Chapter 14 Shloka 5

सत्त्वं रजस्तम इति गुणा: प्रकृतिसम्भवा:।

निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्।।५।।

O courageous Arjuna!

Sattva, Rajas and Tamas are

the three qualities born of Prakriti

that tie the immortal soul to the body.

Chapter 14 Shloka 5

सत्त्वं रजस्तम इति गुणा: प्रकृतिसम्भवा:।

निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्।।५।।

Elaborating on the subject of the world as bondage, the Lord says:

O courageous Arjuna! Sattva, Rajas and Tamas are the three qualities born of Prakriti that tie the immortal soul to the body.

O aspirant of eternal bliss, Kamla! The Lord says here, that myriad attributes are found in the individual being. These include both virtue and vice – both are gunas. Gunas can be both positive and negative, good and bad.

1. All these arise out of Prakriti.

2. The three fold energy of Prakriti endows the individual with these gunas.

3. They are the gift of the creative energy of Prakriti.

4. One’s genetic inheritance, the womb whence one is born, determines one’s form, sex, appearance etc. and one has no control over these.

5. This is an automatic process.

Look!

1. Some attributes are a result of one’s sanskars or the accumulation of the latencies of previous births.

2. Other attributes spring from the seeds of the past.

3. Yet other attributes are bestowed by circumstances and the effects of various situations.

4. Some other qualities could be said to be the gift of one’s associates; their qualities cause your qualities to change. In fact:

­­–  It is only qualities that can change other qualities.

­­–  Some qualities augment other qualities.

­­–  Some qualities silence other qualities.

­­–  Some qualities pacify other qualities.

­­–  Some qualities destroy other qualities.

­­–  Some qualities combine with other qualities and cause friction.

5. Little one, life itself is based on these qualities. Birth, too, is dependent on these qualities.

The predominant gunas pervading the seeds of one’s actions:

a) are the very qualities that sprout forth again;

b) attract and collect around them those people whose attributes match theirs;

c) attract matching circumstances;

d) take birth in consonance with those seed banks that complement their own destiny.

Little one, this effect of gunas is spontaneous and automatic. The attraction, repulsion, conjunction and separation of qualities is a self automated process. All this happens within the sphere of Prakriti. Thereafter, one receives:

a) a family,

b) circumstances,

c) a social setup,

d) a body and mind with a particular destiny,

all in accordance with one’s attributes and nature.

This is all an interplay of the gunas or attributes. It is an effect of the interaction of some qualities with other qualities. The jivatma or mortal being becomes attached to those attributes. He considers himself to be merely a conglomeration of attributes! This causes bondage with those attributes.

The mind and the intellect, having received the power of consciousness from the Supreme, become boastful and proud, and identify themselves with gross attributes. The foolish ‘I’ begins to believe, “I am this body comprising of this collection of attributes.” This is the primal ignorance that causes the individual to be ridden with moha. If the ‘I’ did not claim these attributes, it would remain ever free from aberrations.

अध्याय १४

सत्त्वं रजस्तम इति गुणा: प्रकृतिसम्भवा:।

निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्।।५।।

जग बन्धन के विषय में भगवान कहने लगे, सुन अर्जुन!

शब्दार्थ :

१. सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण, ये प्रकृति से उत्पन्न हुए हैं

२. और निर्विकार देही को, देह में बांधते हैं।

तत्त्व विस्तार :

देख आनन्द स्वरूप चाहुक कमला! भगवान कहते हैं, जीव में अनेकों गुण हैं। गुण, अवगुण, दोनों ही ‘गुण’ कहलाते हैं। गुण अच्छे भी हैं और गुण बुरे भी हैं।

क) ये सब प्रकृति से उत्पन्न हुए हैं।

ख) ये सब त्रिगुणात्मिका शक्ति की देन हैं।

ग) ये सब रचनात्मिका शक्ति की देन हैं।

घ) जिस गर्भ में जन्म हुआ, वहाँ से रूप, लिंग, आकृति मिल जाती है; इनपे जीव का बस नहीं होता।

ङ) यह स्वत: सिद्ध बात है।

देखो न!

1. कुछ गुण कह लो संस्कारों में भरे थे।

2. कुछ गुण कह लो बीज में भरे थे।

3. कुछ गुण कह लो परिस्थितियों ने दिये, यानि परिस्थिति के प्रभाव से उत्पन्न हो गये।

4. कुछ गुण कह लो लोगों ने दिये, यानि औरों के गुणों ने आपके गुण बदल दिये।

वास्तव में,

– गुण ही गुणों को बदलते हैं।

– गुण ही गुणों को बढ़ाते हैं।

– गुण ही गुणों को गौण कर देते हैं।

– गुण ही गुणों को शान्त कर देते हैं।

– गुण ही गुणों का नाश कर देते हैं।

– गुण ही गुणों से मिल कर नवगुण उत्पन्न कर देते हैं।

– गुण ही गुणों से मिल कर उत्तेजना पाते हैं।

5. फिर नन्हूं! जीवन भी गुणों पर आधारित है। जन्म भी गुणों पर ही आधारित है।

आपके कर्म बीज जिन गुणों से भरपूर थे,

क) वे बीज पुन: उभर पड़े।

ख) उन्होंने सजातीय गुण वालों को एकत्रित कर लिया।

ग) वैसी परिस्थिति को एकत्रित कर लिया।

घ) उन्होंने अपने सहयोगी गुण वाले बीज पुंजों के साथ जन्म ले लिया।

नन्हीं! यह गुण प्रभाव स्वत: होता रहता है। यह गुण आकर्षण स्वत: होता रहता है। यह गुण प्रतिकर्षण स्वत: होता रहता है। यह गुण संयोग भी स्वत: होता रहता है। यह गुण वियोग भी स्वत: होता रहता है।

यह सब प्रकृति में ही होता रहता है। तत्पश्चात्, गुण स्वभाव अनुकूल आपको;

1. कुल मिल जाता है।

2. परिस्थितियाँ मिल जाती हैं।

3. सामाजिक विधान मिल जाता है।

4. तन और मन की रेखा मिल जाती है।

भाई! यह सब गुण खिलवाड़ ही है। ये सब गुण ही गुणों में वर्त रहे हैं। जीवात्मा गुणों से संग कर लेता है और अपने आपको गुण ही समझने लगता है। यह ही उसका गुणों से बंध जाना है।

मन और बुद्धि, परमात्मा से चेतनता पाकर इतराने लग जाते हैं और जड़ गुण समूह के तद्‍रूप हो जाते हैं। यह ‘मैं’ मूढ़वत् कहने लग जाती है कि ‘यह गुण पुंज तन मैं ही हूँ।’ बस यह ही प्रथम भूल है जिसके कारण जीव मोह युक्त हो जाता है। यदि ‘मैं’ यह गुण न अपनाए, तो यह नित्य निर्विकार ही है।

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