Chapter 3 Shloka 21

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन:।

स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते।।२१।।

Bhagwan Krishna is again stressing

the importance of action:

What a noble person does,

others also do the same;

the world follows the standards set by him.

Chapter 3 Shloka 21

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन:।

स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते।।२१।।

Bhagwan Krishna is again stressing the importance of action:

What a noble person does, others also do the same; the world follows the standards set by him.

The Lord is speaking here of an exalted soul, whose life is an example for others to follow. Whatever truths are exemplified in such a one’s life, those deeds:

a) are accepted by the world as the moral code of conduct;

b) are regarded as the practical application of scriptural knowledge;

c) are regarded by people as the blue print to follow in their own lives;

d) are a source of inspiration for others and his conduct provides a visible goal for them to achieve.

Such an elevated soul is understandably praised and followed by all because:

1. His actions are egoless and devoid of attachment.

2. He is ever satiated and content.

3. He is immersed in selfless deeds.

4. He promotes the universal good.

5. He has transcended that intellect which pertained only to his bodily needs.

6. Such souls possess a detached attitude towards themselves and live in a state of self forgetfulness.

7. Such a one is not touched by any qualities and yet is replete with divine attributes.

8. He has advanced to the state of the Sthit Pragya and the Atmavaan. He dwells in the Brahmi Sthiti or the Brahm-like state.

The lives of such souls illuminate the spiritual path. Divinity and purity are their inherent traits as they abide in their Atma. Their life is a practical display of the highest scriptural injunctions. Their lives measure up to every quality mentioned in the Scriptures. That is why they are the living light of the Scriptures. Little one! It is not essential that the life of such a one will match the ideologies and norms of the present day society. In fact such a one takes birth to re-illumine the path of Truth and eternal bliss for the ordinary man to follow.

The Lord’s divine birth – live proof

The Lord Himself proclaims that He takes birth to crush sinners when Truth is in peril, goodness is declining and sin is predominant. In doing so:

a) He will necessarily defy the prevalent norms and religious customs.

b) He will necessarily contradict the prevalent concepts.

c) He will therefore be looked upon with derision and even be called ‘foolish’.

d) He will not be tolerated by the so called ‘keepers of dharma’ of those times.

e) Merciless sinners will become his enemies.

f) The ordinary man will be afraid to associate with him.

g) Those bound by blind superstition will not trust him.

However, such elevated beings are one in a million. Living in the midst of society, such a one is alone, but his actions are a proof of living in divinity and the world eventually follows in his footsteps. Therefore little one! You will see how important it is to be engaged in action as long as life exists.

अध्याय ३

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन:।

स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते।।२१।।

देख नन्हीं! अब फिर भगवान अर्जुन को स्पष्ट कह रहे हैं कि कर्म ही श्रेष्ठ हैं। वह कहते हैं :

शब्दार्थ :

१. श्रेष्ठ पुरुष जैसा जैसा आचरण करता है,

२. दूसरे भी वह हीकरते हैं,

३. वह, (यानि श्रेष्ठ पुरुष), जिसे जीवन में प्रमाणित करता है,

४. संसार उनके पीछे पीछे चलता है।

तत्व विस्तार :

पहले समझ! यहाँ भगवान श्रेष्ठ पुरुष के जीवन की बात कह रहे हैं। यानि, श्रेष्ठ पुरुष अपने जीवन में कर्म करते हुए जो जो सत् प्रमाणित करते हैं, लोग उन कर्मों को :

1. सत् का स्थूल रूप मान लेते हैं।

2. ज्ञान का प्रमाण मान लेते हैं।

3. ज्ञान का आचरण रूप मान लेते हैं।

4. ज्ञान का जीवन में विज्ञान रूप जान लेते हैं।

5. जग वाले उन्हीं के कर्म रूपा पद चिह्नों पर चलने लगते हैं और उन्हीं के आचरण को अपने जीवन में उतारने के यत्न करते हैं।

6. जग वाले उन्हीं के आचरण के अनुयायी बन जाते हैं और उन्हीं के आचरण को अपना लक्ष्य बना कर उन्हीं के समान बनना चाहते हैं।

7. जग वाले उन्हीं के कर्मों के नित्य गुण गाते हैं।

वास्तव में बात भी ठीक ही है। श्रेष्ठ गण का आचरण अनुसरणीय होता ही है, क्योंकि वे :

क) स्वयं संग रहित ही होते हैं।

ख) स्वयं नित्य तृप्त ही होते हैं।

ग) स्वयं नित्य निष्काम कर्म में स्थित ही होते हैं।

घ) सर्व भूत हित करने वाले ही होते हैं।

ङ) देहात्म बुद्धि से रहित ही होते हैं।

च) अपने आपको भूले हुए ही होते हैं।

छ) अपने आप के प्रति उदासीन ही होते हैं।

ज) गुणातीत ही होते हैं।

झ) दैवी गुण सम्पन्न ही होते हैं।

ण) स्थित प्रज्ञ ही होते हैं।

ट) आत्मवान् ही होते हैं।

ठ) ब्राह्मी स्थिति में स्थित होते हैं।

यह सब कुछ होने के कारण उनका जीवन अध्यात्म पर प्रकाश डालने वाला होता है। दिव्य, विशुद्ध, आत्म स्वरूप उनका जीवन होता है। वे नित्य ज्ञान विज्ञान प्रमाण रूप ही होते हैं। यदि ज्ञान को भगवान की वाङ्मय प्रतिमा कहें तो उनके जीवन को देखते हुए उन्हें आप साक्षात् शास्त्र की मूर्ति रूप ही कह सकते हो। उनका जीवन आप शास्त्र कथित हर गुण से तोल सकते हो। इस कारण, वह स्वयं अध्यात्म प्रकाश स्वरूप कहलाते हैं। आत्मवान् साधारण जीवन में कैसे जीते हैं, उसका वह स्वयं प्रमाण होते हैं। शास्त्रों के मंत्रों को उन्हीं का जीवन ही तो सप्राण कर देता है।

नन्हीं! उन लोगों के कर्म ज़रूरी जग मान्यता के अनुकूल ही नहीं होते। वास्तव में वे तो जन्म ही इस कारण लेते हैं कि साधारण व्यक्ति तथा साधारण जीव पुन: सत् पथ पर आ सकें और नित्य आनन्द में रह सकें।

भगवान का दिव्य जन्म-प्रमाण रूप :

आत्मवान् तथा भगवान का तो जन्म ही तब होता है :

क) जब सत् का पतन होने लगता है;

ख) जब साधुता का पतन होता है;

ग) जब पापी और दुराचारियों का राज्य हो जाता है;

घ) भगवान ने स्वयं भी कहा है कि वह पापी और दुराचारियों के विध्वंस के लिये जन्म लेते हैं।

यदि यह बात सच है, तो भगवान जब भी जन्म लेंगे :

1. वह प्रचलित मान्यताओं के विरोधी ही होंगे।

2. वह प्रचलित प्रथाओं के विरोधी ही होंगे।

3. वह उस काल में प्रचलित धर्म की प्रक्रियाओं के विरोधी ही होंगे।

4. इस कारण वह अनेकों बार ठुकराये भी जायेंगे, मूर्ख भी कहलायेंगे।

5. धर्म के ठेकेदार उन्हें सह नहीं पायेंगे।

6. निष्ठुर और दुराचारी, उनके दुश्मन भी बन जायेंगे।

7. साधारण भोले भाले लोग भी उनसे घबरायेंगे।

8. रीति रिवाज से बन्धे हुए अंध विश्वासी लोग भी उन पर विश्वास नहीं कर सकेंगे।

किन्तु वह तो करोड़ों में एक होते हैं। वह तो सबमें रह कर भी अकेले ही होते हैं। वह तो यहीं जी कर या मर कर भी सबके पथ प्रदर्शक कहलाते हैं। उन्हें जीवन में प्रमाण देना ही होता है। तब जग उनके पद चिह्नों का अनुसरण करता है। नन्हीं लाडली! इसलिये कर्म करने ही चाहियें।

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