासी कभी संन्यास नहीं लेते। उनका जब आत्मा से योग हो जाता है तब उन्हें दीर्घकाल के पश्चात् लोग संन्यासी कहते हैं।

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