Chapter 14 Shloka 19

नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति।

गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति।।१९।।

The Lord says: When the perceiving witness

can see no other agent as the doer

apart from the qualities, and thus knows

the Atma which transcends the qualities,

that one attains My state.

Chapter 14 Shloka 19

नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति।

गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति।।१९।। 

The Lord says:

When the perceiving witness can see no other agent as the doer apart from the qualities, and thus knows the Atma which transcends the qualities, that one attains My state.

Gunas interact with each other and nothing lies in the control of the individual. The inert qualities, which are the gift of the threefold attributes of nature, influence each other and the world progresses. When one realises this, one will understand that:

1. Gunas are the influencing force;

2. Gunas are the agent of change;

3. Gunas encourage one;

4. Gunas cause discouragement;

5. Gunas attract;

6. Gunas induce avarice;

7. Gunas control an individual;

8. Gunas cause turmoil within an individual;

9. Gunas incense an individual;

10. Gunas support an individual;

11. Gunas cause repulsion;

12. Gunas cause one to renounce;

13. Gunas torment one;

14. Gunas cause one to follow blindly;

15. Gunas make a person a friend;

16. Gunas cause partiality;

17. Gunas proffer support;

18. Gunas cause a complete severance of relationships.

The qualities of one person influence the qualities of another. Someone’s qualities draw one human being closer to him, whereas they repel some other human being. The qualities of one individual cause pain to some and immense joy to some others. The combination of qualities of one individual generates greatness in one person and evil in another.

All this is dependent on gunas. An ordinary man finds it difficult to determine which quality will influence whom in what way.

a) Every object is comprised of the three gunas.

b) Every spoken word is comprised of the three gunas.

c) Every deed is a combination of the same three gunas.

All these possess certain qualities. Qualities can be supportive, qualities can augment other qualities whereas other qualities can destroy certain other qualities.

He who knows that this entire world is governed by qualities and that qualities are the agent of each deed performed:

1. Such a one can never blame another being.

2. He shall become the embodiment of forgiveness.

3. He shall become compassion itself.

4. Mercy and humility shall be his characteristics.

5. He shall remain uninfluenced by any attack on his being.

He knows that nobody is to blame for any of their deeds since this world is a play of gunas.

The ignorant and the foolish however do not know the truth of this matter. Believing themselves to be the doer they become slaves of the gross qualities. They are completely controlled and led by their qualities. He who understands this mystery of the gunas through experience also knows that the essence of the Atma lies beyond these qualities.

He who knows thus:

a) identifies with the knowledge that has illuminated him;

b) has renounced all attachment with the gunas;

c) eventually transcends the body idea;

d) will never again claim any actions born of qualities;

e) will become free of doership;

f) will realise that it is the gunas which enjoy other gunas. Thus his pride in his gunas will cease to exist.

This path also ultimately leads him to the attainment of the supreme state. The Lord will then take the place of the ‘I’ which had ruled so far.

Little one, repeated proclamations of being the doer does not make this a fact. Similarly, even if one repeatedly disclaims the Atma, it can never change the fact that one is essentially the Atma!

a) All beings are the Atma – even though they may not have attained the status of an Atmavaan as yet.

b) All beings are the Atma – even though they may not understand this Truth.

c) All actions are an interplay of the qualities – whether people believe this or not.

Facts cannot change to suit the beliefs of man. The only difference is that the man of wisdom knows this Truth and follows it in life. Such a one knows that nobody is to blame for their deeds. Thus he views all with equanimity and is able to endure all types of people.

In actual fact, he sees nobody and endures nothing. These are all mere words to describe the state of such a one. He Himself is Truth Itself. The Lord Himself says, “Such a one attains Me.”

अध्याय १४

नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति।

गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति।।१९।। 

देख भगवान कहते हैं :

शब्दार्थ :

१. जब देखने वाला दृष्टा,

२. गुणों के सिवा अन्य कोई कर्ता नहीं देखता

३. और गुणों से परे जो आत्मा है, उसे जानता है,

४. वह मेरे भाव को प्राप्त होता है।

तत्त्व विस्तार :

देख नन्हीं! गुण गुणों में वर्त रहे हैं, जीव के अपने हाथ में कुछ नहीं है। जड़ गुण, जो त्रिगुणात्मिका शक्ति की देन हैं, आपस में एक दूसरे को कार्यान्वित कर रहे हैं। जब जीव यह जान लेता है तो वह यह भी जान लेता है कि :

1. गुण प्रभावित करते हैं,

2. गुण परिवर्तित करते हैं,

3. गुण उत्साहित करते हैं,

4. गुण निस्तेज करते हैं,

5. गुण आकर्षित करते हैं,

6. गुण प्रलोभित करते हैं,

7. गुण वशीभूत करते हैं,

8. गुण विचलित करते हैं,

9. गुण उत्तेजित करते हैं,

10. गुण समर्थन देते हैं,

11. गुण प्रतिकर्षित करते हैं,

12. गुण परित्याग करते हैं,

13. गुण तड़पाते हैं,

14. गुण अंध अनुयायी बनाते हैं,

15. गुण मित्र बनाते हैं,

16. गुण पक्षपाती बनाते हैं,

17. गुण सहयोगी बनाते हैं,

18. गुण विच्छेद करवाते हैं,

अन्य विषयों के गुणों को प्रभावित करते हैं। यानि, एक व्यक्ति के गुण दूसरे व्यक्ति को प्रभावित करते हैं।

किसी व्यक्ति के गुण किसी अन्य व्यक्ति को उससे दूर कर देते हैं और किसी अन्य को उसके पास ले जाते हैं। किसी व्यक्ति के गुणों के कारण कोई दुःखी हो जाता है और कोई सुखी हो जाता है।

किसी व्यक्ति के गुणों के कारण कोई श्रेष्ठ बन जाता है और कोई निकृष्ट बन जाता है।

भाई! यह सब गुणों पर आश्रित है। कौन सा गुण किसको कैसे प्रभावित करेगा, यह साधारण जीव के लिये समझना कठिन है।

– हर विषय में त्रैगुण हैं,

– हर वाक् में त्रैगुण हैं,

– हर कर्म में त्रैगुण हैं।

सब में ही गुण हैं। गुण सहयोगी भी हैं; गुण गुण वर्धक भी हैं; गुण गुण वर्जक भी हैं।

जो यह जान ले कि पूर्ण संसार पर गुण ही राज्य करते हैं, गुण ही विषयों से सब कुछ करवा रहे हैं, वह :

1. किसी को दोष नहीं लगायेगा।

2. क्षमा स्वरूप आप हो ही जायेगा।

3. करुणापूर्ण आप हो ही जायेगा।

4. अनुकम्पा और अनुग्रह पूर्ण हो ही जायेगा।

5. अपने ऊपर जो कोई भी प्रहार करे, उस प्रहार के प्रति उदासीन हो जायेगा।

क्योंकि वह जानता होगा कि किसी का दोष नहीं है, यह संसार गुणों का खिलवाड़ है।

अज्ञानी, मूर्ख, जानते नहीं कि क्या हो रहा है। अपने को कर्ता मानते हुए ये जड़ गुणों के नौकर होते हैं। इन्हें इनके गुण विवश खेंचे लिये जा रहे हैं। जो अनुभव सहित गुण राज़ को समझेगा, वह जान जायेगा कि स्वरूप इन सब गुणों से परे हैं।

जो ऐसा जानता है :

1. वह ज्ञान के तद्‍रूप होकर ही जानता है।

2. वह गुणों से संग छोड़ कर ही जानता है।

3. यानि वह तनत्व भाव से उठ ही जायेगा।

4. वह पुनः जड़ गुण, कर्म नहीं अपनायेगा।

5. वहाँ कर्तृत्व भाव का अभाव हो ही जायेगा।

6. गुणों के भोक्ता भी गुण ही हैं; जो यह जान जायेगा, उसका गुण अभिमान मिट ही जायेगा।

इस राह से भी जान लो, वह परम को ही पायेगा। ‘मैं’ की जगह वहाँ भगवान ही रह जायेगा।

नन्हीं! कोई लाख कहे कि वह स्वयं कर्ता है, इससे वह कर्ता नहीं बन जाता। कोई लाख कहे कि वह आत्मा नहीं है, इससे वह आत्मा रहित नहीं हो जाता।

क) सम्पूर्ण भूत आत्मा ही हैं, चाहे वे आत्मवान् नहीं हैं।

ख) सम्पूर्ण भूत आत्मा ही हैं, चाहे वे इसे समझते नहीं हैं।

ग) सम्पूर्ण लोगों के कर्म गुणों के ही खिलवाड़ हैं, चाहे वे यह मानते नहीं हैं।

उनके मानने या न मानने से हक़ीकत तो नहीं बदल सकती। भेद केवल इतना है कि ज्ञानवान यह जानते हैं और इसे जीवन में मानते हैं। ज्ञानवान जानते हैं कि किसी का कोई दोष नहीं; इस नाते वे सबको सम भाव से देखते हैं और वे सबके गुणों को सह लेते हैं।

वास्तव में वे न किसी को देखते हैं और न कुछ सहते हैं। यह भी कहने को ही कह रहे हैं।

वे तो सत् स्वरूप हैं और भगवान भी कहते हैं – ‘ऐसे लोग मुझे ही पाते हैं।’

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