Chapter 7 Shlokas 26, 27

वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन।

भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन।।२६।।

इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत।

सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप।।२७।।

O Arjuna, I know all beings that exist in the past,

present and future, but nobody knows Me;

because all beings in this world are deluded by desire

and aversion arising from duality and moha,

and are thus descending into ignorance.

Chapter 7 Shlokas 26, 27

वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन।

भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन।।२६।।

इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत।

सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप।।२७।।

Bhagwan says:

O Arjuna, I know all beings that exist in the past, present and future, but nobody knows Me; because all beings in this world are deluded by desire and aversion arising from duality and moha, and are thus descending into ignorance.

The Lord states that He knows all individuals in the past, the present and the future, ‘But none know Me.’

The Lord has explained in the previous shloka, that He is not revealed to all, since He is cloaked by Yogmaya. He now says that people cannot perceive Him because they are deluded by duality and moha, raag and dvesh.

Kamla, you must clearly understand the reason why one is unable to know the Lord. He says:

1. “Firstly, I am veiled by My Yogmaya.

2. I am extremely ordinary and look like any ordinary mortal.

3. I never break the concepts of another.

4. I don a form in accordance with the individual who stands before Me.

5. I endure all assaults upon Me, yet I love all.

6. My body also acts in accordance with the gunas or attributes as does that of any ordinary individual.

7. I live as the servitor of all.

8. I smile – no matter what befalls Me.

9. I change Myself in accordance with the requirement of the individual before Me. Yet I lead a very ordinary existence.”

“On the other hand, how can any ordinary being know Me? Raag and dvesh blind them from birth. Myriad desires are born from these, and likes and dislikes further strengthen the individual’s predilection towards attraction and aversion. They become attached to the body and are blinded by moha. How can anyone who is thus blinded perceive Me?”

1. Such people can see only their own minds and no one else.

2. They are aware only of their own desires.

3. They focus their vision only upon the object of their interest.

4. They are aware only of what they dislike.

5. They are shrouded with greed which they ascribe to others and thus delude themselves.

This blindness gives rise to duality and augments mental turbulence and avarice. Then how can anyone perceive the Truth?

If one cannot even recognise those who stand before one, even one’s own brethren, then how can one recognise the Lord?

अध्याय ७

वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन।

भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन।।२६।।

इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत।

सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप।।२७।।

भगवान कहते हैं :

शब्दार्थ :

१. अर्जुन! मैं पूर्व में व्यतीत हुए और वर्तमान में स्थित तथा आगे होने वाले सब भूतों को जानता हूँ।

२. परन्तु मुझे कोई नहीं जानता। (क्योंकि)

३. हे अर्जुन! इच्छा और द्वेष से उत्पन्न हुए,

४. द्वन्द्व और मोह से सम्पूर्ण प्राणी अति अज्ञानता को प्राप्त हो रहे हैं।

तत्व विस्तार :

अब भगवान कहते हैं, ‘मैं पूर्व व्यतीत हुए, वर्तमान में स्थित तथा आगामी होने वाले भूतों को जानता हूँ, पर मुझको कोई नहीं जानता।’

नन्हीं! भगवान पहले कह आये हैं कि, ‘योगमाया से ढका हुआ, मैं सबको नहीं दर्शाता हूँ’ (7/25)। अब कहते हैं कि ‘राग द्वेष से उत्पन्न हुए द्वन्द्वों के मोह से सम्मोहित हुए जीव मुझे नहीं जान सकते।’

कमला यह पुन: समझ ले कि जीव भगवान को क्यों नहीं समझ सकते।

भगवान कहते हैं,

1. एक तो मैं स्वयं ही अपनी माया से आवृत हूँ।

2. ऊपर से मैं अति साधारण हूँ और तनधारी दिखता हूँ।

3. मैं कभी किसी की मान्यता भंजित नहीं करता।

4. जैसा कोई मेरे सामने आता है, मैं वैसा रूप धर लेता हूँ।

5. मैं हर वार तथा प्रहार सहता हूँ फिर भी प्यार करता हूँ।

6. साधारण व्यक्तियों की भान्ति मेरा तन भी गुणों में वर्तता है।

7. मैं सबका चाकर बनकर रहता हूँ।

8. मुझ पर जो बीते, मैं हंसता रहता हूँ।

9. जैसा कोई मेरे सामने आता है, मैं वैसा बन जाता हूँ, पर अतीव साधारण जीवन व्यतीत करता हूँ।

दूसरी ओर, जीव मुझे जानें भी कैसे? जन्म से राग द्वेष उन्हें अंधा बना देते हैं और इनके परिणाम रूप लाखों कामनायें उत्पन्न हो जाती हैं। रुचि अरुचि के कारण साथ साथ राग द्वेष के भी झमेले लग जाते हैं। वे तन के साथ भी संग कर बैठते हैं, वे मोह ग्रसित होकर अंधे हो जाते हैं। जो अन्धी दृष्टि से दूसरों को देखें, वह क्या देखेगा?

1. उन्हें अपना ही मान दिखता है और कोई नहीं दिखता।

2. उन्हें अपना ही काम दिखता है।

3. उन्हें अपनी ही रुचि दिखती है।

4. उन्हें अपनी ही अरुचि दिखती है।

5. उन्हें अपनी ही लोलुप्ता दिखती है, जिसे वे दूसरों पर आरोपित करते रहते हैं और वह अपने को ही विक्षिप्त करते हैं।

यही अन्धापन द्वन्द्व उत्पन्न कर देता है, मन को चंचल तथा लोलुप कर देता है। तो फिर कोई कैसे सत्यता देख सके?

जो जीव और सहवासी आपके सामने खड़े हैं, आप उन्हें भी नहीं जान सकते तो भगवान को क्या जानोगे?

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