Chapter 4 Shloka 10

वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिता:।

बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागता:।।१०।।

 Freed from attachment, fear and anger,

with one-pointed absorption in Me,

having taken refuge in Me

and purified by the fire of knowledge and tapas,

many have attained My state.

Chapter 4 Shloka 10

वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिता:।

बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागता:।।१०।।

The Lord says to Arjuna, ‘I am telling you the truth! Earlier too:

Freed from attachment, fear and anger, with one-pointed absorption in Me, having taken refuge in Me and purified by the fire of knowledge and tapas, many have attained My state.

When Bhagwan speaks of those who have taken refuge in ‘Me’ and who abide in ‘Me’ with one-pointed devotion:

1. He is not referring to His body self.

2. He is referring to His Essence – the Atma, the Eternal Reality.

3. He is referring to the divine, pure, formless and blemishless Self which is beyond contemplation.

4. He is speaking of the life of one who is established in the Atma.

When a person considers the Atma to be his all and believes himself to be the Atma, his faith rests solely in the Atma. When he knows that it is only the Atma which is worthy of achievement and is prepared to leave the whole world and attachment with his own body for its attainment, then he is purified by the fire of wisdom and tapas or austerity.


1. He no longer has any attachment to his body.

2. He is no longer afraid of the death of the body.

3. He is unmindful of what will become of that body or of those whom he might lose or of any evil that might befall the body.

4. A time comes when no desires remain, thus there is no cause for anger.

5. It no longer occurs to him to reflect on what fruits his actions may bear.

6. How can he think about what his body will get, when he has broken all ties with it?

Such a one is therefore devoid of attachment, fear and anger. His life is verily the embodiment of tapas, yagya and daan.


First understand daan, then tapas and yagya will become clear to you. Such a one withdraws all claims over his own body and gives it for the service of the world along with all its potential and without any conditions. He retains no rights over his body and ‘gifts’ it to the world, irrevocably and absolutely.

Just as when charity is given, the person receiving it can do with it what he likes, so also people invariably use the Atmavaan’s body to do their jobs and fulfil their worldly aspirations.


Thereafter, the life of such a one becomes a continuous flow of tapas.

1. Since all people are basically selfish, they try to satiate their selfish desires through such a one.

2. He who has thus given his body to others, silently fulfils their demands.

3. The more efficiently and shrewdly he fulfils each task, the more jobs are thrust upon him.

4. Who bothers about the elevated state or reputation of such an Atmavaan?

5. Even the knowledge and wisdom of such a one does not get its due respect.

6. Such a one keeps devoting all his efforts towards the achievement of others’ success but claims no credit. He offers the fruit of his actions to the other. Since he claims his body no longer, what will he do with any recognition or kudos for that body?

7. The Atmavaan himself remains silent and unrecognised. Often he has to cajole and persuade the person whose job he has at hand to cooperate in the fulfilment of the task!

Bhagwan Krishna, too, is doing the same for Arjuna by becoming his charioteer. After the war, the credit for victory went to Arjuna and the Pandavas!

When such a one serves the selfish, the latter do not even take notice of his requirements, his interests, his reputation or his happiness or comfort. They are blinded by their own desires, attachments and greed. When in need of help, they are lost in their own problems, unmindful of their saviour. After their problems are resolved, they usually turn their backs on their benefactor, casting aspersions on his motives and belittling him.

And that is not all! When their needs arise again, these slanderers do not hesitate to return to the Atmavaan, who receives them back with open arms and once more engages himself on their behalf.

Little one! Here is the secret of the Atmavaan’s smiling tolerance to all ill-treatment – he is ever silent towards his own self.


For the Atmavaan, his very life is a yagya. His actions are selfless. Selflessly he employs his intellect for the wellbeing of the other. He coaxes and cajoles him for the latter’s own good. Having given his all thus, he forgets his own identity. This is his final offering in the fire of yagya.

Consider, of what consequence are feelings of attachment, fear or anger in the life of such a one? Bhagwan says, “Even in the past, many have become pure and merged in Me – the Atma.”

Little one! When the Lord says, “Having taken refuge in Me,” He is indicating, “What I have done, so must you do: become like Me. Even if the world criticises you, learn to remain silent like I do; do not blame or expose your detractors!”

अध्याय ४

वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिता:।

बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागता:।।१०।।

भगवान कहते हैं, तुझे मैं ठीक ही कहता हूँ, पहले ही :

शब्दार्थ :

१. राग, भय और क्रोध से शून्य,

२. अनन्य भाव से मुझ में स्थित हुए,

३. मेरी शरण लिये हुए, अन्य बहुत से पुरुष,

४. ज्ञान रूप तप से पावन हुए,

५. मेरे स्वरूप को प्राप्त कर चुके हैं।

तत्व विस्तार :

नन्हीं! कुछ और समझने से पहले भगवान श्री कृष्ण के कहे हुए शब्द “मेरे शरणापन्न हुए तथा अनन्य भाव से मेरे में स्थित” का अर्थ समझ ले। जब भगवान यहाँ ‘मेरे’ कहते हैं, उनका संकेत :

1. आत्मा की ओर है, तन की ओर नहीं।

2. उनके स्वरूप की ओर है।

3. परम अक्षर तत्व की ओर है।

4. दिव्य विशुद्ध आत्म स्वरूप की ओर है।

5. निराकार, निर्विकार, अचिन्त्य रूप की ओर है।

6. आत्मा में स्थित के जीवन की ओर है।


जब जीव आत्मा को ही सब मानने लगता है, अपने को आत्मा ही मान लेता है, उसकी निष्ठा आत्मा में ही हो जाती है, वह आत्मा को ही प्राप्तव्य मान लेता है; आत्मवान् बनने के लिये तन तथा पूर्ण संसार को त्यागने के लिये तैयार हो जाता है; तब वह मानो, इस ज्ञान रूपा तप से पावन हो जाता है।

तत्पश्चात् उसको :

1. तन से राग नहीं रहता।

2. तनो मृत्यु का भय नहीं रहता।

3. ‘तन का क्या होगा’, इसका ध्यान तथा भय भी नहीं रहता।

4. ‘कोई बिछुड़ जायेगा’, इसका भय नहीं रहता।

5. ‘तन को कुछ बुरा मिल जायेगा’, इसका भय नहीं रहता।

6. तन के नाते कोई कामना बाकी नहीं रह जाती, इस कारण कुछ मिले या न मिले, क्रोध नहीं आता।

7. कर्मों का क्या फल होगा, इसका ध्यान ही नहीं आता।

8. मेरे तन को क्या मिलेगा, इसका ध्यान वह क्या करे, क्योंकि उसने तो तन से नाता ही तोड़ दिया है।

इस कारण उसके पास न राग रह जाता है, न भय रह जाता है, न क्रोध रह जाता है।

क) उसका जीवन तप ही होता है।

ख) उसका जीवन यज्ञ ही होता है।

ग) उसका जीवन दान ही होता है।

दान :

नन्हीं! दान को प्रथम समझ ले, फिर तप तथा यज्ञ भी समझ सकेगी। आत्मवान् जब अपना तनत्व भाव छोड़ता है, तब वह :

क) अपना तन सम्पूर्ण गुणों के सहित संसार को दे देता है।

ख) अपने तन पर से अपने सम्पूर्ण अधिकार खेंच लेता है।

ग) अपने तन के प्रति अपना ममत्व भाव नहीं रखता।

घ) अपने तन को, बिना किसी शर्त के, दूसरों को दे देता है।

ङ) अपने तन से नितान्त अपनापन छोड़ देता है।

च) अपने तन को अपरिवर्तनीय ढंग से दूसरों को दे देता है।

छ) अपने तन को निश्चयात्मक रूप से दूसरों को दे देता है।

जैसे कोई जीवन में किसी को दान देता है, तो जिसे दान दिया, वह उस धन से जो जी चाहे करे, वैसे ही जब आत्मवान् अपना तन दे देता है, तो लोग उससे अपने काम करवाने लग जाते हैं। उन लोगों के कार्य अधिकांश सांसारिक ही होते हैं।

तप :

तत्पश्चात् उसका जीवन एक अखण्ड तप बन जाता है क्योंकि :

1. हर इन्सान स्वार्थी होता है और उस आत्मवान् के राही अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाहता है।

2. जिसने तन दे दिया, वह दूसरे के काज ख़ामोशी से करने लग जाता है।

3. वह जितनी दक्षता से काम करता है, उसे उतने ही अधिक काम मिल जाते हैं।

4. उस आत्मवान् की स्थिति की कौन परवाह करता है?

5. उस आत्मवान् के मान की कौन परवाह करता है?

6. उस आत्मवान् के ज्ञान के लिये भी उसे मान कम ही मिलता है।

7. वह आत्मवान् हर काज कर्म करके उस काज का सेहरा भी दूसरे को दे देता है; क्योंकि वह अपना तन ही दे चुका होता है! अब अपने तन के सेहरे को वह क्या करेगा? इस कारण जिसका वह काम करता है, उस काम का फल तथा नाम भी उसी को दे देता है।

8. आत्मवान् स्वयं बेनाम, गुमनाम तथा मौन ही रहता है।

9. जिसका काम वह हाथ में ले लेता है, उसी को नित्य उसी के काम के लिये मनाता भी रहता है।

नन्हीं! भगवान भी तो अर्जुन के सारथी बन कर यही कर रहे हैं। उनके काल में युद्ध विजय का सेहरा अर्जुन तथा पाण्डवों को मिला था। जब वे चाकरवत् दूसरे के काम करते हैं तो स्वार्थी लोग:

क) इनकी ओर देखते भी नहीं।

ख) इनकी रुचि या अरुचि की परवाह भी नहीं करते।

ग) इनके मान या अपमान की भी परवाह नहीं करते।

घ) इनके सुख या चैन की परवाह नहीं करते।

नन्हीं! स्वार्थी गण कामना पूर्ण होते हैं, मोह से अन्धे होते हैं, लोभ, तृष्णा से पूर्ण होते हैं और अन्धकार से बन्धे हुए होते हैं। उन्हें तो केवल अपने से मतलब होता है। जब तक काम थे, अपने रहनुमा की परवाह न करके अपने में मस्त रहे; काम निकल गया, तो वह अधिकांश इन्हें ठुकरा देते हैं, इन पर तोहमत लगा देते हैं, मूर्ख ठहरा देते हैं।

इतना ही नहीं नन्हीं! जब पुन: काम पड़ता है, तब वही कलंक लगाने वाले, इन्हीं के पास लौट आते हैं और यह अपने तन का दान दिये हुए आत्मवान् गण, उन्हें फिर से गले लगा लेते हैं और उनके काम करने लग जाते हैं।

नन्हीं! यह राज़ है कि वह सब मुसकरा कर सह लेते हैं। वह अपने प्रति नित्य मौन रहते हैं।

यज्ञ :

ऐसों का जीवन ही यज्ञ होता है। वे निष्काम कर्म करते हैं; वह निष्काम भाव से दूसरों के लिये अपनी बुद्धि भी दान में दे देते हैं। वे निष्काम भाव से दूसरों को, दूसरों के लिये मनाते हैं। जब वे अपना सर्वस्व दे देते हैं, तब वे अपने आपको भी भूल जाते हैं। अपने आपकी नितान्त विस्मृति ही यज्ञ की अन्तिम आहुति है।

अब सोच लो, ऐसे भगवान के स्वरूप को प्राप्त किए हुए के लिये राग, भय या क्रोध क्या प्रयोजन रख सकते हैं? भगवान कहते हैं, ‘हे अर्जुन! कई लोग इस तरह से पावन होकर मेरे स्वरूप, यानि आत्मा में लीन हो चुके हैं।’

नन्हीं! भगवान का यहाँ ‘मेरी शरण में आ’ कहने से यही अभिप्राय है कि :

1. जो मैंने किया, सो तू कर।

2. जैसा मैं हूँ, तू वैसा बन।

3. जग तो कलंक लगायेगा ही, तू मेरी तरह मौन रहा कर।

4. कलंक लगाने वालों को भी कलंकित न कर।

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