Chapter 9 Shloka 6

यथाकाशस्थितो नित्यं वायु: सर्वत्रगो महान्।

तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय।।६।।

As the omnipresent wind

ever abides in the ether,

know that, similarly

all beings abide in Me.

Chapter 9 Shloka 6

यथाकाशस्थितो नित्यं वायु: सर्वत्रगो महान्।

तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय।।६।।

Speaking of His all pervading Essence, the Lord Himself says:

As the omnipresent wind ever abides in the ether, know that, similarly all beings abide in Me.

The Lord says:

a) All beings abide in the Atma, yet are not the Atma.

b) In actual fact, this entire collection of beings cannot even touch the Atma.

c) This gathering of beings created by maya cannot know the Atma.

d) The mind can never encompass the Supreme.

e) That One is far beyond the sense faculties. The intellect cannot reach there, nor can any power grant a vision of That Supreme One.

f) The three gunas along with their energies cannot know That One.

g) The Atma can be known only by the Atma. It is only the Atma which can merge in the Atma. No attributes can know or comprehend That Atma Self.

h) The Atma is neither born nor does it attain death.

i)  The Atma does not burn, increase, decrease, etc. It is without division.

j)  Bodies die, bodies are reborn. Attachment breathes life into otherwise inert bodies, giving rise to ever more births. All this happens within the Atma, but nothing can happen to the Atma because the Atma has no form.

All is dependent on the Atma, yet the Atma is ever stable and unchanging.

Little one,

1. Air dwells in ether; yet neither air nor ether are visible objects. Yet, it is true that air exists in the ether.

2. Just as ether is invisible, so also the Atma cannot be seen. Yet this entire world is established in it.

3. The Supreme Lord is the origin of the world, but the origin of the Lord cannot be found in the world.

4. This entire world is established in the Lord – the Lord is not established in the world.

5. The world is dependent on the Lord – the Lord is not dependent on the world.

This entire creation originates in That One and is eventually re-absorbed into That One. It could be said that That Indivisible Essence so to say divides Itself and merges back into Itself.

Understand this through another example. The dream abides in the dreamer. All the characters that emerge in the dream, attain sustenance from the witness of that dream. The dreamer abides in those characters and objects, yet he himself is not those characters and objects. This is the reason why it may seem as though what the Lord has said in chapter 7, shloka 12 and chapter 9, shlokas 5 and 6 is contradictory. For the Atmavaan, this entire world is as a dream – a play of qualities. As the individual begins to transcend the body, he begins to experience this.

अध्याय ९

यथाकाशस्थितो नित्यं वायु: सर्वत्रगो महान्।

तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय।।६।।

अपने सर्वव्यापी स्वरूप का वर्णन करते हुए भगवान स्वयं कहने लगे :

शब्दार्थ :

१. जैसे सर्वत्र विचरने वाला वायु सदा आकाश में ही स्थित है,

२. वैसे ही सम्पूर्ण भूत मेरे में स्थित जान।

तत्व विस्तार :

भगवान कहते हैं :

क) सम्पूर्ण भूत आत्मा में स्थित हैं, पर भूत आत्मा नहीं हैं।

ख) वास्तव में पूर्ण भूत समुदाय आत्मा को छू नहीं सकते।

ग) माया रचित भूत समुदाय आत्मा को नहीं जान सकते।

घ) मन भगवान को नहीं जान सकता।

ङ) इन्द्रियों से वह बहुत परे हैं, बुद्धि की वहाँ पहुँच नहीं है तथा कोई शक्ति उसे दर्शा नहीं सकती।

च) त्रिगुणात्मिका शक्ति में उसे जानने की शक्ति नहीं है।

छ) आत्म को आत्म ही जान सकता है, आत्म में आत्म ही समा सकता है। आत्म को गुण नहीं जान सकते।

ज) आत्मा का न ही जन्म होता है और न ही मृत्यु होती है।

झ) आत्मा जलता नहीं, बढ़ता नहीं, घटता नहीं, यह अव्यय है।

ञ) तन मरे, तन जन्मे, संग भाव ही प्राण भर कर अनेकों तन रचता जाता है। आत्मा में सब हो रहा है पर आत्मा को कुछ नहीं हो सकता, क्योंकि आत्मा का कोई रूप नहीं है।

आत्मा पर सब आश्रित तो हैं, पर आत्मा सदा निश्चल है।

नन्हीं!

1. आकाश में वायु है, किन्तु न आकाश दृष्ट है, न वायु ही दृष्ट विषय है। किन्तु यह सत् है कि आकाश में वायु है।

2. ज्यों आकाश नहीं दीखता, त्यों ही आत्मा नहीं दीखता, किन्तु सम्पूर्ण संसार उसी में स्थित है।

3. संसार का कारण भगवान हैं, किन्तु भगवान का कारण संसार नहीं है।

4. संसार भगवान में स्थित है, भगवान संसार में स्थित नहीं है।

5. संसार भगवान पर आश्रित है, भगवान संसार पर आश्रित नहीं।

सम्पूर्ण सृष्टि उसी से उत्पन्न होकर उसी में लय हो जाती है। क्यों न कहें, वह अखण्ड तत्व, मानो अपने आप को विभाजित करके पुन: अपने में लय हो जाता है।

इसे दूसरे उदाहरण से समझ लो! स्वप्न, स्वप्न दृष्टा में ही स्थित होता है। स्वप्न में जितने भी जीव या विषय प्रकट होते हैं, वह स्वप्न दृष्टा से ही मानो पुष्टि पाते हैं। स्वप्न दृष्टा उनमें है भी, और है भी नहीं। इस कारण भगवान ने जो कहा 7/12, 9/5, 9/6 में, वह सब विरोधात्मक से दिखते हैं। आत्मवान् के लिये सम्पूर्ण संसार स्वप्न गुण खिलवाड़ सा है। जीवात्मा ज्यों ज्यों अपने तन से उठने लगता है, उसके अनुरूप उसे इसका अनुभव होने लगता है।

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