Chapter 8 Shloka 7

तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।

मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम् ।।७।।

Therefore, remember Me at all times and fight!

Having dedicated your mind and intellect unto Me,

you will attain Me. There is no doubt about it.

Chapter 8 Shloka 7

तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।

मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम् ।।७।।

Therefore, remember Me at all times and fight! Having dedicated your mind and intellect unto Me, you will attain Me. There is no doubt about it.

O Kamla! The Lord says that one’s inner intent is the seed that creates one’s future life. Therefore:

1. Fix your mind in Me constantly.

2. With your mind thus fixed in Me, perform all your tasks in the world.

3. Experience My presence at all times as a witness.

4. Learn how to live for Me and in My Name.

5. Let your life be one of yagya, for it is I who abides in all acts of yagya.

6. Let Truth be your mainstay and support; renounce the support of spurious thoughts, concepts and beliefs.

7. Wipe out raag and dvesh – attachment and aversion – from your memory, for you are the Atma.

8. If I am always with you as a witness, you will be able to abide in Me.

9. If you remember Me at all times, you will be able to know Me and you will never be troubled by avarice, greed and desire.

10. The mind will then have no opportunity to indulge in grudges, or in moods of sorrow and happiness, or in any act of injustice.

11. If I Myself abide in the heart, where is the place for anger or remorse?

12. If you keep Me with you always,

­­–  how can enmity remain?

­­–  you will only be able to perform noble deeds.

­­–  you will not be inimical even with your enemies.

­­–  where will you find the time to indulge in worry and sorrow?

The truth is that where the Lord Himself abides, it is indeed difficult to find any room for other thoughts. Therefore the Lord advises, “Keep your mind fixed in Me.”

a) Then confront all situations with courage.

b) Fulfil all your duties with vigilance and shrewdness.

c) Do as the Lord Himself does always.

d) Act as an ignorant being amongst the ignorant but without attachment.

e) Do not be attached to any external situations.

f) Continue to perform all the actions required of you in any situation.

Therefore at that crucial moment, the Lord advises Arjuna, “Arise and fight! If your mind is truly fixed in Me, you will doubtless attain Me.”

अध्याय ८

तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।

मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम् ।।७।।

भगवान कहते हैं :

शब्दार्थ :

१. इसलिये हे अर्जुन! हर समय में मेरा स्मरण कर

२. और युद्ध कर!

३. मेरे में मन, बुद्धि अर्पित किया हुआ,

४. निस्संदेह तू मेरे को ही प्राप्त होगा।

तत्व विस्तार :

हे कमला! भगवान कहते हैं, भाव ही वे बीज हैं जो जीवन का निर्माण करते हैं।

इसलिये :

क) निरन्तर मुझमें ध्यान लगा।

ख) मन मुझ में धर कर जीवन के सब काज कर्म कर।

ग) हर पल मेरा साक्षित्व अनुभव कर।

घ) मेरे नाम में, मेरे लिये जीना सीख ले।

ङ) यज्ञपूर्ण जीवन बना, यज्ञ में मैं ही रहता हूँ।

च) परम सत् का आश्रय ले, मिथ्या भावों का आश्रय छोड़ दे।

छ) राग द्वेष को भूल जा, तू आत्मा है, यह जान ले।

ज) गर हर पल मेरा साक्षित्व रहे तब मुझमें समा सकेगा।

झ) गर तू हर पल मुझे याद करेगा तब तू मुझे समझ सकेगा और तब तृष्णा, लोभ, कामना तुझे सता नहीं सकेंगे।

ञ) तब मन को फ़ुर्सत ही कहाँ होगी कि वह गिले शिकवे कर सके, दु:खी सुखी हो सके, या कोई भी अन्याय पूर्ण बात कर सके?

ट) अजी! गर मैं हृदय में वास करूँ तो उसमें इतनी जगह ही कहाँ कि क्रोध और क्षोभ का वास भी वहाँ हो सके?

ठ) मुझे अपने साथ रखो तो,

1. वैर कैसे कर पाओगे?

2. शुभ कर्म ही कर सकोगे!

3. शत्रुओं से शत्रुता नहीं होगी।

4. चिन्ता और शोक करने की फ़ुर्सत कब मिलेगी?

अजी! सच बात तो यह है, गर मन में भगवान बसें तो अन्य भावों का वहाँ बसना मुश्किल है। सो भगवान कहते हैं -‘मन मुझ में रख।’

1. सामने जैसी भी परिस्थिति हो, उसका सामना कर।

2. जीवन में जो भी कर्तव्य सामने आयें, उन्हें दक्षता तथा कुशलता से कर।

3. जैसा भगवान नित्य करते हैं, वैसा ही तू भी कर।

4. संग रहित होकर, अज्ञानियों में अज्ञानियों के समान ही वर्तन कर।

5. बाह्य परिस्थितियों से संग मत कर।

6. जीवन में परिस्थिति अनुसार जो कर्म बनते हैं, उन्हें करता जा।

इसलिये भगवान इस समय अर्जुन से कहने लगे, ‘उठ! तू युद्ध कर! यदि तेरा मन मुझमें हुआ तो तू मुझको ही प्राप्त करेगा।’

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