Chapter 4 Shloka 6

अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्।

प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया।।६।।

Krishna says, O Arjuna!

Though I am Immutable, Indestructible and Unborn

and though I am the Master of all beings,

I become manifest through My maya,

in subservience to My own Prakriti.

Chapter 4 Shloka 6

अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्।

प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया।।६।।

Krishna says, O Arjuna!

Though I am Immutable, Indestructible and Unborn and though I am the Master of all beings, I become manifest through My maya, in subservience to My own Prakriti.

Bhagwan says:

1. I am Atmavaan, Eternal, Indestructible and Unborn.

2. I am formless – this manifest form is not Mine.

3. I am the Master of all beings; yet I take birth in subservience to My own Prakriti (Nature).

4. I take birth with the support of the five elements and the threefold Energy created by Me.

Prakriti is conceived as being constituted of the threefold gunas which are conducive to bondage. The illusory veil of Prakriti is maya. The Lord says, “I take the support of maya for My birth. With its support:

1. I, the formless One, don a body.

2. Even though I am the Master of the sense faculties, I appear to be bound by them.

3. Though I am Master of the gunas, I seem to be limited by them.

4. Though I am the creator of the universe, I seem to be bound by destiny.

5. Despite being the Master of time, I seem to be fettered by it.

6. Though I rule maya, yet I seem to be created by it.”

Inspite of the above, the Lord is untouched by moha, free from ego and unaffected by the gunas. He is detached even from his own mind and intellect. His body performs all actions as does an ordinary person – involved in some situations or resolving others – yet He is ever established in His Essence, the Atma. He watches everything from a distance but there is no witness. He does all but there is no feeling of doership. He partakes of all but there is no enjoyer. His body is visible, but He Himself is in complete identification with the Atma.

The Lord says He is unborn. Actually what takes birth is a body comprising of a combination of gunas. He Himself does not get attached with the actions spurred by these gunas. Therefore He is not a doer despite seemingly performing all actions.

“I take birth taking support of My Prakriti,” says the Lord. In other words, He becomes manifest through that product of Prakriti – the body. Yet, He also says, “I am manifested of My own maya.” Little one, now understand the connotation of maya.


a) The Lord possesses a body – yet He is not the body.

b) He is a Non-doer, yet He does all.

c) He is pure Atma, yet one labours under the illusion that He is a most ordinary individual.

d) It causes one to mistake a mirage for the Truth. This illusion of reality in what is not real, is maya.

e) The power that causes this confusion is also maya.



1. The threefold Energy of the gunas which creates the three fold nature of all objects. 1. The illusion of man that ‘This Prakriti is under my control’ is maya.
2. The same threefold energy creates the body. 2. Enmeshed in maya, man says, “This body is mine.”
3. Karmas or actions are constituted of those very same three gunas. 3. Man suffers under the illusion ‘I am the doer’.
4. Prakriti is that basic Energy from which this manifest Creation emanates. 4. Maya provides the misleading deception in Prakriti’s Creation.
5. Prakriti endows the body with its natural faculties. 5. Due to maya, man imputes false significance to them.
6. Prakriti is a metaphysical reality. 6. Maya fills the hues of illusion in that reality.
7. The body is a creation of Prakriti. 7. The creation of maya is the ‘I’.
8. Prakriti is rooted in the Truth. 8. Maya is rooted in fanciful imagination.
9. The creative force is the Prakriti. 9. The faculty that creates illusion is maya.

a) In gist, the cause of delusion is maya.

b) Maya is mere imagination and a play of the mind.

c) The perception of Truth in the untrue is maya.

d) Our body attachment is the work of maya.

e) ‘I’-ness is maya. Maya steals away reality and creates a false world of its own.

f) The realm of the mind is maya.

g) Maya is the factor that changes the true nature of the mind and intellect.

Bhagwan says He becomes manifest through His own maya. Bhagwan is all knowing and yet:

1. He too, appears to be covered by maya as all ordinary beings.

2. He too, appears to possess an ‘I’ and identify with His body as do all others.

This maya makes Him so difficult to recognise. In fact it is well-nigh impossible to know Him because of the workings of maya.

Another factor to understand is, that Bhagwan takes birth to establish dharma in the world. He therefore maintains an extremely ordinary exterior to teach the world how one can, in normal life, follow dharma. Veiled by maya, He provides the proof of Supreme and Divine qualities in His daily life.

अध्याय ४

अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्।

प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया।।६।।

कृष्ण कहते हैं, हे अर्जुन!

शब्दार्थ :

१. मैं अव्यय, अविनाशी होते हुए भी,

२. जन्म रहित होते हुए भी,

३. अखिल भूतपति होते हुए भी,

४. अपनी प्रकृति को अधीन करके,

५. अपनी माया से प्रकट होता हूँ।

तत्व विस्तार :

भगवान कहते हैं :

1. मैं आत्मवान्, अजर, अक्षर हूँ।

2. मेरा जन्म नहीं होता।

3. निराकार मैं आप हूँ।

4. साकार रूप मेरा नहीं होता।

5. अखिल भूतपति भी मैं आप हूँ।

6. फिर भी, अपनी प्रकृति को अधीन करके जन्म लेता हूँ।

क) मैं अपनी प्रकृति का आश्रय लेकर जन्म लेता हूँ।

ख) मैं पंच तत्वों का आश्रय लेकर जन्म लेता हूँ।

ग) मैं अपनी त्रिगुणात्मिका शक्ति का आश्रय लेकर जन्म लेता हूँ।

प्रकृति का काल्पनिक रूप, त्रैगुण पूर्ण बन्धन कारक माया है। प्रकृति की भ्रमित करने वाली शक्ति, गुणन् की माया है। इसका (माया का) आश्रय लेकर मैं जन्म लेता हूँ। यानि :

1. मैं तन रहित, तन धारण करता हूँ।

2. इन्द्रिय पति होते हुए भी मैं इन्द्रिय आश्रित सा हो जाता हूँ।

3. गुणपति होते हुए भी मैं गुण बधित सा हो जाता हूँ।

4. विधान रचयिता होते हुए भी मैं रेखा बधित सा हो जाता हूँ।

5. काल पति होते हुए भी मैं काल बधित सा हो जाता हूँ।

6. माया पति होते हुए भी मैं अपनी माया के राही रचा जाता हूँ।

यह सब होते हुए भी भगवान निर्लिप्त, निर्मम, निर्मोह, निर्गुणिया ही होते हैं। वह कभी संग नहीं करते। अपने ही मन बुद्धि से भी संग नहीं करते। ‘यह मैं हूँ’, ऐसा कभी नहीं कहते। उनका तन सब करता है, वह एक साधारण व्यक्ति के समान रहते हैं। कहीं उलझें कहीं सुलझायें, परन्तु वह नित्य अपने स्वरूप में टिके रहते हैं। परम पुरुष पुरुषोत्तम सब दूर से ही देखते जाते हैं। सच तो यह है कि उस तन का दृष्टा भी नहीं रहता। वह सब कुछ करते ज़रूर हैं, पर वहाँ कर्ता नहीं होता। वह सब कुछ भोगते ज़रूर हैं, पर वहाँ भोक्ता नहीं होता।

नन्हीं! उनका तन तो सामने दिखता है, लेकिन वह स्वयं आत्मा के तद्‍रूप हैं।

वास्तव में इक तन का जन्म हुआ है, उनका जन्म नहीं हुआ। तन गुणों से परिपूर्ण होता है, उनका तन भी गुणों में वर्त रहा है। वह तन के गुणों से प्रेरित और तन के गुणों से करवाये गये कर्मों से संग नहीं करते; इस कारण वह सब करते हुए भी अकर्ता ही हैं। भगवान कहते हैं, ‘मैं अपनी प्रकृति का आश्रय लेकर जन्म लेता हूँ;’ यानि, त्रैगुण रूपा प्रकृति की रचना ‘तन’ में मानो भगवान प्रकट होते हैं। लेकिन साथ ही कह दिया कि ‘मैं अपनी ही माया से प्रकट होता हूँ।’

माया :

नन्हीं! अब माया को समझ ले।

क) वास्तव में भगवान हैं भी नहीं उस तन में, फिर भी तनधारी हैं।

ख) वास्तव में वह कुछ भी नहीं करते, फिर भी सब कुछ करते हैं।

ग) वास्तव में, वह तन हैं ही नहीं, केवल शुद्ध आत्म स्वरूप हैं। किन्तु संसार को तो उनको देख कर यही भ्रम होता है कि वह एक साधारण व्यक्ति हैं। इसी भ्रमात्मक क्रिया को माया कहते हैं।

घ) अवास्तविकता में वास्तविकता के दर्शन माया है।

ङ) जो आभास मात्र को सत् मानते हैं, यह माया का खेल है।

च) काल्पनिक सृष्टि को माया कहते हैं।

छ) विभ्रान्त कर देने वाली शक्ति को माया कहते हैं।



1. त्रिगुणात्मिका शक्ति सब विषयों की त्रैगुण पूर्ण प्रकृति बनाती है। 1. इसके कारण जीव को भ्रम हो जाता है कि यह प्रकृति मेरी है।
2. त्रैगुण की शक्ति तन को रचती है। 2. जीव माया में फंस कर तन को अपना कहने लगता है।
3. त्रैगुण की शक्ति कर्म को रचती है। 3. जीव को भ्रम हो जाता है कि ‘मैं कर्ता हूँ’।
4. प्रकृति वह मूल शक्ति है, जिससे रूपात्मक जगत का विकास होता है। 4. माया वह शक्ति है, जो प्रकृति के विकास में भ्रमात्मक दर्शन करवाती है।
5. प्रकृति तन में सहज गुण भरती है। 5. माया के कारण जीव उन गुणों पर मिथ्या अर्थ आरोपित कर देता है।
6. प्रकृति दार्शनिक वास्तविकता है। 6. माया उस वास्तविकता पर मिथ्यात्व का आरोपण करती है।
7. प्रकृति की रचना यह तन है। 7. माया की रचना ‘मैं’ है।
8. प्रकृति का आधार सत् है। 8. माया का आधार मिथ्या आभास है।
9. रचना करने वाली शक्ति प्रकृति है। 9. भरमा देने वाली शक्ति माया है।

नन्हीं! माया को फिर से समझ लो।

क) जिसके कारण जीव को भ्रान्ति हो जाती है, उसको माया कहते हैं।

ख) कल्पना तथा मनोलीला माया है।

ग) असत् में सत् का आभास माया के कारण होता है।

घ) जीव की तनो तद्‍रूपता माया के कारण होती है।

ङ) माया भ्रम उत्पादक है।

च) माया का गुण है जीवन में से सत्यता हर लेना।

छ) माया ‘मैं’ को कह लो।

ज) कल्पित सृष्टि को माया नगरी कहते हैं।

झ) मनो लोक को माया लोक कहते हैं।

ञ) माया वह शक्ति है, जो मन, बुद्धि की वास्तविकता को हर लेती है।

भगवान कहते हैं कि वह अपनी ही माया से प्रकट होते हैं।

नन्हीं! भगवान सब जानते हुए भी, साधारण जीवों के समान :

1. भ्रमात्मक माया शक्ति से आवृत हुए से दिखते हैं।

2. माया जनित ‘मैं’ से भरे हुए से दिखते हैं।

3. तन के साथ पूर्णतय: तद्‍रूप हुए ही दिखते हैं।

भगवान को पहचानने में इस माया के कारण ही इतनी कठिनाई होती है; बल्कि इस माया के कारण भगवान को जानना असम्भव ही है।

फिर एक और बात समझ ले नन्हीं! भगवान का जन्म धर्म की स्थापना के लिये होता है। इसके लिये वह साधारण व्यक्ति की भान्ति जीवन व्यतीत करके, संसार को सहज जीवन में धर्म अनुकूल जीना सिखाते हैं। वह अपनी माया के कारण अज्ञात रहते हैं और साधारण जीवन में परम गुण प्रमाण देते हैं।

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