Chapter 3 Shloka 29

प्रकृतेर्गुणसम्मूढा: सज्जन्ते गुणकर्मसु।

तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत्।।२९।।

Those who are deluded by the qualities of Prakriti

become attached to the actions

that are controlled by the gunas.

The man of wisdom who knows better,

must not agitate such people of blighted intellect.

Chapter 3 Shloka 29

प्रकृतेर्गुणसम्मूढा: सज्जन्ते गुणकर्मसु।

तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत्।।२९।।

Those who are deluded by the qualities of Prakriti become attached to the actions that are controlled by the gunas. The man of wisdom who knows better, must not agitate such people of blighted intellect.

Here Bhagwan Krishna is once again warning the gyanis or men of wisdom, not to unsettle the mind of the common man:

1. Persons who are under the influence of gunas.

2. Those who are deluded by the gunas.

3. Those whose intellect is overpowered by the gunas.

4. Those who may be foolish, since they do not see the difference between the Real and the unreal.

5. Those who consider the impossible to be possible.

6. Those who consider illusion to be the Truth.

7. They who cannot differentiate between vidya or knowledge and avidya which is not true knowledge.

The knowledgeable man of wisdom must not unsettle the minds of such people.

It behoves such a man of wisdom:

a) To persevere in the service of all men even whilst abiding in his true Self.

b) To teach them to fulfill their own desires in a manner conforming to the Truth.

c) To furnish practical proof of how life must be lived in a detached manner.

d) To remain uninfluenced by the gunas of the ignorant even whilst living among them.

There must be no rejection of their vices nor attraction to their virtues. Nor must he hold them responsible or make them experience guilt for their attributes.

Knowing that qualities can influence each other, he does not try to unsettle the others’ understanding through preaching. If however such an Atmavaan who has transcended the intellect that connived with the body persevered in serving others, the people he serves might gain experience of his internal silence and proceed to emulate his qualities. It is possible then that some of them would aspire to attain the same attitude of detached selflessness.

Little one!

1. Sadhana is not merely the renunciation of certain qualities. It changes one’s direction of thinking.

2. It diverts one from selfish identification with the body.

3. It annihilates one’s erroneous sense of doership.

4. It is ego abnegatory.

5. It eradicates the blindness of moha and grants one the ‘eyes’ of the discerning intellect.

6. It directs one towards truthful living.

It destroys the false world created by the mind. Blindness lies in moha, thoughts of ‘me’ and ‘mine’, ego and attachment to objects. When one watches oneself with a discerning intellect, the impurities of the mind are burnt off.

Little one! You must have heard it said often that when the glance of an illuminated soul falls upon you, your sins are washed away. The discerning intellect of Truth is that ‘illuminated intellect’ which can wash away one’s impurities and ignorance. If you can distance yourself from your body and see yourself even for a moment, your attachments will wither and burn.

What one must understand is that all these are an expansion of the arena of gunas. One’s attraction towards sadhana is also dependent on the qualities. The man of wisdom, knowing this, does not unsettle the minds of the ignorant.

अध्याय ३

प्रकृतेर्गुणसम्मूढा: सज्जन्ते गुणकर्मसु।

तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत्।।२९।।

अब भगवान पुन: ज्ञानी गण को आदेश देते हुए कहते हैं :

शब्दार्थ :

१. प्रकृति के गुणों से मोहित हुए पुरुष,

२. गुण के द्वारा हुए कर्मों में आसक्त होते हैं।

३. उन कम जानने वाले, मन्द बुद्धि पुरुषों को,

४. अच्छी प्रकार जानने वाला ज्ञानीपुरुष चलायमान न करे।

तत्व विस्तार :

भगवान पुन: ज्ञानवान् लोगों को सावधान करते हैं कि वह औरों को चलायमान न करें।

1. गुणों के कारण जो मोहित हो चुके हैं,

2. गुणों के कारण जो भरमा गये हैं,

3. गुणों के कारण जो बुद्धिहीन हो चुके हैं,

4. गुणों के कारण जो मूर्खता करते हैं,

5. गुणों के कारण जो सत्य और असत्य का भेद नहीं समझते,

6. गुणों के कारण जो लोग असम्भव को भी सम्भव मानते हैं,

7. गुणों के कारण जो लोग वास्तविकता को नहीं समझते,

8. गुणों के कारण जो लोग विद्या और अविद्या में भेद नहीं समझते,

9. गुणों के कारण जो लोग मिथ्यात्व को ही सच मानते हैं,

उन्हें ज्ञानवान् पुरुष विचलित नहीं करते।

नन्हीं! ज्ञानी जन को चाहिये कि :

क) वह अपने स्वरूप में स्थित रहकर इन लोगों के काम करें।

ख) इन लोगों को उन्हीं की कामनायें सतपूर्ण विधि से पूर्ण करना सिखायें।

ग) स्वयं नित्य निर्लिप्त रहकर, जीवन में जैसे जीना चाहिये, वैसा जीवन जी कर, वे प्रमाण सहित दिखायें।

घ) अज्ञानियों के पास रहते हुए भी उनके गुणों से नित्य अप्रभावित रहें।

ङ) अज्ञानियों के गुणों से राग या द्वेष न रखें, और उनके गुणों को बुरा भला न कहें।

च) अज्ञानियों को, उनके गुणों के कारण दोषी न ठहरायें।

ज्ञानीजन पूर्णतय: जानते हैं कि गुण प्रकृति की देन है तथा ये किसी के बस में नहीं होते। ये पूर्णतय: जानते हैं कि गुण ही गुणों को प्रभावित करते हैं, इसलिये नाहक बातों से किसी को चलायमान करने का कोई लाभ नहीं।

अपने सहज जीवन में आत्मवान् बन कर तथा देहात्म बुद्धि से उठ कर यदि आप निरासक्त होकर लोगों के काज कर्म करते रहे तो आपके मौन स्वरूप का शायद आपके सहवासियों को अनुभव हो जाये। तब उनके गुण शायद आपके गुणों को ग्रहण कर लें। वास्तव में उन्होंने भी तो केवल गुणों के प्रति उदासीनता को ही ग्रहण करना होता है।

नन्हीं!

1. साधना केवल गुण त्याग से नहीं की जाती, साधना आपके दृष्टिकोण को बदल देती है।

2. साधना आपके तनत्व भाव का अभाव कर देती है।

3. साधना आपके कर्तृत्व भाव का अभाव कर देती है।

4. साधना आपके अहंकार का अभाव कर देती है।

5. साधना आपके अन्धेपन को दूर करती है और आपको विवेक चक्षु देती है।

6. साधना तो आपको हक़ीक़त में जीना सिखा देती है।

छ) साधना तो आप की झूठी मनो दुनियाँ को ख़त्म कर देती है।

मोह, मम भाव, अहंकार, तनो आसक्ति, विषयासक्ति, यह सब मन के अन्धेपन के कारण ही आप पर अधिकार किये हुए हैं। जब आपको विवेक रूपा दृष्टि मिल जाती है, तो मनो मल जल जाती है।

नन्हीं! तूने अनेकों बार सुना होगा, ‘गर साधु की दृष्टि पड़ जाये, तो जन्म जन्म के पाप और मल धुल जाते हैं।’ वास्तव में नन्हीं! यह आपकी अपनी विवेक रूपा साधु दृष्टि है, जो आपकी अपनी ही मल को धो देती है; जो आपकी अपनी ही अज्ञानता को जला देती है! यानि, जब आप पल भर के लिये अपने आपको तनत्व भाव से दूर होकर देखते हैं तब संग रूपा मल जलने लगती है।

किन्तु नन्हीं! यह सब गुणों का ही विस्तार है। साधना की ओर खिंचाव भी तो गुणों पर ही आश्रित है। यह जानते हुए साधुगण अन्य लोगों को चलायमान नहीं करते।

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