Chapter 4 Shloka 39

श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्पर: संयतेन्द्रिय:।

ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति।।३९।।

Knowledge is obtained by a man of deep faith,

one who has mastery over the senses

and who is ever engaged in practice;

having obtained this knowledge,

he immediately attains supreme peace.

Chapter 4 Shloka 39

श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्पर: संयतेन्द्रिय:।

ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति।।३९।।

Now the Lord describes the qualities of that elevated sadhak who attains supreme peace through knowledge:

Knowledge is obtained by a man of deep faith, one who has mastery over the senses and who is ever engaged in practice; having obtained this knowledge, he immediately attains supreme peace.

Now the Lord specifies the qualities of a sadhak who can attain supreme peace.

He must possess faith – Shraddha (श्रद्धा)

1. Shraddha is a deeply ingrained faith in the Lord.

2. It is an elevated and worshipful attitude.

3. It is qualified by an abiding respect and deep conviction.

4. Shraddha implies an unfailing love for the object of one’s faith.

5. It is a deep attachment with any quality which one tries to imbibe in one’s life at any cost.

How will a man of faith conduct himself in life?

1. Such a one is prepared to:

­­–  make every effort;

­­–  face all adversities;

­­–  renounce or embrace any object in the world
which will bring him closer to the object of his faith.

2. Faith imparts the determination to:

­­–  endure great sorrows;

­­–  be impartial towards respect and insult;

­­–  be unmindful of the opinion of others;

­­–  make unceasing effort to attain one’s goal.

3. The faithful one makes all efforts to:

­­–  procure knowledge in order to discover the viewpoint of the Beloved;

­­–  to imbibe those qualities in which he has faith.

4. The only objective of the faithful one is to delight his Beloved.

What will be the attitude of a seeker who has faith in Lord Krishna, and what is he prepared to do?

a) Such a one will be prepared to surrender his entire life to his Lord.

b) His happiness, his desires, his concepts and beliefs will all be sacrificed in a moment.

c) Nothing will be too low or degrading for him to do in the service of the Lord.

d) He will be prepared to spend his entire life in the intoxication of self forgetfulness.

e) He will be prepared to suffer the pangs of separation from the Beloved all life long.

f) He will be ready to embrace poverty for the sake of his Lord.

g) He will be ready to embrace kingship for the sake of his Lord.

h) He will be ready to give every breath of his life for his Lord.

i)  In fact, he will live his whole life with a body which will have no more meaning for him than a corpse.

Faith of a devotee of Lord Krishna towards the Gita

1. The Gita is Lord Krishna’s injunction, not advice.

2. A devotee of the Lord will believe each tenet to be the Lord’s specific command.

3. He knows the Gita contains the method for the aspirant to follow in the Lord’s own footsteps, explained by the Lord Himself.

4. The one with faith will consider it his dharma to become the embodiment of each and every tenet of the Gita. For him each word of the Gita becomes a mantra – to hear and to immediately put into practice.

The aspirant must be ever prepared – Tatpar (तत्पर);

1. Such a one will always be devoted to the Lord.

2. Such a one has sought refuge in his Divine Preceptor and considers Him to be the only One worth knowing.

3. He is ever engaged in the Lord’s work.

4. His entire life is devoted to the Lord’s service.

5. He has a strong affinity for the Supreme qualities.

6. He leaves everything in his life to the Lord and His qualities.

7. He is a relentless follower of the Lord and His attributes.

Tatpar connotes seeking the refuge of the Lord’s qualities in practical life.

A person with faith will necessarily adhere to the Truth.

a) One who has faith in the Lord and has sought refuge in Him will achieve detachment and selflessness.

b) He will embrace selfless actions.

c) He will necessarily give his body in charity for the wellbeing of others.

d) His will be a life of yagya.

e) He will be able to abandon all his desires, beliefs and concepts in a moment.

f) All his sense organs will be completely under his control and directed in the service of the Lord.

Thus such an aspirant can be said to be Samyat Indriya (संयतेन्द्रिय) or one with his organs of perception and action under his control. Such a one who is the Master of his senses, necessarily directs them towards the elevated path of spiritual living. His sense organs are ruled by his intellect rather than the mind.

Little one, it is only such a one who has faith, is a follower of Truth and a master of his senses, who can attain the Supreme Knowledge. Having obtained this knowledge, he abides in peace.


श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्पर: संयतेन्द्रिय:।

ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति।।३९।।

अब भगवान उस श्रेष्ठ साधक के गुण कहते हैं, जो ज्ञान पाकर परम शान्ति को पाते है :

शब्दार्थ :

१. श्रद्धावान्, तत्पर, जितेन्द्रिय पुरुष, ज्ञान को पाते हैं।

२. ज्ञान को प्राप्त होकर वे शीघ्र ही परम शान्ति को प्राप्त होते हैं।

तत्व विस्तार :

नन्हीं लाडली जान्! अब भगवान परम शान्ति को पाने वाले साधक के गुण कहते हैं। उसे ‘श्रद्धावान्, तत्पर तथा जितेन्द्रिय’ होना चाहिये, तब वह शान्ति पा सकता है।

श्रद्धा :

श्रद्धा का अर्थ है :

1. भक्तिपूर्ण, अगाध विश्वास।

2. उच्च और पूज्य भाव।

3. दृढ़ निष्ठा का होना।

4. किसी से पूर्ण रूप से प्रेम करना।

5. किसी गुण से इतनी लग्न हो जाना, कि उसको अपने जीवन में लाने के लिये, जीव पूर्ण परिश्रम करने को तैयार हो।

6. सम्मान तथा प्रबल उत्कृष्ट निष्ठा या आस्था।

अब नन्हीं! यह समझ ले कि श्रद्धावान् जीवन में क्या करेगा? अपने श्रद्धास्पद् को पाने के लिये वह:

क) कोई भी परिश्रम करने के लिये तैयार होगा।

ख) कोई भी कष्ट उठाने को तैयार होगा।

ग) संसार के किसी भी विषय को त्यागने अथवा अपनाने के लिये तैयार होगा।

1. महान् दु:ख भी सहने को तैयार होगा।

2. मान अपमान की परवाह नहीं करेगा।

3. लोक लाज की परवाह नहीं करेगा।

4. स्वयं निरन्तर प्रयत्न करेगा।

5. अपने श्रद्धास्पद् का दृष्टिकोण अपनाने के लिये ज्ञान पाने का यत्न करेगा।

6. जिन गुणों में श्रद्धा है, उन्हें अपने में लाने के यत्न करेगा।

7. अपने श्रद्धास्पद् को रिझायेगा तथा मनायेगा।

कृष्ण में श्रद्धापूर्ण का मानसिक दृष्टिकोण :

अब नन्हीं! यह समझ! यदि भगवान कृष्ण में श्रद्धा होगी तो उनके सच्चे भक्त का क्या दृष्टिकोण होगा और वह क्या क्या करने के लिये तैयार होगा?

क) वह अपना पूर्ण जीवन उन पर अर्पित करने के लिये तैयार होगा।

ख) अपनी हर खुशी, चाहना, मान, बल्कि अपना सर्वस्व तक उन पर अर्पित करने को तैयार होगा।

ग) अपनी मान्यतायें उन पर अर्पित करने को तैयार होगा।

घ) उनके लिये संसार में छोटे से छोटे काम करने को तैयार होगा और न्यून कार्य का बीड़ा भी उठाने को तैयार होगा।

ङ) उनके लिये जीवन भर बेख़ुदी में रहने के लिये तैयार होगा।

च) उनके लिये संसार में जीवन भर तड़पता रहने के लिये तैयार होगा।

छ) उनके लिये जीवन भर भिखारी बन कर रहने को तैयार होगा।

ज) उनके लिये जीवन भर राजा बन कर रहने को तैयार होगा।

झ) उनके लिये जीवन भर अपने प्राण न्योछावर करने को तैयार होगा।

ञ) उनके लिये जीवन भर जीते हुए भी मृतक के समान रहने को तैयार होगा।

कृष्ण में श्रद्धा रखने वाले का गीता के प्रति दृष्टिकोण :

1. गीता भगवान कृष्ण का आदेश है, उपदेश नहीं।

2. गीता कृष्ण की आज्ञा है।

3. गीता कृष्ण के पद अनुसरण की विधि है, जो भगवान ने स्वयं कही है।

4. गीता भगवान कृष्ण के मुखारविन्द से कही हुई जीवन में अनुष्ठान करने की प्रणाली है।

5. गीता श्रीकृष्ण में श्रद्धा रखने वाले के जीवन में अनुसरणीय विवरण है।

6. गीता साधक के लिये साक्षात् भगवान की वाणी है और गीता की प्रतिमा बनना ही उसका धर्म हो जाता है। इसी कारण, साधक के लिये गीता का एक एक वाक् मन्त्र होता है और वह उसे सुनते ही पल में वही रूप धर लेता है। वह उसे जीवन में धारण कर लेता है तथा उसकी प्रतीमा बन जाता है।

तत्पर :

1. तत्पर से अर्थ, ‘भगवान के परायण’ समझना चाहिये।

2. तत्पर से अर्थ है, भगवान के शरणागत।

3. भगवान को ही सर्वोत्तम ज्ञातव्य मानने वाले को ‘तत्पर’ कहते हैं।

4. भगवान में आश्रय लिये हुए, तथा भगवान में अगाध श्रद्धा रखने वाले को तत्पर कहते हैं।

5. ऐसा जीव भगवान के ही कार्य विशेष में लगा हुआ होता है।

6. वह भगवान के लिये ही जीवन व्यतीत करने वाला होता है।

7. वह जीवन में परम गुणों के परायण होता है।

8. उसकी परम गुणों से प्रगाढ़ आसक्ति है। वह जीवन में सब कुछ भगवान के गुणों पर छोड़ देता है।

9. वह भगवान का अनुसरण करता है।

तत्परता का अर्थ है, जीवन में भगवान के गुणों का आसरा लेना।

अब नन्हीं! यह समझ ले कि जो श्रद्धावान् होगा, वह सत्यपरायण होगा ही। भगवान में श्रद्धा हो और फिर जीव उनके परायण हो, तब तो वह :

क) निरासक्ति और निसंगता का व्रत धारण कर ही लेगा।

ख) निष्काम भाव से कर्म करने का व्रत धारण कर ही लेगा।

ग) अपने तन का दान दे ही देगा।

घ) जीवन को यज्ञमय बनाने का व्रत धारण कर ही लेगा।

ङ) अपनी सम्पूर्ण मान्यताओं को पल में छोड़ ही देगा।

च) अपनी सम्पूर्ण कामनाओं को पल में छोड़ ही देगा।

छ) अपने प्रति नित्य उदासीन हो ही जायेगा।

ज) सम्पूर्ण इन्द्रियाँ अपने वश में कर ही लेगा, क्योंकि वह भी तो भगवान की सेवा में लग जायेंगी।

संयतेन्द्रिय :

संयतेन्द्रिय का अर्थ है :

1. जिसकी इन्द्रियाँ उसके वश में हैं।

2. इन्द्रियों को नियम बद्ध करना।

3. जिसकी इन्द्रियाँ उसके पराधीन हों।

4. जो अपनी इन्द्रियों पर अंकुश लगाये हुए हो।

5. जो अपनी इन्द्रियों को श्रेय पथ की ओर ले जाता है।

6. जो अपनी इन्द्रियों का संयोग मन से न रख कर, बुद्धि से रखता हो।

मेरी आत्म स्वरूप नन्हीं रूप! भगवान कहते हैं, ऐसे लोग, यानि श्रद्धावान्, सत्यपरायण तथा संयतेन्द्रिय पुरुष ही ज्ञान को पाते हैं। जब वे यह ज्ञान पा लेते हैं, तत्पश्चात् वे शीघ्र ही शान्ति को पा लेते हैं।

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