Chapter 3 Shloka 36

अर्जुन उवाच

अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुष:।

अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजित:।।३६।।

Arjuna asks Bhagwan:

What prompts a man to sin –

even though unwilling, as if perforce?

Chapter 3 Shloka 36

अर्जुन उवाच

अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुष:।

अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजित:।।३६।।

Hearing all this, Arjuna asks Bhagwan:

What prompts a man to sin – even though unwilling, as if perforce?

Arjuna seeks to know from the Lord:

1. How is it that a person sins as though perforce?

2. What impels one who acts in accordance with dharma, to commit an act contrary to dharma?

3. How does a virtuous sadhu  What impels perform the evil deeds of a non-sadhu?

4. How does a Kshatriya take recourse to the qualities of one who is not a Kshatriya?

5. What prompts a man to make a mistake, despite himself?

6. Why can an individual not restrain himself, even if he so desires?

7. Why does he forget his innate nature?

8. Why is he misguided about the action he must perform?

9. Why does he forget his duty?

Who compels the individual thus? Who creates superstition within him?

अध्याय ३

अर्जुन उवाच

अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुष:।

अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजित:।।३६।।

यह सब सुन कर अर्जुन पूछते हैं कि हे कृष्ण!

शब्दार्थ :

१. फिर यह पुरुष,

२. न चाहता हुआ भी,

३. किसकी प्रेरणा से,

४. ज़बरदस्ती लगाये हुए जीव के समान,

५. पाप का आचरण करता है?

तत्व विस्तार :

अर्जुन कहते हैं, अब तुम यह बताओ भगवान :

क) यह क्या कारण है जिससे जीव विवश पाप कर बैठता है?

ख) वह प्रेरक कौन है जो धर्मवान् से भी अधर्म करवा देता है?

ग) साधु से भी असाधुतापूर्ण कर्म कैसे हो जाते हैं?

घ) क्षत्रियों से अक्षत्रियों के पथ का अनुसरण कैसे हो जाता है?

ङ) जीव न चाहता हुआ भी ग़लती क्यों कर बैठता है?

च) जीव अपने को रोकता हुआ भी क्यों नहीं रोक सकता?

छ) जीव अपना स्वभाव क्यों भूल जाता है?

ज) जीव अपना कर्म क्यों भूल जाता है?

झ) जीव अपना कर्तव्य क्यों भूल जाता है?

यह जीव पर ज़बरदस्ती कौन करता है?

यह अन्धविश्वास कौन उत्पन्न कर देता है?

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