Chapter 14 Shloka 11

सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते।

ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत।।११।।

When light and knowledge emerge

from every aperture of this body,

then one should know that

the attribute of sattva is on the ascendant.

Chapter 14 Shloka 11

सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते।

ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत।।११।।

Bhagwan says to Arjuna, “Let me now tell you of the attribute of sattva.”

When light and knowledge emerge from every aperture of this body, then one should know that the attribute of sattva is on the ascendant.

The Lord says, “Know that the attribute of sattva is on the increase when:

a) Light and knowledge burst forth from every pore of the body.

b) Knowledge flows out to whomsoever comes into contact with such a one, and this knowledge increases continuously.”

What is Gyan or knowledge?

1. The eradication of ego is knowledge.

2. The eradication of vanity is knowledge.

3. Simplicity is true knowledge.

4. Forgiveness is knowledge.

5. Compassion is knowledge.

6. Absence of any rights over others is true knowledge.

7. Absence of hatred is knowledge.

8. Absence of enmity is knowledge.

9. Friendship is knowledge.

10. Equanimity is knowledge.

As a consequence:

a) Joy sprouts forth.

b) One experiences Truth.

c) One begins to understand Truth.

d) True knowledge emerges.

e) Detachment occurs.

f) One begins to understand the essence of indifference to oneself.

These are the characteristics of light.

The one who abides in the attribute of sattva possesses equanimity.


1. The one who possesses equanimity remains impartial towards both good and bad.

2. Such a one is not affected by feelings of attraction or repulsion.

3. The one in whom the attribute of sattva predominates retains his equanimity in both indulgence in and abstinence from action.

4. He remains tranquil even in the midst of the noise and bustle of the world.

5. Even though he is extremely shrewd and clever in the performance of all duties, he strives to acquire the attitude of a non-doer.

6. He practices total indifference towards the assaults of the world.

7. He practices total indifference towards both recognition and humiliation.

The consequences of equanimity

a) Thus he attains complete satiation.

b) He attains an attitude of indifference towards his personal self.

c) He becomes faultless.

d) He becomes devoid of attachment.

Having achieved stability in such practice, such a one emanates the light of knowledge. He is able to discern between Truth and untruth and approach a realisation of the Essence that lies beyond both these. This is the grace of the attribute of sattva.

However, one must remember that sattva must flow from every pore of the being; it must germinate in every ‘opening’. Those who abide in the attribute of sattva dwell in divinity, and their life is a flow of this treasure of divinity. They become oblivious to their personal mind and body unit and engage themselves in selfless deeds performed for others’ welfare. They are embedded in the attribute of sattva.

Those who are truly established in the Truth proceed towards the realm of selfless deeds, selfless worship and selfless knowledge. They approach even the Divine Master in order to give to Him – not to take anything from Him. They wish to return to the Lord what is rightfully His.

1. Thus they return the body to the Lord.

2. They place their mind as an offering at the Lord’s feet.

3. They seek to annihilate their individualistic attitude.

4. They do not wish for self-establishment – they wish to establish the Lord in the temple of their body.

5. They do not seek to be the master – their goal is to be a good servitor.

They have set out to give their body to the Lord – not to become the Lord! However, the Lord acquires a living form through their qualities.

a) Through their body they invoke the presence of the Lord.

b) The Lord is about to take up His abode in such a body.

c) The Lord is being brought to life through such a body.

When there is a complete annihilation of the body idea, the body no longer belongs to the ‘I’ or ego self – for such a one is devoid of egoistic individuality. That body, devoid of the impurity of the ‘I’, becomes the instrument for the manifestation of the divine.

However little one, such a state transcends the state of one who abides in the attribute of sattva. He who abides in sattva is attached to knowledge and light. When he transcends even the attribute of sattva, he becomes divine – no longer does he remain a mere mortal.

The divine attitude is an offspring of the attribute of sattva. One who abides in sattva, often becomes attached to his divinity. The flow of divine qualities is a consequence of sattva. The satoguni also becomes attached to these qualities. The attribute of sattva also engenders a life of yagya or selfless offering to the Lord; the practice of the qualities of the Supreme begins here.


Such a state is not devoid of the ego. The desire for ‘light’ still inheres in such a one. He is still desirous of bliss. He is yet to give his all to his Lord. Pride of the attribute of sattva still prevails in such a one. The attribute of sattva is thus said to bind one with noble deeds and their resultant joy. This attribute binds the mortal with divinity. It binds man with knowledge and its luminescence.

अध्याय १४

सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते।

ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत।।११।।

भगवान कहते हैं अर्जुन से, ले! सत्त्व गुण की बात बताऊँ!

शब्दार्थ :

१. जिस काल में इस देह के सम्पूर्ण द्वारों से,

२. प्रकाश और ज्ञान उपजता है,

३. उस काल में जानना चाहिये कि सत्त्व गुण बढ़ा हुआ है।

तत्त्व विस्तार :

भगवान कहते हैं कि सतोगुण बढ़ा हुआ तब मानो जब,

क) तन के सब द्वारों में प्रकाश और ज्ञान उपज जाये।

ख) जो भी सम्पर्क में आये, आपका ज्ञान बह जाये और बढ़ जाये।

ज्ञान क्या है ?

भगवान पहले कह आये हैं कि ज्ञान क्या है, इसे पुन: समझ ले!

1. अहंकार का अभाव ही ज्ञान है;

2. अभिमान का अभाव ही ज्ञान है;

3. आर्जवता ही ज्ञान है;

4. क्षमा ही ज्ञान है;

5. करुणा ही ज्ञान है;

6. दूसरे पर अधिकार रहितता ही ज्ञान है;

7. अद्वेष ही ज्ञान है;

8. निर्वैर भाव ही ज्ञान है;

9. मैत्री ही ज्ञान है;

10. समत्व भाव ही ज्ञान है।

इसके परिणाम स्वरूप आन्तर में :

क) आनन्द उपज ही पड़ेगा।

ख) सत् अनुभव होने लग जायेगा।

ग) सत् की समझ आने लग जायेगी।

घ) ज्ञान उपजने लग जायेगा।

ङ) निर्लिप्तता आ ही जायेगी।

च) उदासीनता समझ आने लग जायेगी।

यही सब प्रकाश के गुण हैं।

सतोगुणी समचित्त हैं।

समचित्तता :

1. समचित्त, शुभ अशुभ पाकर भी निरपेक्ष रहेगा।

2. राग और द्वेष जहाँ पर हों, वहाँ पर भी वह परवाह नहीं करेगा।

3. सतोगुण प्रधान वाले का प्रवृत्ति में या निवृत्ति में समभाव होगा।

4. जहान में महा शोरोगुल में भी वह शान्त रहेगा।

5. जहान के काज कर्म में दक्ष होते हुए भी वह अकर्तापन का अभ्यास करेगा।

6. जहान के प्रहारों के प्रति वह नित्य उदासीन रहने का प्रयत्न करेगा।

7. मान या अपमान के प्रति वह नित्य उदासीन रहने का प्रयत्न करेगा।

समचित्तता का परिणाम :

तब ही तो परिणाम में वह :

क) नित्य तृप्तता को पायेगा,

ख) उदासीनता को पायेगा,

ग) निर्दोषता को पायेगा,

घ) निरासक्त हो जायेगा।

जीवन में इस अभ्यास के पश्चात् वह इन गुणों में स्थिरता पायेगा और वहाँ प्रकाश उत्पन्न होता जायेगा। यानि, उसे सत् और असत् समझ आता जायेगा। सत् और असत् से परे जो तत्त्व है, वह कुछ कुछ जान सकेगा। यह सब सतोगुण का प्रताप है।

पर याद रहे, हर द्वार से सतो गुण को बहना होता है और हर द्वार से सतो गुण को उपजना होता है। सतो गुण सम्पन्न लोग दैवी भाव में रहते हैं और जीवन में दैवी सम्पदा बहाते हैं। जो अपने तन मान को भूल कर दूसरे के लिये, दूसरे के सुख के लिये निष्काम काज करे, उसे सत्पूर्ण ही कहते हैं।

जो वास्तव में सत् में स्थित हैं, वे निष्काम कर्म, निष्काम उपासना और निष्काम ज्ञान की ओर बढ़ते हैं। वे तो भगवान को भी कुछ देने जाते हैं, वे भगवान से कुछ भी लेना नहीं चाहते। वे भगवान का भगवान को देना चाहते हैं। इस कारण वे,

1. तन भगवान को लौटा रहे हैं।

2. मन भगवान के चरणों में मिटा रहे हैं।

3. अपना व्यक्तित्व भाव मिटाना चाहते हैं।

4. वे स्वयं स्थापित होना नहीं चाहते, वे तो अपने तन में भगवान को स्थापित करना चाहते हैं।

5. वे स्वयं प्रभुत्व पाना नहीं चाहते, वे तो चाकर बनने चले हैं।

अजी! वे अपना तन भगवान को देने चले हैं। वे भगवान बनने नहीं चले, परन्तु उनके गुणों द्वारा भगवान जहान को मिलते हैं। क्योंकि उनके तन में,

क) भगवान का आवाहन हो रहा है।

ख) भगवान विराजित होने वाले हैं।

ग) भगवान सप्राण होने वाले हैं।

जब तनत्व भाव का नितान्त अभाव हो जाता है, तब वहाँ जीवत्व भाव का अभाव होने के कारण तन ‘मैं’ का नहीं रहता। मैं रूपा मल रहित तन, दिव्य विभूति मात्र ही होता है।

किन्तु नन्हीं! यह सतोगुण के परे की बात है। सतो गुणी को ज्ञान और प्रकाश से अभी संग होता है। जब सतोगुण से भी परे हो गया, तब जानो वहाँ इन्सान नहीं, भगवान रह जाता है।

देवत्व भाव सतोगुण है, इससे सतोगुणी को संग होता है। दैवी सम्पदा बहाव सतोगुण है, इससे भी सतोगुणी को संग होता है। जीवन का यज्ञमय होना सतोगुण है, परम गुण अभ्यास यहीं पर आरम्भ होता है।

किन्तु सावधान!

अभी यहाँ ‘मैं’ बाक़ी है, अभी वह प्रकाश चाहती है। अभी इसको आनन्द से संग होता है, अभी सब राम को देना बाक़ी है। अभी सतो गुण का अहंकार बाक़ी है। सतोगुण इस अभ्यास तथा इसके परिणाम रूप सुख से बांधता है। सतोगुण जीव को देवत्व से बांधता है। सतोगुण जीव को ज्ञान से बांधता है।

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