Chapter 5 Shloka 23

शक्नोतीहैव य: सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात्।

कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्त: स सुखी नर:।।२३।।

He who is able to withstand

the urges of passion and anger

before the demise of the mortal body,

That One is a Yogi. Only He is ever joyous.

Chapter 5 Shloka 23

शक्नोतीहैव य: सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात्।

कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्त: स सुखी नर:।।२३।।

Expanding on the qualities of such a detached Yogi, the Lord says:

He who is able to withstand the urges of passion and anger before the demise of the mortal body, That One is a Yogi. Only He is ever joyous.

Veg (वेग)

Veg means power, tremendous force, immensity, intensity.

The Lord clarifies that, that person is a Yogi:

a) who can withstand the fervid energy flow of desire and anger;

b) who can resist the intensity of desire and anger;

c) who can overcome the fear that desire and anger generate;

d) who can bear the pain desire and anger cause.

Sodhum (सोढुम्)

Sodhum means to tolerate, withstand, forgive, accept, become deserving of, endure.

Little one, specifying the characteristics of a Yogi, the Lord says:

1. Such a Yogi is indifferent to the sharp onslaught of desire.

2. He can smilingly withstand its attack and remain unaffected by it.

3. He is not afraid of its force.

4. He is not upset by its powerful attack.

5. He smilingly endures its onslaught.

To be unaffected by anger and desire is the mark of a Yogi.

The Yogi and the ordinary individual

The Yogi has renounced attachment to the body. In fact he does not consider himself to be the body.

1. Thereafter, neither enjoyments entertained by that body, nor actions performed by it are the deeds of the Yogi – he is not the enjoyer.

2. Then whatever that body does – each deed it performs, is verily a consequence of the play of the gunas – the Atmavaan is ever a non-doer.

3. The Lord is again clarifying here that desire and anger are both related to the body. Knowing this, whosoever withstands both is a Yogi.

Little one! Lord Krishna is renowned as a Bal Brahmchari – or a celibate from childhood – yet he had wives and sons from those wives! Lord Ram, too, was married with sons, yet He, too, was considered a Brahmchari. Thus, the Lord, the very Essence of the Atma in all its purity, exemplifies His words through His life. The term used here as regards one’s attitude towards desire and anger is ‘sodhum’. The meaning of this word is ‘to withstand’ or ‘to endure’ desire – not to suppress it.

The Lord has also stressed that this state must be achieved before renunciation of the mortal body. One who intends to renounce the body idea is in fact giving his body self to others in charity to fulfil their tasks.

The Lord says:

1. One must then perform the most ordinary actions in leading an ordinary life.

2. One must perform dutiful and selfless actions.

3. One must endeavour not to destroy the concepts and beliefs of others.

4. The wise must perform the same deeds as the ignorant perform; yet, they must be devoid of desire and anger.

5. One must transcend duality.

6. Renunciation of action is not sanyas.

7. The Atmavaan remains ever uninfluenced and untouched.

Gita and the Lord’s life

Bhagwan is urging Arjuna again and again to engage in a fearful battle and to kill his very own gurus, grandsire and other respected relatives! Little one! The Gita is a treatise of the Lord’s life. The simple way to understand this Scripture is to witness the Lord’s life as one studies it. His life is the soul of the Gita. If you consider even a single tenet or attribute elucidated in the Gita to be contrary to the Lord’s life, the misunderstanding is yours. You have not understood the correct connotation of the Lord’s words.

Little one, try once more to understand the following facts:

a) The Lord is a perfect sanyasi.

b) He is completely detached.

c) He is desireless.

d) He is a complete Vairaagi and the embodiment of yagya.

e) He is an eternal Brahmchari, a non-doer and non-enjoyer, devoid of likes and dislikes.

f) He is without form.

g) He is ever fully satiated.

h) He is ever indifferent to Himself.

After accepting all the above to be the truth, then witness the events in His life.

1. He would often get angry.

2. He performed all deeds as others did.

3. He even became a charioteer for Arjuna.

4. He obeyed His elders and maintained all relationships.

5. He performed all the requisite duties towards his sons, daughters-in-law, grandsons and other relations.

6. He participated in several wars and also used strategies and tactics in battle, such as hinting to Arjuna the trick he could use to kill Jarasandha and Dronacharya.

7. Yet, He was the epitome of Love. His love for the Gopis and the cowherds of Brindavan and for Radha is immortal.

8. He is also known for breaking his vow as He used the Sudarshan Chakra in the war where He had vowed not to wield any weapons!

Little one, perceiving all this, one must not give any importance to one’s own concepts about the life of such a One. If one attempts to understand the Lord’s essence through witnessing His life, then this shloka will become easy to understand.

The elevated state of an Atmavaan

If one has to renounce the body idea, one must never snatch away the rights of others. One must witness the gunas interacting with each other from afar and identify oneself with the Atma. What remains will be only yagya. Become indifferent and remain unaffected even by the desires and anger of others. Do not agitate the ignorant. Perform deeds as they do – the difference must lie in the renunciation of one’s body idea. Know that the Atmavaan is the true Yogi – only he is ever joyous.

अध्याय ५

शक्नोतीहैव य: सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात्।

कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्त: स सुखी नर:।।२३।।

इस निरासक्त तथा युक्त पुरुष के गुण बताते हुए भगवान कहते हैं कि :

शब्दार्थ :

१. जो मनुष्य तन के छूटने से पहले,

२. काम तथा क्रोध से उत्पन्न हुए संवेग को सहन करने में समर्थ है,

३. वही मनुष्य इस लोक में योगी है,

४. वही सुखी है।

तत्व विस्तार :

वेग :

वेग का अर्थ है प्रचण्डता, महाबल, तेज़ी, क्रियाशीलता, शक्ति।


विज् का अर्थ है, दु:खी होना, कष्ट में होना, भय से कांपना, डरना।

अर्थात् भगवान यहाँ उसकी बात कह रहे हैं जो :

क) काम और क्रोध के प्रचण्ड प्रवाह को सह लेता है।

ख) काम और क्रोध की शक्ति को बर्दाश्त कर लेता है।

ग) काम और क्रोध की तीक्ष्णता को बर्दाश्त कर लेता है।

घ) काम और क्रोध के भय को पराजित कर देता है।

ङ) काम और क्रोध के कष्ट को सह लेता है।

सोढुम् :

सोढुम् का अर्थ है; सहन कर लेना, बर्दाश्त कर लेना, क्षमा कर देना, धारण कर लेना, योग्य होना, भुगतना या झेलना।

नन्हीं! ध्यान से देख! योगी के लक्षण स्पष्ट करते हुए, भगवान यहाँ क्या कह रहे हैं। वह कहते हैं, जो कामना के :

1. तीव्र प्रहार के प्रति उदासीन रहते हैं, वे सुखी हैं।

2. वेग की ओर निरपेक्ष हैं, वे योगी हैं।

3. वेग से भयभीत नहीं होते, वे योगी हैं।

4. प्रचण्ड प्रहार से भी विचलित नहीं होते, वे योगी हैं।

5. वेग को मुसकरा कर सहते हैं, वे योगी हैं।

6. वेग को भोग लेते हैं, वे योगी हैं।

7. वेग को धारण कर लेते हैं, वे योगी हैं।

नन्हीं! ध्यान से सुन :

क) कामना तथा क्रोध के प्रति उदासीन रहना योगी का गुण है।

ख) कामना तथा क्रोध से अप्रभावित रहना योगी का गुण है।

ग) कामना तथा क्रोध से विचलित न होना योगी का गुण है।

योग और साधारण जीवन

देख नन्हीं! योगी ने अपना तनत्व भाव त्याग दिया होता है। वह अपने को तन मानता ही नहीं है।

1. तब, यदि उसका तन किसी वस्तु का उपभोग करता है तो आत्मवान् ने वह उपभोग नहीं किया होता, वह तो नित्य अभोक्ता है।

2. तब, यदि उसका तन कर्म करता है तो वह तन का कर्म है; आत्मवान् तो नित्य अकर्ता ही होता है।

3. तब, उसका तन जीवन में जो भी करता है, वह गुणों का खिलवाड़ ही माना जाता है।

4. यहाँ भगवान उसी सत्त्व का आसरा लेकर समझाते हैं कि काम या क्रोध भी तन से ही सम्बन्धित हैं, यह जानकर जो उन्हें भी सह लेता है, वह योगी है।

नन्हीं! कृष्ण बाल ब्रह्मचारी थे, किन्तु उनकी पत्नियाँ भी थीं तथा पुत्र भी थे। भगवान राम बाल ब्रह्मचारी थे किन्तु उनकी भी पत्नी थी और पुत्र भी थे। यहाँ पर जो भगवान कह रहे हैं, यदि उसे समझ लो तो इसका राज़ भी खुल जायेगा। आत्मवान्, आत्म स्वरूप भगवान स्वयं अपनी कथनी का प्रमाण हैं। इस कारण उन्होंने कहा ‘सोढुम्’ अर्थात् ‘सह लेने’ का आदेश दिया है, दमन का नहीं।

यहाँ भगवान ने स्पष्ट किया है कि यह स्थिति मनुष्य ने तन छूटने से पहले ही पानी है। यदि आप तनत्व भाव का त्याग करना चाह रहे हो, तब तो आप अपना तन मानो दान देने जा रहे हो।

फिर भगवान ने कहा है कि :

1. सहज जीवन में सहज कर्म करने चाहियें।

2. कर्तव्य कर्म करने चाहियें।

3. निष्काम कर्म करने ही चाहियें।

4. लोगों की मान्यता भंग नहीं करनी चाहिये।

5. ज्ञानी भी साधारण अज्ञानी लोगों की तरह ही कर्म करते हैं।

6. काम और क्रोध के वेग को सहन कर।

7. द्वन्द्वों के प्रति उदासीन हो जा।

8. कर्म त्याग संन्यास नहीं है।

9. आत्मवान् नित्य निर्लिप्त है।

फिर भगवान बार बार अर्जुन को ही महा भयंकर युद्ध रूपा कर्म में नियोजित कर रहे हैं। वह अर्जुन को अपने ही गुरु, पितामह, पिता तुल्य तथा अन्य बन्धु तथा पूज्य गणों को मारने के लिये कह रहे हैं।

गीता और भगवान

गीता भगवान के जीवन की वाङ्मय प्रतिमा है। नन्हीं! शास्त्र समझने के लिये सहज तरीका है कि भगवान के जीवन को सामने रख लो। उनका जीवन ही गीता का प्रमाण है। गीता को अर्थ, भगवान के जीवन से दो।

यदि तुम समझो कि भगवान के जीवन में गीता के किसी गुण का स्पष्टीकरण या उदाहरण नहीं है, या गीता ने कुछ भगवान के जीवन के विरुद्ध कहा है, तब जान लेना कि भूल तुम्हारी है और तुम भगवान की बात नहीं समझ सके। गीता में प्राण भरने वाला भगवान का अक्षरश: सहयोगी जीवन है। गीता की व्याख्या भगवान का जीवन ही है।

नन्हीं! अब पुन: समझने के यत्न करो :

क) भगवान संन्यास स्वरूप हैं।

ख) भगवान नित्य निरासक्त हैं।

ग) भगवान कामना रहित हैं।

घ) भगवान वैराग्य स्वरूप हैं।

ङ) भगवान यज्ञ स्वरूप हैं।

च) भगवान नित्य ब्रह्मचारी हैं।

छ) भगवान नित्य अकर्ता हैं।

ज) भगवान नित्य अभोक्ता हैं।

झ) भगवान राग द्वेष रहित हैं।

ञ) भगवान नित्य निरासक्त हैं।

त) भगवान नित्य तृप्त हैं।

थ) भगवान नित्य उदासीन हैं।

पहले इन बातों को मान लो। यदि इन्हें मानती हो, तब भगवान का जीवन देखो।

1. वह क्रोध भी करते थे,

2. वह काज कर्म भी करते थे,

3. वह अर्जुन के सारथी भी बन गये,

4. घर में विभिन्न लोगों का कहा मानते थे,

5. घर में अपने नाते रिश्तों से निभाते थे,

6. घर में अपनी बहुओं को भी खुश रखते थे,

7. अपने पुत्र पौत्र तथा अन्य नाते बन्धुओं के भी काज करते होंगे,

8. वह रण में भी भाग लेते थे,

9. वह नीति भी वर्तते थे,

10. अर्जुन को नीति बताकर उन्होंने जरासंध का वध करवाया,

11. अर्जुन को नीति बताकर उन्होंने द्रोणाचार्य का वध करवाया,

12. वह प्रेम की प्रतिमा थे, गोप ग्वालों की कहानियाँ प्रमाण हैं,

13. राधा और कृष्ण का प्रेम भी अमर है,

14. वचन देकर उन्होंने उसे तोड़ भी दिया, सुदर्शन चक्रधारी इस कारण उन्हें कहते हैं, इत्यादि।

नन्हीं! यह देखते हुए तुम्हें अपनी मान्यताओं को महत्व नहीं देना चाहिये। भगवान को भगवान के जीवन राही समझने के यत्न करो, तब यह श्लोक समझ में आयेगा।

आत्मवान् की स्थिति

तनत्व भाव छोड़ना है तो औरों के हक़ कभी न छीनो। गुणों को गुणों में वर्तने दो, अपनी ‘मैं’ को आत्मा के तद्‍रूप कर दो, बाकी सब यज्ञ ही रह जायेगा। लोगों के काम क्रोध के प्रति भी उदासीन हो जाओ। नित्य उदासीन तथा निर्लिप्त रहो। अज्ञानी को विचलित न करो, उसके साथ अज्ञानी के जैसे ही कर्म करने होते हैं। विलक्षणता आपके तनत्व भाव के अभाव की होती है। यह जान लो, जो आत्मवान् है, वही नर योगी हैं, वही नित्य सुखी हैं।

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