Chapter 3 Shloka 13

यज्ञशिष्टाशिन: सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषै:।

भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्।।१३।।

Those elevated souls who partake of

the remnants of sacrificial offerings (yagyashesh),

transcend all sins. Those who cook

for themselves alone, partake of sin.

Chapter 3 Shloka 13

यज्ञशिष्टाशिन: सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषै:।

भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्।।१३।।


Those elevated souls who partake of the remnants of sacrificial offerings (yagyashesh), transcend all sins. Those who cook for themselves alone, partake of sin.

Those who partake of yagyashesh are absolved of sin. Let us understand once again what is that remnant of yagya, partaking of which one becomes sinless?

1. Yagya is constituted of those acts which are offered as an oblation in the fire of knowledge, consuming therein all desires for the fruit of action. All deeds performed thereafter with complete effort and concentration in the service of others, are a yagya.

2. Every deed of the sadhak is purified by the fire of knowledge in the yagya of his life.

Such a sadhak:

a) is steadfast in the attitude of selflessness;

b) is practising an attitude of equanimity towards the fruits of actions;

c) is endeavouring to transcend the feelings of ‘I’ and ‘mine’;

d) desires to be an Atmavaan.

Greed, attachment and desire, likes and dislikes do not touch him. As a result, he is utterly pure. He lives on whatever he receives as a result of his selfless deeds. This is yagyashesh.

One who partakes of yagyashesh

1. He partakes of the sublime bliss that arises from self sacrifice.

2. That One who surrenders at the feet of the Supreme, is satiated with love.

3. The food of the one who is Justice itself, can only be Impartiality and Truth.

4. He loves the food of forbearance and patience.

5. Compassion, forgiveness, fortitude, endurance, sobriety and tolerance are the food partaken of by that one who is immersed in acts of yagya.

6. His yagyashesh is fragrant with supreme happiness, divine prowess, friendship and love.

He performs yagya with courage and fearlessness, and consequently, he is embellished with divine qualities. These divine attributes are the actual nutrients of such elevated souls. Partaking of this nourishment, the strength of divinity within him is increased and he proceeds towards godliness.

a) Steadily, he becomes established in selflessness.

b) He is uninfluenceable.

c) He is detached and devoid of moha.

d) He is impartial and has transcended his own body.

e) Thereafter, he renounces his intellect which supported his individualistic desires and becomes an Atmavaan.

The Lord says that such people become sinless.

Opposed to these ‘sinless souls’ are those who only ‘cook’ for themselves.

1. All their actions are selfish in nature.

2. They only work to establish themselves.

3. Every action is performed with a view to satisfying their own desires.

4. Their own body and its needs comes before all else.

They have no regard for others and even resort to false accusations in order to promote their own reputation. They do nothing for the other – yet they can destroy the other to satiate their own greed for wealth. They think nothing of destroying the other’s reputation just to provide themselves with a little entertainment. They are immoral themselves and cast aspersions upon others’ characters. They consider themselves to be the wisest, even when confronted with the Lord Himself!

1. Such people enjoy belittling and subjugating the other.

2. Even if they befriend the other, it is with a motive of self establishment. The moment they find themselves denigrated in any way, they promptly break off the relationship.

Little one, they cook only that hash within the vessels of their body, which will sustain their ego and they will not even share the fruit of their cooking with anyone else.

The Lord declares that such people abide in sin. They cook sin and eat sin.


यज्ञशिष्टाशिन: सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषै:।

भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्।।१३।।

भगवान कहते हैं :

शब्दार्थ :

१. यज्ञशेष खाने वाले सत् पुरुष,

२. सम्पूर्ण पापों से मुक्त हो जाते हैं।

३. पापी गण केवल अपने लिये ही पकाते हैं।

४. वे तो पाप ही खाते हैं।

तत्व विस्तार :

प्रथम समझ ले कि यज्ञशेष खाने वाले सत् पुरुष क्या खाते हैं, जिसके कारण उन्हें पाप नहीं लगता।

नन्हीं आभा! पुन: समझ :

1. ज्ञान की अग्न जला कर और उसमें अपनी कर्मफल की चाहना को अर्पित करके, जीव अपनी सम्पूर्ण सार्मथ्य और यत्न लगा कर दूसरों के लिये जो कर्म करता है, उस कर्म को यज्ञमय कर्म कहते हैं।

2. जीवन यज्ञ में साधक के हर कर्म की आहुति, उसकी ज्ञान रूपा अग्नि में पावन होकर बाहर जाती है।

ऐसा साधक :

क) निष्काम भाव में टिका होता है।

ख) कर्म परिणाम के प्रति समभाव का अभ्यास कर रहा होता है।

ग) ममत्व भाव से उठने का अभ्यास कर रहा होता है।

घ) आत्मवान् बनना चाह रहा होता है।

क्यों न कहें, उसके कर्मों को उसका अपना लोभ, संग, कामना, राग, द्वेष इत्यादि छू भी नहीं सकते; इस कारण वह अति पावन होता है। ऐसे कर्मों के परिणाम स्वरूप जो उसे मिलता है, वह वही खाता है; वही तो यज्ञशेष होता है।

यज्ञशेष भक्षण करने वाले :

1. आत्म त्याग के परिणाम स्वरूप आनन्द को खाते हैं।

2. समर्पण करने वाले प्रेम को खाते हैं।

3. नित्य न्याय के उपासक का अन्न सत्यता तथा निर्द्वन्द्वता ही होती है।

4. धैर्य और धीरता रूप अन्न इन्हें पसन्द होता है।

5. नित्य यज्ञमय कर्म करते हुए, इन्हें करुणा, दया, क्षमा रूपा अन्न मिलता है।

6. तितिक्षा, सहिष्णुता, गम्भीरता, इनके अन्न के सहज अंग होते हैं।

7. इनके यज्ञशेष में आनन्द, शक्ति, सुहृदयता, मैत्री और प्रेम की सहज सुगन्ध है।

साहस तथा निर्भयता से यह यज्ञ करते हैं तो इनके यज्ञ का प्रसाद महा पावनकर बन जाता है। संक्षेप में यूँ समझ लो कि सम्पूर्ण दैवी गुण इन्हें यज्ञशेष में मिल जाते हैं। यह दैवी गुण ही इन लोगों का वास्तविक अन्न होता है। उस अन्न का भक्षण करते करते इनमें यही गुण एवं शक्ति और अधिक पुष्टि पाते हैं और इनका देवत्व नित्य बढ़ता रहता है।

1. शनै: शनै: वे निष्काम भाव में स्थित हो जाते हैं।

2. वे नित्य निर्लिप्त हो जाते हैं।

3. वे निरासक्त तथा मोह रहित हो जाते हैं।

4. वे समदर्शी और अपने तन के प्रति उदासीन हो जाते हैं।

5. तत्पश्चात् वे देहात्म बुद्धि त्याग कर आत्मवान् बन जाते हैं।

भगवान कहते हैं कि ऐसे लोग सम्पूर्ण पापों से छूट जाते हैं।

दूसरी ओर, जो लोग केवल अपने लिये ही कर्म रूपा अन्न को पकाते हैं, वे तो पाप करते हैं और पाप ही खाते हैं। ‘अपने लिये ही पकाते हैं’, इसका तात्पर्य यह है, कि वे हर कर्म :

1. अपने तन की ख़ातिर करते हैं।

2. अपने तन की स्थापना अर्थ करते हैं।

3. अपनी रुचि की पूर्ति के लिये करते हैं।

4. अपने तन के तद् रूप होकर करते हैं।

5. अपने तन को पहले रख कर करते हैं।

ऐसे लोगों के लिये दूसरा कोई व्यक्ति महत्व नहीं रखता। ऐसे लोग दूसरे के सुख के लिये कुछ नहीं करते। वास्तव में ये अपना मान बनाने के लिये औरों का मान हर लेते हैं। अपने धन के लोभ के कारण दूसरों को तबाह भी कर देते हैं। अपनी मनो मौज के कारण दूसरों की लाज भी हर लेते हैं। ये लोग ख़ुद बुरे आचरण वाले होते हैं और कलंक दूसरों पर लगा देते हैं। अपने को ये सर्वबुद्धिमान् मानते हैं, चाहे सामने भगवान भी हों, उन्हें भी न्यून ही मानते हैं।

क) ऐसे लोगों के पास जो भी रहता है, उसे वे हर पल झुकाने के यत्न करते रहते हैं।

ख) बस, केवल अपनी स्थापति अर्थ लोगों से दोस्ती लगाते हैं, और जहाँ भी स्वयं को नीचा होते देखते हैं, वहाँ से दोस्ती तोड़ देते हैं।

नन्हीं! इन लोगों की तन रूपा हाण्डी में केवल इनके अहंकार को पुष्टित करने वाले कर्मों की भुजिया बनती है और उस भुजिया का फल भी वे अकेले ही लेना चाहते हैं।

भगवान कहते हैं – ये लोग पापी होते हैं। पाप ही पकाते हैं और पाप ही खाते हैं।

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