Chapter 4 Shloka 20

त्यक्त्वा कर्मफलासंगं नित्यतृप्तो निराश्रय:।

कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित् करोति स:।।२०।।

Bhagwan clearly states:

Having abandoned attachment to actions

and the fruits thereof, the ever satiated,

independent one does nothing at all –

even though fully engaged in actions.

Chapter 4 Shloka 20

त्यक्त्वा कर्मफलासंगं नित्यतृप्तो निराश्रय:।

कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित् करोति स:।।२०।।

Bhagwan clearly states:

Having abandoned attachment to actions and the fruits thereof, the ever satiated, independent one does nothing at all – even though fully engaged in actions.

Little one, first understand the meaning of Nirashraya (निराश्रय) i.e. without ashraya. In order to do this, it is necessary to know the connotation of ashraya. Ashraya means:

a) to take another’s support or help;

b) dependence on another;

c) to make use of another;

d) to elicit service from another;

e) to acknowledge the other as one’s master in order to derive some benefit;

f) to follow another in order to achieve one’s own ends.

Little one, an individual takes the support of another on the gross, emotional or intellectual planes. He does this in order to satiate some personal desire.

The SadhakNirashraya

1. The sadhak does not even consider the body to be his own, therefore he ceases to take the support even of his body.

2. The sadhak relinquishes the support of his tendencies and attributes.

3. He no longer depends on his own concepts and desires.

4. He gives up the support of his customary code of conduct and his mental knots and complexes.

5. He gives up his escapist tendencies.

6. He ceases to seek the protection of his body by his intellect.

He no longer uses his body or his mind and its potential or his intellect, at any level, for his own protection. Thus he is truly nirashraya.

The ever satiated Atmavaan Nitya Tript (नित्य तृप्त)

If such a one were not completely satiated, or nitya tript, he would not be nirashraya either.

1. Only one without desires is everlastingly satisfied.

2. Only one without desires is forever content.

3. The absence of desire is the root of permanent satiation.

4. Such a one does not seek to quench the thirst of any personal desire.

5. He does not have any personal project awaiting fulfilment.

6. He has already attained all that he desired from his bodily endeavour.

7. He has no selfish motive whatsoever to satisfy through any object, nor does he have any resolves or negative impulses to fulfil.

Being without supports and yet ever content are signs of the Atmavaan. Of what use then are actions to such souls who have so to say, ‘turned away’ from their body selves. They are, therefore, detached from all actions. They do all, yet they do nothing.

The route towards complete satiation

Little one!

1. The route towards being eternally satiated is through the performance of selfless actions.

2. The aim of selfless actions is the state of eternal satiation.

3. If one forgets one’s own body and works for others, one will reach that state.

4. Procure what you like for others.

5. Use the objects you possess for the sake of others.

6. Give the objects that you enjoy for the enjoyment of the others.

7. An impulsive renunciation of one’s favourite things does not lead to satiation. First learn to share those things with others.

8. Then learn to procure them for others. Only then will you experience the immense satisfaction that comes from using enjoyable things for the happiness of others.

Practice this with vigilance.

1. Place at the service of others those objects upon which you are dependent.

2. Remember the other also harbours the same desires as you do. If you constantly pursue the fulfilment of your own desires, your desires will increase. But when you satisfy those same desires that lie in the hearts of others, one day you will achieve complete satiation.

This is also the purpose of selfless action – to take you towards complete contentment.

This contentment is the prasaad, the yagyashesh, that the doer of selfless deeds receives. The one who is completely satiated performs all actions but is not bound by them. Being totally detached from the fruits of those deeds, they can no longer bind him. He does all, yet he does nothing.

अध्याय ४

त्यक्त्वा कर्मफलासंगं नित्यतृप्तो निराश्रय:।

कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित् करोति स:।।२०।।

देख नन्हीं! भगवान स्पष्ट कह रहे हैं कि :

शब्दार्थ :

१. कर्मफल से आसक्ति को त्याग कर,

२. नित्य तृप्त और निराश्रय पुरुष,

३. कर्म में प्रवृत्त होते हुए भी कुछ नहीं करता है।

तत्व विस्तार :

नन्हीं! प्रथम ‘निराश्रय’ को समझ ले। ‘निराश्रय’ को समझने के लिये ‘आश्रय’ को समझना ज़रूरी है।

आश्रय :

1. आश्रय का अर्थ है किसी का सहारा या मदद लेना।

2. दूसरे पर निर्भरता।

3. दूसरे को काम में लाना।

4. दूसरे को सेवा में लाना।

5. दूसरे को मालिक सा बना कर अपना काम पूरा करवाना।

6. दूसरे का, अपने काम के लिये अनुसरण करना।

नन्हीं! जीव किसी अन्य का आश्रय स्थूल स्तर, मनो स्तर तथा बुद्धि स्तर पर ही लेता है, किन्तु जीव अपनी ही कोई कामना पूर्ण करने के लिये आश्रय लेता है।

साधक और निराश्रय :

क) साधक तो अपना तन ही अपना नहीं मानता, इस कारण वह अपने तन का भी आश्रय छोड़ना चाहता है।

ख) साधक अपनी वृत्तियों का भी आश्रय छोड़ देता है।

ग) साधक अपनी मान्यताओं और चाहनाओं का भी अवलम्बन छोड़ देता है।

घ) साधक अपनी रीतिबद्ध आचरण प्रणाली का अवलम्बन भी छोड़ देता है।

ङ) साधक अपनी मानसिक ग्रन्थियों का अवलम्बन भी छोड़ देता है।

च) साधक अपनी पलायन करने वाली वृत्तियों का अवलम्बन छोड़ देता है।

छ) साधक अपनी बुद्धि के आसरे अपने ही तन का संरक्षण करना छोड़ देता है।

वह अपने संरक्षण के लिये अपने तन का इस्तेमाल नहीं करता। वह अपने संरक्षण के लिये अपने मन के किसी भी आवेश का इस्तेमाल नहीं करता। वह अपने संरक्षण के लिये अपनी बुद्धि का किसी भी स्तर पर इस्तेमाल नहीं करता।

वह सच ही ‘निराश्रय’ होता है।

‘नित्य तृप्त’ आत्मवान् :

नन्हीं! यदि वह नित्य तृप्त न होता तो निराश्रय भी न होता।

1. कामना रहित ही नित्य तृप्त होते हैं।

2. कामना रहित ही नित्य संतोषपूर्ण होते हैं।

3. कामना का अभाव ही नित्य तृप्ति का मूल है।

4. नित्य तृप्त को अपनी किसी भी कामना की प्यास नहीं बुझानी होती।

5. नित्य तृप्त को अपनी किसी भी योजना को पूरा नहीं करना होता।

6. नित्य तृप्त को अपने तन से जो कुछ पाना था, वह पा चुके होते हैं।

7. नित्य तृप्त को किसी विषय से कोई भी स्वार्थ सिद्ध नहीं करना होता।

8. नित्य तृप्त का कोई भी संकल्प अथवा विकल्प नहीं होता।

निराश्रितता तथा नित्य तृप्ति आत्मवान् के चिह्न हैं।

ऐसे लोग, जो तन से ही विमुक्त हो चुके हों, उनका कर्मों से क्या प्रयोजन हो सकता है? इस कारण वे कर्मों से भी संग नहीं करते। वे लोग सम्पूर्ण कर्म करते हुए भी कुछ नहीं करते।

नित्य तृप्ति की विधि :

नन्हीं! तृप्ति पाने की विधि भी जान ले :

क) निष्काम कर्म ही नित्य तृप्त होने की विधि है।

ख) निष्काम कर्म का लक्ष्य नित्य तृप्ति ही है।

ग) अपने तन को भूल कर औरों के काज करो, तो नित्य तृप्त हो जाओगे।

घ) जो विषय आपको पसन्द हैं, वह दूसरे के लिये प्राप्त करो।

ङ) जो विषय आपके पास हैं, उसे दूसरों के लिये इस्तेमाल करो।

च) जो उपभोग आपको पसन्द है, वह दूसरे के लिये दे दो।

छ) नन्हीं! एक पल में रुचिकर का त्याग कर देने से जीव तृप्त नहीं होता। पहले रुचिकर को सबके साथ मिल कर इस्तेमाल करना सीखो।

ज) शनै: शनै: रुचिकर विषय दूसरों के लिये उपार्जित करना सीखो, फिर उसे दूसरों की खुशी के लिये इस्तेमाल करने से अखण्ड तृप्ति उत्पन्न होती है।

नन्हीं! यदि यह अभ्यास करना है, तो सतर्कता से अभ्यास करो।

1. जिस भी विषय के तुम आश्रित हो, उसे दूसरों की सेवा में पेश करो।

2. जिस भी कामना के तुम आश्रित हो, वही कामना दूसरे में भी है।

हर वक्त अपनी कामना पूर्ति में लगे रहने से कामना बढ़ती है, किन्तु गर वही कामना, आप दूसरों की पूरी करने लग जाओ, तो आपकी कामना शान्त होने लगेगी और एक दिन आप तृप्त हो जाओगे।

निष्काम कर्म का भी यही प्रयोजन है। निष्काम कर्म आपको तृप्ति की ओर ले जाता है। निष्काम कर्म का प्रसाद, जो निष्काम कर्म करने वाले को मिलता है, उसी निष्काम यज्ञ का शेष, तृप्ति है।

नित्य तृप्त सब काम अच्छी तरह करते हुए भी कर्मों से नहीं बंधते। वे कर्म फल में नितांत संग रहितता के कारण कर्म से बंध नहीं सकते। वे सब करते हुए भी कुछ नहीं करते।

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