Chapter 5 Shloka 19

इहैव तैर्जित: सर्गो येषां साम्ये स्थितं मन:।

निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिता:।।१९।।

This mortal plane is conquered by those

whose mind is established in equanimity.

Since the Absolute Brahm is faultless

and knows no distinction,

hence they are established in That One.

Chapter 5 Shloka 19

इहैव तैर्जित: सर्गो येषां साम्ये स्थितं मन:।

निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिता:।।१९।।

The Lord now says:

This mortal plane is conquered by those whose mind is established in equanimity. Since the Absolute Brahm is faultless and knows no distinction, hence they are established in That One.

The Atmavaan who is established in equanimity:

1. becomes free of all aberrations;

2. becomes detached and free of faults;

3. is ever satisfied in himself;

4. has transcended duality and merged into the Indestructible One;

5. has transcended the body and is thus formless;

6. is the very essence of Truth, Consciousness and Bliss – Sat Chit Anand;

7. is completely silent and indifferent towards himself;

8. such a one is established in the eternal Self which transcends duality.

On the Universal plane, this is Brahm’s Nature as well. After creating this entire Universe, Brahm is completely silent, unattached and indifferent. An Atmavaan is the individualised form of Brahm.

a) He is merged in the Atma.

b) He is thus pure consciousness itself.

c) His life embodies eternal knowledge and irradiates the irrefutable tenets of Adhyatam.

Just as this whole creation is a silent proof of the Yagya of the Supreme Atma, the life of the Atmavaan is also an example of that divine, supreme Yagya. Just as the whole of creation is the silent knowledge of Adhyatam, similarly the life of the Atmavaan is a silent proof of Adhyatam. Just as Brahm is beyond comprehension, immeasurable and infinite, so also is the Atmavaan.

He has conquered the world and abides in the hearts of all.

Little seeker! The Lord has specified here that such a one’s ‘mind’ is established in equanimity.

First consider the mind:

1. The mind is the abode of all aberrations.

2. It is the root of all problems.

3. It is the mind which makes people suffer anguish and cause pain to others.

4. It is the mind which makes people avaricious, so that they even let others die hungry.

5. It is the cause of excessive attachment and hatred which produces great sorrow.

6. All evil traits are born and reside in the mind.

a) The mind veils the intellect and reduces it to the level of a servitor.

b) It attaches itself to objects and partakes of their sap, eternally seeking fulfilment.

c) It draws the individual into the pursuit of his likes.

d) It individualises the jivatma and distances him from his very Being.

e) It renders the jivatma devoid of any sense of duty.

He whose mind does not hinder him thus, attains greatness. He imparts joy to all and is infinitely dear to all. Such a one is replete with attributes of divinity.

Little one, each one admires the attributes of the Lord. The individual may feel some apprehension in inculcating those qualities, but everyone appreciates divinity in practice. It is another matter that those who possess divine qualities are sought after because people wish to:

a) make them their servitors;

b) use them for selfish purposes;

c) get their help in fulfilling some desire of their own;

d) establish their own reputation and name after getting all help from them;

e) obtain their association to bask in their reflected glory!

 The individual harbours an attitude of natural competition with the Lord. He wishes to establish his own name in the place of the Lord’s. He usurps the Lord’s Creation and calls it ‘mine’. On the other hand, he expects from others the same sincerity as the Lord’s. Just as the Lord remains silent when we usurp His place, so also we love those people who forget themselves and engage themselves wholeheartedly in our establishment!

Just as Brahm is blemishless, so also the Atmavaan is without a fault.

Nirdosh (निर्दोष)

1. One who is sinless.

2. Pure of mind and heart.

3. Who never harms anyone.

4. Who can never sin.

5. Who is devoid of any disease.

Those who are afflicted with the disease of the body idea and bodily attachment, can never be faultless. The germs of body attachment give rise to the fever of desire, which causes mental aberrations. This leads to obstinacy and madness. All that he does thereafter, is flawed on account of the inherent disease.

Healthy beings are those who abide in their true Self. They never place their body before Self even in their dreams. Therefore they are entirely blameless. Even if their actions appear questionable, they themselves are beyond all blemish. Since they do not identify with the body, the faults and attributes of the body do not belong to them. Ever abiding in Brahm, they perceive all in a spirit of equanimity.

अध्याय ५

इहैव तैर्जित: सर्गो येषां साम्ये स्थितं मन:।

निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिता:।।१९।।

भगवान कहते हैं :

शब्दार्थ :

१. जिनका मन समत्व भाव में स्थित है,

२. उनके द्वारा सम्पूर्ण संसार जीत लिया गया है,

३. क्योंकि ब्रह्म निर्दोष और सम है,

४. इसलिये वह ब्रह्म में ही स्थित हैं।

तत्व विस्तार :

आत्मवान् जब समत्व में स्थित होता है, तब वह :

क) निर्विकार हो जाता है।

ख) निर्लिप्त हो जाता है।

ग) निर्दोष हो जाता है।

घ) नित्य तृप्त हो जाता है।

ङ) निर्द्वन्द्व हो जाता है।

च) अखण्ड, एक रस हो जाता है।

छ) तन रहित, निराकार हो जाता है।

ज) सत् चित्त आनन्द स्वरूप हो जाता है।

झ) अपने प्रति अखण्ड मौन हो जाता है।

ञ) नितान्त उदासीन हो जाता है।

ट) संकल्प विकल्प रहित हो जाता है।

ठ) अखण्ड अद्वैत में स्थित हो जाता है।

समष्टिगत में ब्रह्म का भी यही स्वरूप है। यानि ब्रह्म भी पूर्ण रचना रच कर मौन हैं तथा उदासीन हैं। समत्व में स्थित आत्मवान् के सम्पूर्ण लक्षण वही हैं, जो ब्रह्म के हैं।

तनत्व भाव के नितान्त अभाव के कारण आत्मवान् :

1. परम में विलीन हो जाता है।

2. वह स्वयं चेतन स्वरूप हो जाता है।

3. वह स्वयं दिव्य अखण्ड विज्ञान रूप ही होता है।

4. उसका जीवन अखण्ड विज्ञान रूप ही होता है।

5. वह नित्य अध्यात्म प्रकाश स्वरूप ही होता है।

ज्यों परम की दिव्य रचना यह सृष्टि केवल परम यज्ञ का परिणाम है, वैसे ही आत्मवान् का जीवन भी दिव्य परम यज्ञ का प्रमाण है। जैसे परम की पूर्ण सृष्टि अध्यात्म का मूक ज्ञान है, वैसे ही आत्मवान् का जीवन अध्यात्म का रूप तथा मूक विज्ञान है। जैसे ब्रह्म अचिन्त्य, अतुल्य, असीम हैं, वह आत्मवान् भी वह ही हो गया। अक्षर में आत्म मिला, अक्षर ही बस रह गया।

उस आत्मवान् ने संसार को मानों जीत लिया, वह सबके हृदय में वास करता है। कोई माने या न माने, सब उसको याद करते हैं।

आत्म अभिलाषी नन्हीं जान्! यहाँ भगवान ने कहा है, ‘जिसका मन समत्व भाव में स्थित है’ इसको पुन: ध्यान से समझ ले :

पहले मन को समझ :

1. सम्पूर्ण विकार मन में रहते हैं।

2. सब मुसीबतों की जड़ यह मन ही है।

3. मन के कारण ही लोग तड़पते हैं और दूसरों को तड़पाते हैं।

4. मन के कारण ही लोग लोभ करते हैं और दूसरों को भूखा मारते हैं।

5. मन के कारण ही लोग राग या द्वेष करते हैं और दूसरों को दु:खी करते हैं।

6. सम्पूर्ण दुर्वृत्तियों का वास भी इस मन में ही होता है।

7. सम्पूर्ण वृत्तियों का जन्म मन के कारण ही होता है।

यह मन ही :

क) बुद्धि को आवृत करता है।

ख) बुद्धि को अपना अनुचर बना लेता है।

ग) विषयों से संग करता है।

घ) विषयों के रस का रसिक बन जाता है।

ङ) जीवात्मा को रुचिकर की ओर ले जाता है।

च) जीवात्मा को व्यक्तिगत कर देता है।

छ) जीवात्मा को आत्म स्वरूप से भी दूर कर देता है।

ज) जीवात्मा को कर्तव्य विहीन कर देता है।

नन्हीं! जिनका अपना मन उनकी राहों में न आये, वही :

1. श्रेष्ठ गण होते हैं।

2. सबको सुख देने वाले होते हैं।

3. सबको प्रिय भी होते हैं।

4. भागवद् गुण सम्पन्न भी होते हैं।

नन्हीं! कोई माने या न माने, सबको भगवान के गुण प्रिय लगते हैं। जीव उन गुणों को अपने में लाते हुए डरता है, किन्तु सब ही वास्तव में भगवान के गुणों को पसन्द करते हैं। यह बात और है कि वे ऐसे भागवद् गुण पूर्ण को :

क) अपना नौकर बनाना चाहते हैं।

ख) सहयोगी बनाना चाहते हैं।

ग) उससे अपना काम करवाना चाहते हैं।

घ) उसकी राही मान पाना चाहते हैं।

ङ) उसकी राही अपनी कामना पूर्ण करना चाहते हैं।

च) उससे सब कुछ करवा कर अपना नाम बनाना चाहते हैं।

जीव की होड़ भी भगवान से है। वह भगवान के नाम की जगह अपना नाम भरना चाहता है। वह भगवान की रचना को चुराकर, उसे ‘मैं’ और ‘मेरा’ कहता है। दूसरी ओर, उसे वफ़ा भी भगवान जैसी चाहिये। यानि, ज्यों भगवान की चोरी कर लें, तो वह मौन रहते हैं, वैसे ही संसार में भी हमें वही लोग प्रिय लगते हैं, जो अपने आपको भूलकर हमें स्थापित करते हैं।

नन्हीं! ज्यों ब्रह्म निर्दोष हैं, ऐसे आत्मवान् नित्य निर्दोष ही होते हैं।

निर्दोष :

1. अपराध शून्य को कहते हैं;

2. शुद्ध चित्त को कहते हैं;

3. रोग रहित को कहते हैं;

4. जो दूसरे की हानि कभी न करना चाहे, उसे निर्दोष कहते हैं।

5. जो कभी पाप न करे, उसे निर्दोष कहते हैं।

नन्हीं! दोषी तो रोग ग्रसित होते हैं। जिन्हें तन रूपा रोग लगा होता है और तनो आसक्ति के किटाणु जिन्हें मूढ़ बना देते हैं, वह दोषी होते हैं। तनो आसक्ति रूप किटाणु कामना रूपा ज्वर को उत्पन्न करते हैं। इस ज्वर के कारण जीव मूढ़ तथा पागल हो जाता है। तब वह जो भी करता है, वह निहित रोग के कारण दोष पूर्ण ही होता है।

जो स्वस्थ होता है, वह अपने स्वरूप में स्थित होता है। वह स्वप्न में भी कभी अपने तन को पहले रख कर कोई व्यवहार नहीं करता। इस कारण वह नित्य निर्दोष है। देखने में यदि वह दोषयुक्त कर्म करे भी, तब भी वह निर्दोष ही होता है। फिर, तन को न अपनाने के कारण तन के गुण या दोष उसके अपने नहीं होते। इस नाते वह नित्य निर्दोष ही होता है। वह तो नित्य सम ही रहता है, वही ब्रह्म में स्थित है।

Copyright © 2024, Arpana Trust
Site   designed  , developed   &   maintained   by .