Chapter 14 Shloka 7

रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासंगसमुद्भवम्।

तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसंगेन देहिनम्।।७।।

The innate nature of the attribute of rajas

is raag or passion. This is the

originating source  of desire and attachment.

 O Arjuna, know that this attribute binds

the embodied soul with attachment to action.

Chapter 14 Shloka 7

रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासंगसमुद्भवम्।

तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसंगेन देहिनम्।।७।।

Know also Arjuna:

The innate nature of the attribute of rajas is raag or passion. This is the originating source of desire and attachment. O Arjuna, know that this attribute binds the embodied soul with attachment to action.

Rajas guna

1. This quality promotes desire and greed.

2. Wherever one is attracted, greed erupts.

3. This attribute causes one to take pleasure in the gross.

4. Due to the effect of this attribute, the mortal being is immersed in thoughts of objects.

5. It is this attribute which makes the individual a partaker of gross objects.

6. One who possesses this attribute pursues the attainment of gross objects with great vigour and effort.

7. Desire and anger are born of this very attribute.

8. Duality and aberrations are its offspring.

9. The bondage of hope is caused by this attribute.

10. This attribute intensifies the thought processes.

11. Remorse and mental agony are caused by this attribute.

12. This attribute seeks satiation even at the cost of another’s sorrow.

13. It is ever unsatiated.

14. It is replete with pride and arrogance.

15. It directs the intellect towards preya or the path of degradation.

16. It uses knowledge for the satiation of desire.

17. The love of one imbued with rajas is only for his own desire fulfilment.

18. The one who possesses this attribute desires that others worship him.

19. He does not even know the term selfless action.

20. This attribute is predominantly egoistic.

21. This attribute knows how to become humble for the fulfilment of its desires and resumes its arrogant stance after its desire has been fulfilled.

22. This attribute is an enemy of man.

23. It waylays the spiritual aspirant from his chosen path.

24. It is extremely deceitful.

25. What the face shows is very different from what the mind actually thinks and feels – that is the attribute of rajas.

26. The attribute of rajas emerges when the Truth is suppressed.

27. It is a phenomenal sinner.

28. It gives rise to intense cravings that can never find fulfilment.

In order to be fulfilled, this attribute of rajas:

a) makes a pretence of pursuing spiritual disciplines;

b) organises great Yagyas or sacrificial offerings;

c) even worships and shows reverence to saints;

d) donates to charities;

e) renders acts of service;

f) acts to further the cause of dharma;

g) studies the holy books and scriptures.

However little one, all this is done in order to satiate some selfish whim and for self-establishment.

Often, the one who possesses the quality of rajas may seem to adhere to the principles of dharma. In reality, this too, is done in order to fulfil some selfish aim. Such a one gives respect to others in order to gain respect for himself. Even acts of service to his own parents are performed in order to gain applause and approval; and with this end in view, he may even humble himself. However, such a one neither wishes to become like the Lord, nor do the qualities of the Lord inhere in him. Such a one covets only recognition, wealth and prosperity.

Such people are extremely shrewd and clever and attain expertise in many branches of learning. They are very competent and ever engaged in many projects. They earn an exalted reputation in the world and perform great deeds. They are extremely useful to all and very hard working.

But listen Kamla!

1. Such a person does not know the meaning of compassion.

2. He is oblivious to selflessness and gentleness.

3. He loves only himself.

4. His desires define his religion.

5. He is proud of his intellect and considers only his own understanding to be correct.

The one in whom rajas predominates, is the slave of desire; he worships at the altar of greed and craving. He absolves himself of all blame while justifying:

a) all his acts of injustice;

b) all his wickedness;

c) all his cruelty;

d) all his evil deeds;

e) all his pretences.

The intellect that justifies and supports such acts of injustice, sin, arrogance and tyranny is the product of rajas.

The rajoguni or the one in whom the quality of rajas is predominant, is greedy for personal establishment and recognition in all that he does.

1. He is joyous when others’ reputations are tarnished.

2. Such actions do not cause him shame – it is a mere game for him to ruin the reputation of others.

3. Such a one never reaches out to save someone from his downfall. In fact he is instrumental in the furtherance of that person’s destruction.

He makes plans for the benefits he can derive from others and takes advantage of their paucity of wealth and means.

In fact, it could be said that rajoguna is one’s greatest enemy.

a) This attribute causes the greatest sorrow.

b) It destroys the peace of the home.

c) It turns children against their parents.

d) It causes parents to become enemies of their children.

e) It is the cause of sedition and disloyalty towards one’s country.

f) It wrecks even prosperous, happy homes.

g) It causes the decline of the great, the downfall of even saints and sages.

अध्याय १४

रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासंगसमुद्भवम्।

तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसंगेन देहिनम्।।७।।

आगे सुन अर्जुन :

शब्दार्थ :

१. रजोगुण, राग रूप स्वभाव वाला है।

२. यह तृष्णा और संग का उत्पत्ति स्थान है।

३. हे अर्जुन! तू ऐसा जान!

४. वह इस देही को कर्म के संग से बांधता है।

तत्त्व विस्तार!

रजोगुण :

भगवान कहते हैं कि,

1. रजोगुण, लोभ और तृष्णा को उत्पन्न करता है।

2. जहाँ रुचि हुई, वहाँ लोभ उठ आता है।

3. यह गुण स्थूल में रमण करवाता है।

4. इस गुण के प्रभाव से जीव विषय चिन्तन में पड़ता है।

5. यह गुण जीव को विषय भोगी बनाता है।

6. रजोगुणी, बहु चेष्टा कर, बहु यत्न से विषय उपलब्धि में लगा रहता है।

7. काम, क्रोध इसी गुण से उत्पन्न होते हैं।

8. द्वन्द्व और विकार इसी की देन हैं।

9. आशा इस गुण का दिया हुआ बंधन है।

10. संकल्प, विकल्प प्रधान यही गुण है।

11. क्षोभ, मनोव्यथा उत्पन्न करने वाला यही गुण है।

12. दूसरे को दु:ख देकर भी यह गुण अपनी तृप्ति चाहता है।

13. नित्य अतृप्त रहने वाला यही गुण है।

14. दम्भ, दर्प पूर्ण यह गुण होता है।

15. बुद्धि को भी यह गुण प्रेय पथ गामिनी बना देता है।

16. ज्ञान को यह गुण अपनी कामना पूर्ति के लिए इस्तेमाल करता है।

17. रजोगुणी का प्रेम अपनी ही तृष्णा पूर्ति से होता है।

18. रजोगुणी अपना ही साकार पूजन चाहता है।

19. इस गुण से सम्पन्न व्यक्ति निष्काम कर्म का नाम नहीं जानता।

20. यह गुण अहं प्रधान है।

21. यह गुण अपनी कामना पूर्ति के लिये झुक जाता है और अपनी कामना पूर्ति के पश्चात पुन: अकड़ जाता है।

22. यह गुण जीव का महा वैरी है।

23. यह साधक को पथ भ्रष्ट करने वाला है।

24. यह सबसे बड़ा धोखेबाज़ है।

25. मुख पे और, मन में और, यह रजोगुणी ही है।

26. यह रजोगुण सत् को दबा कर उत्पन्न होता है।

27. महा पापी है रजोगुण।

28. जो कभी शान्त न हो सके, यह रजोगुण ऐसी तृष्णा उत्पन्न कर देता है।

निज चाहना पूर्ति के कारण रजोगुणी :

क) धर्म के अनुष्ठान का ढोंग रचाता है।

ख) महायज्ञ भी करवाता है।

ग) साधुगण पूजन भी कर लेता है।

घ) बहु दान भी दे देता है।

ङ) बहु सेवा भी कर लेता है।

च) धर्म अर्थ काज भी कर लेता है।

छ) बहु शास्त्र अध्ययन भी कर लेता है।

किन्तु नन्हीं! यह सब अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए करता है। यह सब केवल अपनी स्थापना के लिए करता है।

कभी कभी रजोगुणी बहु कर्तव्य परायण भी दिखते हैं। वास्तव में यह भी वे अपने स्वार्थ को सिद्ध करने के लिए ही करते हैं। अपना मान बढ़ाने के लिए वे दूसरों को मान भी देते हैं। अपनी इज्ज़त बढ़ाने के लाए वे माँ बाप की सेवा भी करते है और कभी कभी झुक भी जाते हैं। किन्तु वे न ही राम जैसा बनना चाहते हैं, न ही उनमें भगवान के गुण वास करते हैं। वे तो केवल अपने मान, धन इत्यादि के लोभी होते हैं।

रजोगुणी अतीव दक्ष और चतुर भी होते हैं और अनेकों विद्याओं को भी सीख लेते हैं। वे अतीव प्रवीण भी होते हैं और हर वक्त कार्यों में लगे रहते हैं। रजोगुणी जग में बहुत नाम कमाते हैं और बड़े बड़े काम करते हैं। वे बड़े उपयोगी होते हैं और बड़े परिश्रमी भी होते हैं।

पर सुन कमला!

1. करुणा का यह नाम नहीं जानते।

2. निष्कामता, कोमलता यह नहीं जानते।

3. प्रेम इन्हें केवल अपने से ही होता है।

4. इनकी चाहना ही इनका धर्म है।

5. यह अपनी बुद्धि पर नाज़ करते हैं और केवल अपनी बुद्धि को ठीक मानते हैं।

रजोगुणी कामना का नौकर है; तृष्णा लोभ का पुजारी है।

क) यह अपने हर अन्याय को,

ख) अपनी हर दुष्टता को,

ग) अपनी हर क्रूरता को,

घ) अपने हर दुराचार को,

ङ) अपने हर मिथ्याचार को,

न्याय युक्त सिद्ध करता है और अपने आप को दोष विमुक्त कर देता है। अपने किए हुए अन्याय की समर्थक, पाप समर्थक, अपने दम्भ, अत्याचार की समर्थक बुद्धि, रजोगुण की ही देन है।

रजोगुणी, अपनी स्थापना और मान के लोभी होते हैं।

1. किसी का मान हरते हुए देख कर वे मुदित होते हैं।

2. किसी का मान हरते हुए देख कर उन्हें लाज नहीं आती। औरों का मान हरना उनका खेल है।

3. रजोगुणी गिरते हुए का हाथ नहीं थामते, गिरे हुए को वह और गिराते हैं।

दूजे से जो भी अपना लाभ हो सके, उसके योजन बनाते हैं और दूसरे की निर्धनता का भी लाभ उठाते हैं।

भाई! क्या कहें रजोगुणी के गुण, वह वास्तव में आपका महा वैरी है।

क) सबसे बड़ा दु:ख उत्पन्न करने वाला यह रजोगुण है।

ख) घर की शान्ति का भंजक यह रजोगुण है।

ग) बच्चों को जो दुश्मन बनाता है, वह यह रजोगुण ही है।

घ) माँ बाप को जो दुश्मन बनाता है, वह यह रजोगुण ही है।

ङ) देश द्रोही, देश घातक, यह रजोगुण ही है।

च) हरे भरे घर को तोड़ देता है यह रजोगुण।

छ) यह महा श्रेष्ठ को उसकी श्रेष्ठता से गिरा देता है; साधु का भी पतन करा देता है। कमला! बस यही रजोगुण है।

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