Chapter 4 Shloka 40

अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति।

नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मन:।।४०।।

An ignorant man without faith

and possessed of doubt, is destroyed.

The doubting soul neither attains this world,

nor the world beyond;

nor does he experience happiness.

Chapter 4 Shloka 40

अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति।

नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मन:।।४०।।

An ignorant man without faith and possessed of doubt, is destroyed. The doubting soul neither attains this world, nor the world beyond; nor does he experience happiness.

The Agyah (अज्ञः) or ignorant one

1. The ignorant man is one who has no faith in Truth.

2. He has no knowledge of Truth.

3. He has no experience of Truth.

4. He does not wish to live in facts.

5. He is uncomfortable with reality.

6. He lives in a world of imagination.

7. He is full of desire, greed and attachment.

8. He lives in the bondage of hope and expectation.

9. One who is thus attracted to worldly objects, will always be in doubt.

10. He who spends his life in likes and dislikes will always pursue his likes and evade what he dislikes.

11. Since life provides plenty of both, he is always trapped in the duality of attraction and aversion.

12. Dwelling in the universe which is full of innumerable, attractive objects, he spends his whole life trying to procure those objects.

13. He tries to quench the unquenchable fire of desire with objects. He restlessly pursues them all life long. Then how can he ever be at peace?

14. And if he has no peace, how can he ever be happy?

15. When, inspite of his best efforts, he does not get the desired results, he is unhappy.

The ignorant one and his relationship with others

He is perturbed not only because of his failure to procure worldly objects, but also because of his interaction with others.

a) He wants respect from all the people in the world. This is not possible because others are also wanting respect!

b) He wants others to act in accordance with his wishes; this is not possible.

c) He wants everything to go his way; this is not possible.

d) He wants everyone to work for his establishment; this too, is not possible.

e) He wishes others to serve him and fulfil his desires, but this too, is not possible.

f) He forgets that others, too, are human like himself.

g) He forgets that they, too, have the same desires.

h) The foolish ignorant one remains unaware of reality; nor does he desire to see it.

i)  He spends his whole life trying to effect a change in others.

Then where is there any possibility of his attaining happiness? He will achieve it neither in this life nor in the next.

Ashraddadhaanah (अश्रद्दधानः) – The faithless

1. Such a person considers no one superior to himself.

2. He firmly believes that his own attributes are the most superior.

3. He believes himself to be the body. That body, which will one day merge with the dust!

4. The ashraddha yukt has all the attributes of the ignorant and has no worth while goal in life.

When will faith develop?

a) Only when one’s attachments to worldly objects decline.

b) When one considers the qualities of the Supreme to be the only goal worth achieving.

c) When one wishes to shed one’s illusory mental world.

d) When one wishes to live in facts.

e) When one becomes attached to the knowledge of the Supreme.

If the mind becomes attracted to the knowledge of the Supreme, then you will want to translate that knowledge, which your intellect has gained, into your life. This can be achieved only with the help of shraddha or faith.

Sanshayatma (संशयात्मा ) – People who live in doubt

Such people doubt everybody’s integrity. They even doubt the Lord! They are indecisive people. They can never take any decision or make any resolve. They always live in fear and anxiety. They are ever perturbed and forgetful of their duty. They ever doubt the path of Truth. There is no peace nor any happiness for them, nor any hope of getting it in their life hereafter.

अध्याय ४

अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति।

नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मन:।।४०।।

शब्दार्थ :

१. अज्ञानी, अश्रद्धावान् और संशयपूर्ण आत्मा नष्ट हो जाता है।

२. संशयात्मा को न यह लोक मिलता है,

३. न परलोक मिलता है

४. और न ही सुख मिलता है।

तत्व विस्तार :

अज्ञानी कौन और कैसा होता है :

1. जिसे सत् में श्रद्धा ही नहीं होती।

2. जिसे सत् का ज्ञान ही नहीं होता।

3. जिसे सत् का अनुभव ही नहीं होता।

4. जो सत् में रहना ही नहीं चाहता।

5. जिसे वास्तविकता भाती ही नहीं।

6. जो अवास्तविकता में रहता है।

7. जो मोह, तृष्णा, संग और लोभ पूर्ण होता है।

8. जो आशा पाश में बंधा रहता है।

9. जो जीव हर दम विषयों में भरमाया रहे, वह संशयात्मिका हो ही जायेगा।

10. जो हर पल रुचि अरुचि में भरमाया रहता है, वह रुचि के पीछे जाता है और अरुचिकर से भिड़ाव ही उसका लक्ष्य है। वह अरुचिकर से घबरा जाता है और उसको त्यागना चाहता है।

11. जब उसे जीवन में दोनों ही मिलते हैं, तो वह कभी राग में और कभी द्वेष में पड़ा रहता है।

12. ब्रह्माण्ड में अनन्त विषय हैं। उनमें से मन मोदक विषयों की उपलब्धि में वह पूर्ण जीवन व्यतीत कर देता है।

13. वह कामना की कभी शान्त न होने वाली अग्न को विषयों से शान्त करना चाहता है। जीवन भर वह विषयों को पाने के लिये बेचैन होकर विषयों के पीछे भागता रहता है। उसे चैन कैसे मिल सकता है?

14. जिसे कभी चैन न मिलता हो, वह सुख कैसे पा सकता है?

15. फिर, जब उसे पूरे यत्न करने पर भी अपना वांछित फल नहीं मिलता, तब वह दु:खी हो जाता है।

अज्ञानी और अन्य जीव :

नन्हीं! अज्ञानी केवल स्थूल विषयों के कारण ही दु:खी नहीं रहता, वह तो अन्य जीवों के कारण भी दु:खी रहता है।

क) वह चाहता है, कि सम्पूर्ण जीव उसको मान दें। यह हो नहीं सकता, क्योंकि अन्य जीव भी अपना ही मान चाह रहे होते हैं।

ख) वह चाहता है कि अन्य सभी जीव वही करें, जो वह चाहता है; यह भी नहीं हो सकता।

ग) वह चाहता है कि अन्य सभी उसकी रुचि के अनुकूल हों, यह भी नहीं हो सकता।

घ) वह चाहता है कि अन्य सभी उसकी स्थापना में लगे रहें, यह भी नहीं हो सकता।

ङ) वह चाहता है कि अन्य सभी उसी के नौकर बन कर रहें, यह भी नहीं हो सकता।

च) वह चाहता है कि अन्य सभी रुचि की पूर्ति करते रहें, यह भी नहीं हो सकता।

छ) वह मूर्ख, अज्ञानी, यह भी भूल जाता है कि दूसरे भी उसके जैसे ही इन्सान हैं।

ज) वह मूर्ख अज्ञानी यह भी भूल जाता है कि दूसरे भी उसके जैसे ही माँग और चाहना वाले हैं।

झ) वह मूर्ख अज्ञानी वास्तविकता को नहीं देख सकता और न ही देखना चाहता है।

ञ) वह मूर्ख अज्ञानी उम्र भर दूसरों को ही बदलने के प्रयत्न करता रहता है।

तुम ही सोच लो नन्हीं! ऐसे इन्सान को सुख कहाँ मिल सकता है? उसे न तो इस जहान में सुख मिलता है और न ही अगले जहान में।

अश्रद्धायुक्त :

1. अश्रद्धायुक्त इन्सान किसी को भी अपने से श्रेष्ठ नहीं मानता।

2. अश्रद्धायुक्त इन्सान अपने गुणों को ही सर्वश्रेष्ठ मानता है।

3. अश्रद्धायुक्त इन्सान अपने आपको माटी रूपा तन ही मानता है।

4. अश्रद्धायुक्त इन्सान का जीवन में कोई श्रेष्ठ लक्ष्य नहीं होता।

नन्हीं! जितने अज्ञानी के गुण हैं, इनका श्रेष्ठ लक्ष्य नहीं होता।

श्रद्धा कब होगी :

क) विषयों से आसक्ति कम हो, तब ही श्रद्धा उपज सकती है।

ख) परम के गुणों को जीवन में प्राप्तव्य मानो, तब ही श्रद्धा हो सकती है।

ग) श्रद्धा तब ही हो सकती है, यदि अपने कल्पित मनोलोक को त्यागना चाहो।

घ) श्रद्धा तब ही हो सकती है, यदि आप वास्तविकता में रहना चाहो।

ङ) यदि आपको परम ज्ञान के साथ संग हो जाये, तब श्रद्धा उत्पन्न होती है।

यदि आपके मन को परम ज्ञान के साथ संग हो जाये, तब आप अपनी ही बुद्धि राही उपार्जित ज्ञान को अपने जीवन में लाना चाहोगे। यह श्रद्धा के आसरे ही हो सकता है।

संशयात्मक जीव :

नन्हीं! अब ‘संशयात्मक’ की बात सुन ले!

संशयात्मक लोग तो निरन्तर दूसरे लोगों पर संदेह ही करते हैं। वे निरन्तर भगवान पर भी सन्देह करते रहते हैं। संशयात्मक लोग तो नित्य अनिश्चित ही रहते हैं। वे कोई भी निर्णय नहीं ले सकते। वे नित्य डरते ही रहते हैं, घबराये ही रहते हैं। ऐसे आदमी तो किम्कर्तव्य विमूढ़ ही होते हैं तथा नित्य विक्षिप्त ही रहते हैं। वे तो सत् पथ पर भी संशय ही करते रहते हैं। ऐसे लोग कैसे सुख पा सकते हैं? इन्हें न इस लोक में चैन मिलता है, न आगे जाकर ही सुख मिलता है।

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