Chapter 3 Shloka 31

ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवा:।

श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभि:।।३१।।

The Lord clearly tells Arjuna:

Those people who follow this teaching of Mine

with faith and with an uncritical intellect,

conscientiously practising My instructions,

they will be released from the bondage of karma.

Chapter 3 Shloka 31

ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवा:।

श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभि:।।३१।।

The Lord clearly tells Arjuna:

Those people who follow this teaching of Mine with faith and with an uncritical intellect, conscientiously practising My instructions, they will be released from the bondage of karma.

Little one, first understand what the Lord has said:

1. You are the Atma and not the body which is subject to death.

2. All actions, your body, as well as the bodies of others, are controlled by the gunas.

3. Do not pass judgement on people.

4. Equip yourself with a selfless attitude and then perform actions in your ordinary day to day life.

The Lord says, “Anybody who does as I say will be freed from the bondage of action. He who follows My injunctions with innate faith, devoid of criticism, he will be freed from the fetters of action.”

The critical intellect

1. The person with a critical eye continually finds fault with another’s words.

2. Such an intellect is adept at seeing another’s lacunae.

3. It raises doubts regarding another’s weaknesses.

4. Its point of view is flawed.

5. Its only aim is to prove the other wrong. Since its basic principles are false, it cannot understand the Truth.

6. It always justifies and tries to prove its own concepts through argument or discussion.

Such a critical eye causes the downfall of even great intellectuals from the path of Truth.

a) Those who possess such an intellect, reject as ‘worthless’ any path they cannot themselves access.

b) In fact, each one’s perception is clouded by his own concepts and internal faults, of which he has a silent, unconscious awareness. Thus his own vices colour his vision, causing him to project his own defects on others.

c) It is this same defective vision that prevents such a one from seeing the greatness of the other. He who is purified of this attitude, has no difficulty in accepting in toto the Lord’s statement – “You are not the body – you are the Atma…Be an Atmavaan!”

It is not only difficult but well nigh impossible for an ordinary person to accept this statement of the Lord. This injunction can only be obeyed by one who believes that:

1. Lord Krishna is indeed God Himself.

2. Lord Krishna is Truth embodied.

3. His life is the practical translation of the knowledge of the Scriptures and He is verily the One who illuminates Adhyatam – or the path of spiritual living. It is a rare aspirant who aims only to achieve abidance in the Self and who has the requisite faith to achieve it.

Even though one may aspire to a pure intellect as one’s sole aim in life, how will such a one successfully cross the turbulent ocean of thoughts? It is still more difficult to practice the renunciation of the body idea. To say ‘I am the Atma’ and then retire into the forests in order to escape from one’s duties and from other people is relatively easy. However, the Lord says “You are the Atma – not the body. Renounce the claims you have made on your body and give of yourself in the selfless service of others.”

Little one, it is much more difficult to obey this command of the Lord. People love to discuss the Atma and the Supreme Lord of all – but they find it extremely difficult to give their life in the service of others. It is only through fulfilling the dreams of others that one can achieve a selfless attitude and develop detachment to oneself. But the mind says, ‘My aim is to be an Atmavaan – not a servant to others!’ Thus renunciation of the idea ‘I am the body’ becomes impossible! For its attainment, faith is a necessary pre-requisite.

What is Shraddha (श्रद्धा)?

1. Shraddha is full faith in what Bhagwan says.

2. Faith is a strong belief in the efficacy of divine qualities.

3. We repose our trust in gross objects. Trust in the divine qualities of the Lord constitutes shraddha.

4. Shraddha is faith in the unseen, intangible objectives. To rise above the body idea, one needs phenomenal shraddha or absolute faith in divinity.

This faith will help the aspirant to fulfill his vow of lifelong and dedicated selfless action in complete self forgetfulness, for the establishment of the other. It will be an aid in his practice of detachment and equanimity in the face of his likes and dislikes and praise or insult.

Success in fulfilling his aspiration even in the face of countless problems, varied mental ‘climates’ and the storms of desire and attachment, is dependent on one’s faith in the Name of the Lord. Having ascended the ‘boat’ of the Divine Name with the oars of shraddha in hand, the sadhak will inevitably cross the ocean of karma.

Bhagwan has said, “Whosoever obeys Me with an attitude free of criticism and with full faith will be freed from the cycle of karma.”

अध्याय ३

ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवा:।

श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभि:।।३१।।

देख नन्हीं! भगवान स्पष्ट कह रहे हैं :

शब्दार्थ :

१. जो कोई पुरुष भी,

२. दोष बुद्धि से रहित हुआ और श्रद्धा से युक्त हुआ

३. सदा मेरे इस मत के अनुसार चलेगा,

४. वह सम्पूर्ण कर्मों से छूट जायेगा।

तत्व विस्तार :

नन्हीं! पहले पुन: समझ ले कि भगवान ने क्या कहा है।

1. तू आत्मा है।

2. तू मृत्यु धर्मा तन नहीं।

3. हर कर्म गुणों का खिलवाड़ है।

4. तुम्हारा तन भी गुणों से बधित है और दूसरे का तन भी गुण बधित है।

5. किसी को बुरा भला मत कहो।

6. निष्काम भाव से निरासक्त हुए साधारण जीवन में कर्म करते जाओ।

अब भगवान कहते हैं, ‘जो भी पुरुष मेरी इस कथनी को मान लेगा, वह कर्मों से छूट जायेगा।’ उन्होंने कहा, ‘दोष दृष्टि रहित हुआ और श्रद्धा से युक्त हुआ जो मेरा मत मानेगा, वह कर्मों से मुक्त हो जायेगा।’

प्रथम दोष दृष्टि को समझ ले। भगवान ने कहा है, यदि तू इसे बिना दोष दृष्टि के सत्य मान लेगा, तभी तो तेरा लक्ष्य सिद्ध होगा।

दोष दृष्टि :

1. दोष दृष्टि वाले को दूसरे की कथनी में त्रुटियाँ दिखती हैं।

2. अवगुण दर्शी बुद्धि को दोष दृष्टि पूर्ण कहते हैं।

3. दोष दृष्टि, न्यूनता आरोपित करने वाली दृष्टि है।

4. निन्दक की दृष्टि दोष पूर्ण है।

5. जो केवल दूसरे को ग़लत ठहराना चाहे तथा जो मिथ्या सिद्धान्तों का आसरा लेकर सत्यता न समझ सके, उसकी दृष्टि दोष पूर्ण है।

6. तर्क वितर्क करके जो नित्य अपनी मान्यता को ही सत् सिद्ध करना चाहे, उसकी दृष्टि दोष पूर्ण है।

नन्हीं! यह दोष दृष्टि बड़े बड़े बुद्धिमानों को भी सत् पथ से गिरा देती है।

क) जो वह स्वयं नहीं कर सकते और नहीं करना चाहते, उसे वह दूषित पथ ही कह देते हैं।

ख) फिर, जीव तो अपनी मान्यताओं से भरा हुआ होता है। उसकी दृष्टि उसकी अपनी ही मान्यताओं द्वारा आवृत होकर, दूषित हो जाती है।

ग) हर प्राणी को मौन में अपना अनुभव होता है। वह अपने आंतरिक विकार ही दूसरे में देखता है। जीव के अपने दुर्गुण ही उसकी दृष्टि को दूषित कर देते हैं।

घ) उस दोष दृष्टि के कारण ही तो जीव दूसरे की महानता नहीं देख सकता। जो दोष दृष्टि से रहित होगा, वह भगवान के इस कहने को अक्षरांश मान ही लेगा कि, ‘तुम तन नहीं हो, आत्मा हो’ और ‘तुम आत्मवान् बनो’।

अब साधारण जीव के लिये यह बात मान लेनी कठिन ही नहीं बल्कि असम्भव है। इसे तो वही मानेगा जो :

1. कृष्ण को सच ही भगवान मानेगा।

2. कृष्ण को सत् स्वरूप मानेगा।

3. भगवान कृष्ण के जीवन को ज्ञान का विज्ञानमय रूप मानेगा।

4. भगवान कृष्ण को अध्यात्म का प्रकाश रूप मानेगा।

कोई ऐसा विरला मनुष्य ही होगा जो ‘आत्मवान्’ तथा ‘ब्राह्मी स्थिति’ को ही अपना लक्ष्य बना लेगा। तत्पश्चात्, श्रद्धा का होना अनिवार्य है।

निर्दोष बुद्धि को लक्ष्य तो बना लिया, अब जीवन के भवसागर को कैसे तरें और कैसे उससे पार होयें? तनत्व भाव अभाव का जीवन में अभ्यास और भी मुश्किल है।

‘मैं आत्मा हूँ’ कह कर,

क) जंगलों में चले जाना,

ख) अपने कर्तव्यों का परित्याग कर देना,

ग) लोगों से दूर हो जाना,

आसान है; किन्तु भगवान कहते हैं, ‘तू आत्मा है, तू तन नहीं! तन के प्रति जो तेरा ममत्व भाव है, उसे छोड़ दे और तन दूसरों को दे दे, इससे निरासक्त हुआ इस तन को निष्काम कर्म करने दे।

नन्हीं! इस बात को निभाना बहुत कठिन है। लोग ग़लती भी यहीं कर देते हैं। आत्मा परमात्मा की बातें उन्हें अच्छी लगती हैं, जीवन में लोगों को तन दे देना उन्हें बुरा लगता है। लोगों के सपने पूरे करोगे तब ही तो निष्काम भाव से कर्म करने आयेंगे और निरासक्ति का अभ्यास कर सकोगे! किन्तु मन कहता है, ‘हम तो आत्मवान् बनने चले हैं, किसी के नौकर बनने तो नहीं!’ इसी कारण नन्हीं! तनत्व भाव का त्याग नहीं हो सकता। तनत्व भाव त्याग के लिये श्रद्धा चाहिये। अब श्रद्धा को भी समझ ले।

श्रद्धा :

1. श्रद्धा भगवान के आदेश पर विश्वास को कहते हैं।

2. भगवान के गुणों पर विश्वास श्रद्धा है।

3. हमारा स्थूल विषयों में विश्वास होता है। दैवी गुणों में गर विश्वास हो तो उसे श्रद्धा कहते हैं।

4. श्रद्धा उस गुण में होती है, जिसका दृष्ट रूप या फल नहीं होता। जिसने अपने तनत्व भाव का त्याग करना है, उसको परम गुण में साधारण ही नहीं, दिव्य तथा अलौकिक श्रद्धा की आवश्यकता होती है।

क) उसने तो जीवन भर निष्काम कर्म करने का व्रत लिया है।

ख) उसने तो सदा अपने आपको भूले रहने का व्रत लिया है।

ग) उसने तो हमेशा दूसरों को स्थापित करने का व्रत लेना है।

घ) उसने निरासक्त रहने का व्रत लेना है।

ङ) उसने तो अपनी रुचि अरुचि के प्रति उदासीन रहने का व्रत लेना है।

च) उसने तो अपने मान या अपमान के प्रति उदासीन रहने का व्रत लेना है।

इस व्रत का पालन करते समय, संसार में कौन सी समस्यायें उठ आयें, कैसी वातावरण रूपा ऋतुओं का सामना करना पड़ जाये, राह में किन चाहनाओं के तूफ़ान आ जायें, व्रती इन सब की परवाह नहीं करता। नन्हीं! इस भव सागर से तरने के लिये नाम रूपा लक्ष्य ही नैया है और श्रद्धा रूपा चप्पू ही इससे पार लगा सकते हैं।

इस कारण भगवान कहते हैं, ‘दोष रहित होकर, तथा श्रद्धा से युक्त होकर जो भी मनुष्य मेरे मत को मानेगा, वह कर्मों से छूट जायेगा।’ यानि, वह कर्म फल चक्र से ही छूट जायेगा।

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