Chapter 3 Shloka 35

श्रेयान् स्वधर्मो विगुण: परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।

स्वधर्मे निधनं श्रेय: परधर्मो भयावह:।।३५।।

Bhagwan advises performance of action

according to one’s own nature:

One’s own dharma even though not distinguished

is preferable to the elevated dharma of another.

Even death in the performance of one’s own duty

is preferable; another’s duty is fraught with fear.

Chapter 3 Shloka 35

श्रेयान् स्वधर्मो विगुण: परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।

स्वधर्मे निधनं श्रेय: परधर्मो भयावह:।।३५।।

Bhagwan advises performance of action according to one’s own nature:

One’s own dharma even though not distinguished is preferable to the elevated dharma of another. Even death in the performance of one’s own duty is preferable; another’s duty is fraught with fear.

Dharma = dhri + man

Dhri – That which is; that which exists; that which is established; that which is protected; that which is supportive; that which one has imbibed.

Man – To remember, to agree with, to cherish as precious; to consider to be greater, to manifest, to worship.

Therefore, Dharma will mean:

1. To accept and revere what exists.

2. To manifest in practice what has long been established as Truth.

3. To use in life those principles which have always proved advantageous.

4. To utilise in life those basic and unique attributes which eminent souls have imbibed through the ages.

5. To accept those gunas bestowed upon us by nature as our dharma.

Our sense organs, mind and intellect all have their own gunas i.e. qualities. All these qualities contain certain energies which impel an individual to act in a certain manner.

The dharma of the jivatma (personalised Atma):

a) To remain detached.

b) To stay uninfluenced by all gunas.

c) To be devoid of attachment to his body and its attributes.

d) To be an Atmavaan.

All this is possible only if the intellect remains firmly established in its dharma.

The dharma of the intellect

The intellect is the discerning faculty. If it gets attached to objects, its natural qualities are superimposed by attachment and it loses its basic objectivity. If it is not partial, it will side with justice and will not support the mind in its pursuit of temporary pleasures. It will then always support the Truth and will proceed towards greatness and the attainment of the state of an Atmavaan.

The dharma of the intellect is:

1. To lead one from death to immortality.

2. To lead one from sorrow to happiness.

3. To direct one from darkness to light.

4. To free one from dependency on objects.

5. To help one discriminate between truth and untruth.

6. To release one from the shackles of the body and take one towards mergence with the Atma.

7. To establish one in one’s true Essence – the Self.

‘Your own dharma is better than another’s dharma.’

If the intellect follows its own dharma:

a) It will always support nishkam karmas.

b) It will not advise changing one’s own gunas, but utilising them with an attitude of selflessness.

c) It will exhort one to use one’s own god given faculties in a detached manner.

We want to change our natural gunas when:

a)  we claim the gunas of the body as our own;

b)  we identify with the body;

c)  we seek to procure an eminent status for the body.

However, if we remember that we are the Atma and not the body, we will cease to identify ourselves with the body. We will give our body along with its inherent attributes to others in service. We will no longer be proud of the qualities of this body and we will allow it to perform its natural duties. Similarly, if the intellect is allowed to adhere to its dharma, you will fulfil the dharma determined by your gunas, without any attachment.

The Lord therefore stresses that it is better to die performing one’s own dharma in accordance with the qualities allotted to us than to engage in the duties inherent in the gunas of another.

1. Another’s dharma will give you life long sorrow.

2. You will never be established in Truth.

3. You will always be fearful.

4. Doubts, suspicions and fear of failure will haunt you.

5. Your attachment to the body and fear of the death of the body will both increase.

Little One! My very own! An Atmavaan remains ever uninfluenced by the guna dharma of another.

a) Remember, each one can become an Atmavaan.

b) All can become detached.

c) Each one can transcend gunas and become a gunatit.

d) You can become ever satiated and rise above attractions and repulsion.

e) Each one can transcend the body idea.

But each one is given certain distinctive abilities which guide him into separate functions. Each one has a unique destiny and different combinations of qualities. Thus each one’s work will be different. Because of this the individual labours under the illusion that his dharma and his path is different to that of another.

The Lord says, “Whatever you are, wherever you may be, no matter what qualities you possess, merely renounce attachment with them and let your innate gunas perform their natural deeds. This will take you towards Self Realisation.”

अध्याय ३

श्रेयान् स्वधर्मो विगुण: परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।

स्वधर्मे निधनं श्रेय: परधर्मो भयावह:।।३५।।

अब भगवान प्राकृतिक गुणों के अनुकूल स्वधर्म अनुष्ठान के लिये कहते हुए कहने लगे :

शब्दार्थ :

१. अच्छी प्रकार से आचरण किये हुए दूसरे के धर्म से,

२. अपना गुण रहित धर्म भी अति उत्तम होता है।

३. अपने धर्म में मृत्यु भी श्रेष्ठ है,

४. पराया धर्म भयकारक होता है।

तत्व विस्तार :

देख नन्हीं! पहले ‘धर्म’ को समझ ले। धर्म शब्द ‘धृ’+‘मन्’ से बनता है।

‘धृ’ का अर्थ है, ‘जो है’, ‘जो विद्यमान है’, ‘जो स्थापित है’, ‘जो सुरक्षित है’, ‘जो नित्य सहायक है’, ‘जो आप धारण किया हुआ है’।

‘मन’ का अर्थ, जो यहाँ लागू होता है, उसे समझ ले। मन् का अर्थ है, ‘याद करना’, ‘मानना’, ‘मूल्यवान समझना’, ‘बड़ा मानना’, ‘प्रत्यक्ष करना’ और ‘पूजा करना’।

इसके अनुसार धर्म का अर्थ होगा :

1. जो विद्यमान है, उसका आदर और उपयोग करना।

2. जो विद्यमान है, उसको प्रत्यक्ष करना।

3. जो स्थापित है, उसका अभ्यास करना।

4. जो नित्य सहायक है, उसका जीवन में प्रयोग करना।

5. जो विद्यमान मूल गुण और विशेष गुण युगों से श्रेष्ठ पुरुषों ने धारण किये हुए हों, उनका जीवन में उपयोग करना।

प्रकृति के दिये हुए उन गुणों को ही अपना धर्म मान।

अब तनिक आगे बढ़ेंगे तो देखेंगे कि गुण इन्द्रियों के भी होते हैं, गुण मन के भी होते हैं, गुण बुद्धि के भी होते हैं।

यह प्रकृति की दी हुई सहज धर्मयुक्त शक्तियाँ हैं।

जीवात्मा का धर्म :

अब जीवात्मा का धर्म है,

1. नित्य निर्लिप्त रहना।

2. नित्य निरासक्त रहना।

3. गुणों से प्रभावित न होना।

4. गुणों के प्रति नित्य उदासीन रहना।

5. तन से संग न करना।

6. आत्मवान् बनना।

यह तब ही हो सकता है, यदि बुद्धि अपने धर्म में नित्य स्थित रहे।

बुद्धि का धर्म :

बुद्धि निर्णयात्मिका शक्ति को कहते हैं। यह बुद्धि ही जब विषयों से आसक्त हो गई, तब यह अपना सहज गुण भूल जायेगी, तथा अपने गुणों को आवृत कर लेगी। यदि बुद्धि पक्षपाती न बने तो यह हमेशा न्याय करेगी और क्षणिक सुख के हक़ में सहयोगी नहीं बनेगी।

तब बुद्धि का निर्णय तथा सार्मथ्य सत् की स्थापना, आत्मवान् बनने और श्रेष्ठता के पक्ष में होगा।

इस बुद्धि का धर्म है, कि यह आपको :

1. मृत्यु से अमरत्व की ओर ले जाये।

2. दु:ख से नित्य आनन्द की ओर ले जाये।

3. अंधियारे से प्रकाश की ओर ले जाये।

4. तनत्व भाव से निकाल कर आपको आत्मवान् बना दे।

5. सत् और असत् का विवेक दिला दे।

6. असत् से निकालकर आपको सत् में स्थित करवा दे।

7. विषय आश्रितता से छुड़वा कर स्वतंत्र बना दे।

8. स्वरूप में स्थित होने की ओर ले चले।

‘अपना धर्म’ ‘पर धर्म’ से श्रेष्ठ है:

यदि बुद्धि अपने सहज धर्म का पालन करे तो यह :

1. निष्काम कर्म के पक्ष में निर्णय देगी।

2. अपने तन के गुणों को बदलने के लिये नहीं कहेगी, उन्हें निष्काम भाव से इस्तेमाल करने के लिये कहेगी।

3. जिस कार्य करने का आप में सहज गुण है, उसे ही निरासक्त होकर प्रयोग में लाने को कहेगी।

आप अपने तन के सहज गुणों को तब बदलना चाहते हैं जब :

क) तन के गुणों को आप अपना मानते हैं।

ख) आप तन के साथ तद्‍रूप होते हैं।

ग) आप तन को किसी श्रेष्ठता में स्थापित करना चाहते हैं।

किन्तु यदि यह मान लो कि आप तन नहीं हो, आप आत्मा हो तो आप तन के गुणों से अपनी तद्‍रूपता छोड़ देंगे। आप अपने तन को गुणों के सहित औरों को दे देंगे। फिर अपने तन के गुणों में मिथ्या गुमान न भर कर उसे सहज गुण रूपा धर्म करने देंगे। इसी प्रकार बुद्धि गर अपना धर्म निभायेगी, तब आप अपना धर्म नहीं छोड़ेंगे, बल्कि संग रहित होकर अपने गुण रूपा धर्म का अच्छी तरह अनुष्ठान करेंगे।

इस कारण भगवान कहते है, अपना सहज गुण धर्म निभाते हुए मर जाना भी श्रेष्ठ है। यदि तू औरों के गुण धर्म अपनाने के यत्न करता रहा तो :

1. जीवन भर दु:खी रहेगा।

2. कभी भी सत् में स्थित नहीं हो सकेगा।

3. सदा भयपूर्ण स्थिति में बैठा रहेगा।

4. सदा संकोच, संशय और असफ़लता का भय तुम्हें खाता रहेगा।

5. तुम्हारा तन से संग भी बढ़ जायेगा और तन की मृत्यु का भय भी बढ़ जायेगा।

नन्हीं! मेरी अपनी! आत्मवान् पर गुण धर्म से नित्य अप्रभावित रहते हैं।

क) सब आत्मवान् हो सकते हैं।

ख) सब निरासक्त हो सकते हैं।

ग) सब गुणातीत हो सकते हैं।

घ) सब उदासीन हो सकते हैं।

ङ) सब नित्य तृप्त हो सकते हैं।

च) सब राग द्वेष से रहित हो सकते हैं।

छ) सब तनत्व भाव से परे हो सकते हैं।

किन्तु सबके गुण धर्म पृथक् होने के कारण जीवन में फ़र्क काम करने वाले होंगे। सबकी रेखायें और गुण भिन्न भिन्न होंगे, इस कारण कार्य भिन्न भिन्न होंगे। इसी कारण जीव को भ्रम हो जाता है कि उनके धर्म भिन्न हैं और वह भिन्न भिन्न पथ पर चलने वाले हैं।

इसलिये भगवान कहते हैं, तुम जो हो, जहाँ हो, जैसे भी गुण पाये हो, उनके साथ संग छोड़ कर, उन्हें अपना सहज गुण धर्म निभाने दो। यही तत्व सार आपको आत्मवान् बना देगा।

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