Chapter 9 Shloka 14

सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रता:।

नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते।।१४।।

Those who are deeply committed to My Name and who

sing My praises ceaselessly, they make every effort

to inculcate My qualities in their lives and ever

subjugate themselves at My feet. Absorbed only in Me,

they worship Me through exclusive devotion.

Chapter 9 Shloka 14

सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रता:।

नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते।।१४।।

Little one, the Lord is now explaining the devotee’s mode of worship.

Those who are deeply committed to My Name and who sing My praises ceaselessly, they make every effort to inculcate My qualities in their lives and ever subjugate themselves at My feet. Absorbed only in Me, they worship Me through exclusive devotion.

Dear one, devotees of the Lord extol the Lord’s attributes. They praise His qualities and invoke those qualities within themselves.

Upasate (उपासते) comes from Upasana (उपासना), which means ‘to sit close’. Hence, Upasana of the Lord means ‘to sit close to the Lord’. If the Lord is one’s witness in all one’s deeds, He will always be by one’s side. He will abide close to one as long as one’s thoughts are focused on Him. Actions have to be performed in life – why not ensure that each act becomes an upasana of the Lord? This can only happen through exclusive meditation on the Lord.

Devotees of the Lord ever bow at His feet in obeisance. In other words, they bow before the divine attributes.

1. Wherever love flows;

2. Wherever compassion emanates;

3. Wherever justice is rendered;

4. Wherever forgiveness exists;

5. Wherever mercy abides;

there the devotee of the Lord bows in obeisance.

The devotee is a worshipper of such attributes, no matter if these qualities flow towards him or not. He eulogises even his enemy if these qualities inhere in him. ‘Namaskar’ means to bow, to greet, it means complete acceptance of the Supreme.

A human being bows in humility before one whom he considers superior. Once such a devotee has bowed his head before the Lord, he never raises it again; he remains ever absorbed in Him.

अध्याय ९

सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रता:।

नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते।।१४।।

नन्हीं! ले, भगवान महा भक्त की उपासना विधि बता रहे हैं। तू भी सुन!

शब्दार्थ :

१. मेरे नाम के दृढ़ व्रतधारी निरन्तर मेरी गुण कीर्ति गाते हैं।

२. वे मेरे गुण जीवन में लाने के यत्न करते हुए मेरे चरणों में नित्य झुके रहते हैं।

३. नित्य ध्यान युक्त हुए वे अनन्य भक्ति से मुझे उपासते हैं।

तत्व विस्तार :

मेरी जान्! भक्त गण तो भागवत् गुणों के गुण गाते हैं। वे भगवान के गुणों की प्रशंसा करते हैं और उनका आवाहन अपने आप में करते हैं।

भगवान की उपासना का अर्थ है भगवान के पास बैठना। भगवान का साक्षित्व गर जीवन में हो तो वे सदा साथ ही होते हैं। जितने क्षण उनमें ध्यान लगे, भगवान पास ही होते हैं। जीवन में काज कर्म तो करने ही होंगे, तू अभ्यास कर कि तन जो भी कर्म करे, तेरी उपासना न बन्द हो।

यह सब तब ही हो सकेगा जब तुम्हारा ध्यान भगवान में ही हो।

भगवान के भक्त गण सदा उन्हें ही नमस्कार करते हैं; यानि, भागवद् गुणों के सम्मुख वे झुक जाते हैं।

1. जहाँ से भी प्रेम बहे,

2. जहाँ से भी करुणा बहे,

3. जहाँ से भी न्याय बहे,

4. जहाँ से भी क्षमा बहे,

5. जहाँ से भी कृपा बहे,

वहाँ वे झुक जाते हैं। वे भक्त इन गुणों के उपासक होते हैं, चाहे यह गुण बहाव उनके अपने प्रति हो या न हो। गर वे गुण दुश्मन में भी हों तो वे तो दुश्मन को भी सराहते हैं। नमस्कार का अर्थ है झुक जाना, अभिनन्दन करना, परम भाव स्वीकार करना।

नमस्कार जीव वहाँ करता है जहाँ वह दूसरे को श्रेष्ठ मानता है। ऐसे भक्त लोग भगवान के आगे एक बार अपना सीस झुका देते हैं तो पुन: उसे कभी नहीं उठाते; यानि, तत्पश्चात् उसी में निमग्न रहते हैं।

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